Monday, April 9, 2018

हमारी गौरवशाली परम्परा और फ़ासिस्ट हमला


           
इस समय देश में फ़ासिस्ट शासन की मौजूदगी के चलते जीवित लोगों के लिए खतरा तो है ही लेकिन उससे अधिक बड़ा खतरा हमारी परम्परा के लिए पैदा हो गया है क्योंकि इस परम्परा को समाप्त किए बिना उसके लिए लोगों को आपस में बांटना, नकली दुश्मन खड़ा करना, अज्ञान और अंधविश्वास को प्रामाणिकता प्रदान करना तथा चतुर्दिक अराजक कत्लो-गारत का वातावरण बनाना मुश्किल साबित हो रहा है । देश के अतीत की इस बहुविध और बहुआयामी समृद्ध परम्परा को विकृत, बदनाम और बरबाद करने का सुनियोजित अभियान वर्तमान फ़ासिस्ट शासन की प्रमुख विशेषता के बतौर उभरकर सामने आया है ।
बहुत शुरू में ही अथर्ववेद के पृथिवी सूक्त में इस धरती, इस पर रहने वाले विभिन्न लोगों और उनकी विविध भाषाओं का प्रसन्न अभिनन्दन किया गया है । इस सोच में निहित विविधता के साथ इहलौकिक यथार्थ की स्वीकृति ही आगे चलकर भारतीय दर्शन की समृद्ध भौतिकवादी परम्परा के रूप में प्रकट हुई । भारतीय दर्शन में कम से कम छह धाराएं मौजूद रही हैं और इनमें से कई अनीश्वरवादी भी रही हैं । यदि कुछ लोग साकार ईश्वर के उपासक रहे तो बहुतेरे लोग निराकार के भी पुजारी रहे हैं । इससे भी आगे बढ़कर मानव शरीर को ही देवस्थान मानने की परम्परा भी हमारे देश में न केवल मौजूद रही बल्कि फली फूली और योग दर्शन के रूप में प्रतिष्ठित हुई । इस देश ने हिंदू, बौद्ध और जैन तथा सिक्ख धर्म जैसे एकाधिक धर्मों को जन्म दिया, उनके भीतर के भांति भांति के सम्प्रदायों को बनाए रखा और बाहर से आनेवाले प्रत्येक धर्म का दिल खोलकर स्वागत किया । इसके परिणामस्वरूप तंत्र विद्या से लेकर ध्यान तक और मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे से लेकर चर्च तक फैला हुआ धार्मिक आचार का व्यापक फलक किसी भी पर्यवेक्षक को सचमुच अचम्भे में डाल देता है । धर्मों के मामले में हमारे देश की सृजन क्षमता बाद तक जारी रही और इस क्रम में ब्राम्ह समाज से लेकर आर्य समाज तक तमाम किस्म के नए रूप सामने आए । इन सबने मिलकर इस देश को ऐसी विविधवर्णी रंगत प्रदान की है जिसे मिटाकर भाजपा काएक धर्म- एक ग्रंथका सपना पूरा होना मुश्किल है । फ़ासिस्ट सोच भारतीय संस्कृति की इस खूबसूरत विविधता को समाप्त करके उसे हिंदुत्ववादी रंग में रंगना चाहती है और इसके लिए मुख्य धारा से भिन्न किसी भी आचार को खतरा मानकर उसके विरुद्ध हमला करने पर उतारू है । उसने हिंदू धर्म के जिस रूप को अपने राजनीतिक स्वार्थ के चलते प्रश्रय और प्रोत्साहन दिया है उसमें राजनीतिक प्रदूषण तो है ही सत्ता का सहारा लेकर ऐसे लोग धर्म का झंडा उठाए घूम रहे हैं जो किसी भी अर्थ में धार्मिक न होकर शुद्ध रूप से व्यावसायिक हित साध रहे हैं । धीरे धीरे धार्मिक समुदाय में भी धर्म के इस स्वरूप का विरोध शुरू हुआ है ।    
सांस्कृतिक मोर्चे पर भाजपा भले ही संस्कृत की वापसी की वकालत करती हो लेकिन वह इस भाषा में निहित रचनात्मक विस्तार को मटियामेट करके उसे ब्राह्मणवाद के हथियार में बदल देना चाहती है । आयुर्वेद से लेकर नाट्यशास्त्र और कामसूत्र तक संस्कृत भाषा में रचित ज्ञान इस देश में प्रवाहमान भौतिकवादी विचारधारा की उपस्थिति का प्रमाण प्रस्तुत करता है । खास बात यह है कि भाजपा भारतीय इतिहास के जिस कालखंड को उपनिवेशवादी चिंतकों की तरह मध्ययुग और मुस्लिम शासन मानकर तिरस्कार की नजर से देखती है उसी समय भक्ति आंदोलन चला जिसमें हमारे देश की लगभग सभी भाषाओं और लगभग सभी क्षेत्रों में न केवल महान साहित्य की रचना हुई बल्कि बौद्ध धर्म के उत्थान के बाद जातिवाद के विरुद्ध सबसे प्रबल आवाज उठी । उस आंदोलन ने धर्म और ईश्वर को सहज लौकिक स्वरूप प्रदान किया, हिंदू धर्म-समाज में व्याप्त जातिप्रथा के विरोध के लिए उसका उपयोग किया और सबसे आगे बढ़कर भारत की विभिन्न जातीयताओं के गठन का मार्ग प्रशस्त किया । गुजरात के नरसी मेहता से लेकर असम में शंकरदेव तक ने धर्म से ऊपर उठकर मानव समानता पर आधारित जातीय भावना पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । लगभग सभी आधुनिक भारतीय भाषाओं की जड़ें इसी आंदोलन के दौरान रचे साहित्य में हैं । सांप्रदायिक ताकतें इस आधार पर बनी जनता की एकता को धार्मिक विभाजन के सहारे तोड़कर जातिगत ऊंच नीच की व्यवस्था को कायम करना चाहती हैं । यह समय न केवल जातीयताओं और भाषाओं के गठन के लिहाज से बल्कि स्थापत्य, संगीत, गायन और चित्रकला के लिहाज से भी रचनात्मक विस्फोट का समय था । तुलसीदास, ताजमहल, तानसेन, तबला, सितार, खयाल गायकी, मुगल चित्रकारी आदि इसी समय की उपलब्धियां हैं । इनमें भी तुलसीदास ने राम की बहुत पुरानी लोककथा को न केवल जनसामान्य की भाषा में प्रस्तुत करके लोकप्रिय बनाया बल्कि उस कथा में राम के देवत्व के मुकाबले उनका मनुष्यत्व प्रतिष्ठित किया और प्रजावत्सल शासक का आदर्श रचने की चेष्टा की । उनकी कथा में अयोध्या के राज्य के मुकाबले जंगल जंगल घूमने वाले और केवट से लेकर शबरी तक से प्रेम करने वाले राम की छवि अधिक आकर्षक तरीके से उकेरी गई है । विषमता विरोधी रामराज्य का यूटोपिया उनके समय के समाज की आलोचना का प्रमाण प्रतीत होता है ।                                 
इसी समय ने भारत में सिक्ख धर्म को जन्म दिया । इस धर्म में गुरु के रूप में जिस गुरु ग्रंथ साहिब का संकलन किया गया उसमें लगभग समूचे उत्तर भारत के संतों की वाणियों का संग्रह करके व्यापक एकता स्थापित करने की कोशिश की गई । गुरू नानक देव नेकौन भला को मंदाकहकर ऊंच नीच से परे व्यापक एकता का संदेश दिया । दुखी के लिए लड़ने को व्यक्ति का कर्तव्य बताकर उन्होंने धर्म का नया आयाम उद्घाटित करने की चेष्टा की । सांप्रदायिक सौहार्द की स्थापना के लिहाज से गुरु रामदास ने अमृतसर की स्थापना एक मुस्लिम धर्मावलंबी के हाथों करवाई । गुरु गोविंद सिंह ने अपने पंज पियारों को पांच भिन्न जगहों और जातियों से चुनकर बुनियादी मानव समानता का संदेश दिया । इसी तरह का प्रयास हमें चैतन्य महाप्रभु के प्रसंग में दिखाई पड़ता है जिनके प्रमुख शिष्यों में मुसलमान भी थे । समूचे भक्ति आंदोलन की यह विशेषता है कि समाज के लगभग सभी वंचित समुदायों का स्वर साहित्य में सुनाई पड़ा । स्त्रियों में आंडाल और अक्क महादेवी से लेकर मीराबाई तक तथा वंचित समुदाय से आने वाले ढेर सारे संत दिखाई देते हैं जिनमें रैदास का नाम सबसे महत्वपूर्ण है । 
भक्ति आंदोलन के साथ ही उसका अन्यतम तत्व सूफी दर्शन और साहित्य जुड़ा हुआ है । इसका प्रसार भी पंजाब से लेकर असम तक रहा । जिस तरह भक्ति, हिंदू धर्म के भीतर समानता और प्रेम का संदेश लेकर उठी उसी तरह इस्लाम के भीतर सूफी संतों की उस विराट परम्परा का जन्म हुआ जिसकी मौजूदगी इस्लाम के जन्म के पहले थी । इस्लाम के जन्म के बाद उससे कभी टकराते और कभी संवाद करते हुए सूफी संतों की इस धारा ने प्रेम का व्यापक उदार माहौल उपलब्ध कराया । जिसे भारतीय इतिहास का मध्य काल कहा जाता है उसकी सृजनात्मक उपलब्धियों में इन सूफी विचारकों और कवियों का अमूल्य योगदान रहा । पंजाब के बुल्ले और वारिस शाह और बनारस के कबीर से लेकर असम के अजान फकीर तक हमारे देश के बड़े भूभाग के बाशिंदों के मानसिक भूगोल में यह सामासिक संस्कृति समाई हुई है । इसे नष्ट करने के इरादे से भाजपा लगातार झूठ का सहारा लेकर हमारे इतिहास बोध को विकृत करना चाहती है ।
इसी व्यापक पृष्ठभूमि ने 1857 के भारतीय स्वाधीनता आंदोलन को इतना विशाल स्वरूप प्रदान किया । ज्ञातव्य है कि इस संग्राम में वर्दीधारी किसानों के नेतृत्व में ग्रामीण किसान समुदाय ने धार्मिक भेदभाव और संकीर्णता से ऊपर उठकर चर्बी लगे कारतूसों से अंग्रेजी राज से इतना जबर्दस्त लोहा लिया कि एकबारगी औपनिवेशिक शासन उखड़ ही गया । आश्चर्य नहीं कि इस विद्रोह ने मार्क्स का भी ध्यान आकर्षित किया था । विद्रोही सिपाहियों ने, जिनमें अधिकांश हिंदू थे, देश की आजादी के प्रतीक के बतौर बहादुर शाह जफ़र को अपना बादशाह घोषित किया क्योंकि उनकी चेतना में सभी देशवासी हिंदुस्तानी थे । इसकी अभिव्यक्ति विद्रोह के नेता अजीमुल्ला खान के प्रसिद्ध गीत के जरिए भी हुई थी । झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का तोपची एक मुसलमान था । हैदर अली और टीपू सुल्तान ने इसी परम्परा को आगे बढ़ाया था और इसीलिए टीपू के विरोध की भाजपाई कोशिश उसके स्वाधीनता संग्राम की समूची धारा से गद्दारी का ज्वलंत प्रमाण है । यह भी ध्यान देने की बात है कि जिस तरह आज भाजपा स्वाधीनता आंदोलन की भावना के विपरीत साम्राज्यवाद के साथ सहयोग का रुख अपनाए हुए है उसी तरह 1857 के संग्राम के दौरान ज्यादातर रजवाड़ों ने अंग्रेजी शासन का साथ दिया था ।
उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के जागरण ने हमारे देश को इस सामासिक विरासत के साथ वैज्ञानिकता और आधुनिकता की राह पर बढ़ाने में मदद की । इस जागरण का वितान भी बहुत व्यापक था । धर्म सुधार और समाज सुधार से लेकर राजनीतिक आंदोलन तक का समूचा आलोड़न सचमुच हमारे देश को नए युग में लेकर आया । इसी क्रम में पेरियार के अनीश्वरवाद से लेकर विवेकानन्द के वेदांत तक तमाम मनीषियों के विचारों ने इस देश का बौद्धिक इंद्रधनुषी वातावरण तैयार किया । इसी समय हमने ऐसे राजनीतिक नेताओं को भी देखा जिनकी दृष्टि अतीत के निर्मम विश्लेषण से लेकर भविष्य की सम्भावना तक को खंगाल रही थी । इनमें से सभी नेताओं का समूचे देश के साथ अपने क्षेत्र और समुदाय पर भी गहरा प्रभाव था । महादेव गोविंद रानाडे, राजा राम मोहन राय और रवींग्रनाथ ठाकुर जैसे लोगों ने सामाजिक सुधार के साथ स्वाधीनता की आकांक्षा को जोड़ा । स्वयं महात्मा गांधी ने देश की एकता को स्वाधीनता की लड़ाई की उपज माना और तमाम सीमाओं के बावजूद हिंदू-मुस्लिम एकता को बनाए रखा । ज्योतिबा फुले और आंबेडकर ने स्वाधीनता को दलित समुदाय तक विस्तारित करने का क्रांतिकारी एजेंडा पेश किया । इसी माहौल का एक रूप हमें उन आदिवासी आंदोलनों में भी दिखाई देता है जिनमें समुदाय के भीतर के सुधार और औपनिवेशिक सत्ता का प्रतिरोध आपस में जुड़े हुए थे । यही विरासत उन समूहों के वर्तमान हिंदूकरण के अभियान के बरक्स उन्हें सुसंगत साम्राज्यवाद विरोधी और सच्चे लोकतांत्रिक भारत के निर्माण के संघर्ष में उनकी ठोस भागीदारी सुनिश्चित कराने की जमीन मुहैया कराती है । यही समय देश में ऐसे स्त्री चिंतकों का भी है जिन्होंने परिवार के लोकतंत्रीकरण से लेकर स्त्री समुदाय की वृहत्तर सामाजिक भूमिका की दावेदारी की । 1857 की जुझारू स्त्री योद्धाओं की परंपरा में सावित्री बाई फुले, पंडिता रमाबाई और महादेवी वर्मा ने आधुनिक स्त्री जागरण के विविध वैचारिक तथा व्यावहारिक आयाम पेश किए । इस जागरण का ही एक आयाम हमें आजाद हिंद फौज में गठित लक्ष्मीबाई ब्रिगेड में भी नजर आता है जब पहली बार स्त्रियों को लड़ाकू दस्ते में शरीक किया गया । इस समय ने मुस्लिम समुदाय में अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ के साथ प्रचंड राष्ट्रवाद की भावना से लबरेज मौलाना अबुल कलाम आजाद से लेकर मजदूरों-किसानों का भारत बनाने का सपना देखने वाले मक़दूम मोइनुद्दीन तक के उभार को देखा । इसी दौर के जुझारू नेता तिलक को मिली कालेपानी की सजा के विरोध में बम्बई में आयोजित मजदूरों की हड़ताल ने लेनिन का ध्यान खींचा था ।
इस आलोड़न के साथ ही जनता द्वारा औपनिवेशिक शासन के प्रतिरोध की धारा भी प्रवाहमान रही । राजनीतिक प्रतिरोध की धारा के साथ कभी अंत:क्रिया करते हुए तो कभी उससे स्वतंत्र होकर देश में किसानों, मजदूरों और आदिवासियों के तीखे आंदोलन और संघर्ष हमेशा चलते रहे और इसके कारण अंग्रेज शासक कभी चैन से नहीं बैठ सके । झारखंड, बंगाल, पंजाब, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश जैसे क्षेत्रों में लगातार विद्रोह की आंच सुलगती रही । इन आंदोलनों ने स्वाधीनता आंदोलन की राजनीतिक धारा को बहुतेरा किसानों, मजदूरों और आदिवासियों के सवाल उठाने के लिए बाध्य किया और हमारे देश के  राजनीतिक भविष्य को एक खास स्वरूप दिया । इन्हीं आंदोलनों के चलते हमारे स्वाधीनता आंदोलन में कुछ हद तक वाम और लोकतांत्रिक अंतर्य पैदा हो सका । ये आंदोलन दमन की अति के कारण बहुतेरा हिंसक रूप भी ले लेते थे । हमारे देश की उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष चेतना के शुरू में जहां देशभक्ति से सराबोर हथियारबंद संघर्ष की धारा का प्राधान्य था वहीं उसके भीतर परिपक्वता बढ़ने के बाद समाजवाद की ओर झुकाव स्पष्ट होने लगता है । इस प्रक्रिया में बीच की कड़ी के बतौर गदर पार्टी और करतार सिंह सराभा तथा सोहन सिंह भाकना जैसे उसके नेताओं को भूलना असंभव है जिन्होंने 1857 की धार्मिक समावेशी परंपरा को उग्र उपनिवेशवाद विरोध के साथ जोड़ने की कोशिश की । इसी माहौल ने हमें स्वामी सहजानंद सरस्वती जैसा विशेष किसान नेता दिया जो संन्यासी होने के साथ ही गीता का जबर्दस्त भाष्यकार और वामपंथी आंदोलन का अगुआ भी था । गोदावरी पारुलेकर और अरुणा आसफ़ अली मानो इसी व्यापक वाम उभार की क्रमश: ग्रामीण और शहरी स्त्री प्रतिध्वनि थीं । स्वाधीनता आंदोलन के साथ वाम चेतना के इसी सहमेल ने हमारे देश में समाजवादी आंदोलन और चिंतन की एक विशेष धारा को जन्म दिया जिसके अग्रणी नेताओं में नरेंद्रदेव और लोहिया सबसे महत्वपूर्ण थे । देश की आजादी की लड़ाई के भीतर किसानों के सवाल को प्रमुखता प्रदान करने के उद्देश्य से इस धारा का जन्म हुआ था । इस काम को दो धरातलों पर उठाने की कोशिश इसके नेताओं ने की । एक तो खेतिहर समुदाय की लोकप्रिय आकांक्षा के रूप में जमींदारी के विनाश की आवाज उठाई गई । दूसरी ओर इन समुदायों में पिछड़ी जातियों की बहुलता के चलते समाज सुधार का ब्राह्मणवाद विरोधी तेवर भी इस आंदोलन की खास पहचान बनकर सामने आया । देश की आजादी के लिए चले दीर्घकालीन संघर्ष की स्वाभाविक विरासत वामपंथी धारा को हासिल हुई । इतिहास को तोड़ मरोड़ कर पेश करने के तमाम प्रतिक्रियावादी प्रयास देश की आजादी के इस आंदोलन में कम्युनिस्टों के योगदान को मिटा नहीं सकते । 
इन्हीं आंदोलनों और लेनिन के नेतृत्व में गठित तीसरे इंटरनेशनल की उपनिवेशवाद विरोधी नीतियों के चलते हमारे देश के स्वाधीनता आंदोलन में सहज ही वाम झुकाव पैदा हुआ । इस वाम झुकाव के भीतर भी जवाहर लाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस से लेकर भगत सिंह तक व्यापक और बहुआयामी वैचारिक रुझान नजर आते हैं । विशेष रूप से भगत सिंह के तीव्र वैचारिक विकास में हमें मार्क्सवाद को देश की परिस्थितियों के साथ रचनात्मक रूप से जोड़कर स्वाधीनता आंदोलन को समाजवाद की दिशा में मोड़ने का गंभीर प्रयास दिखाई देता है । सांप्रदायिकता और सामाजिक रूपांतरण के सवालों को भी उन्होंने अपने लेखन में जिस तरीके से उठाया और प्रस्तुत किया वह हमारे लिए बहुत ही मूल्यवान विरासत है ।
इसी झुकाव और दबाव के चलते राजनीतिक स्वाधीनता के बाद निर्मित संस्थाओं और ढांचों में कुछ हद तक प्रगतिशील, वैज्ञानिक और जन पक्षधर तत्व मौजूद रहे । बेहद सीमित मताधिकार के साथ निर्वाचित होते हुए भी संविधान सभा को हमारे देश को धर्म निरपेक्ष देश के रूप में परिभाषित करना पड़ा । संविधान सभा की मसौदा समिति के अध्यक्ष के बतौर आंबेडकर ने भरसक लोकतांत्रिक मूल्यों को संविधान में जगह देने की कोशिश की और समता, स्वतंत्रता तथा भाईचारे के नारे को कानूनी जामा पहनाने का सच्चा प्रयास किया । फिर भी उन्हें समाज के अलोकतांत्रिक स्वरूप और संविधान में निहित लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच के टकराव का अंदेशा था जिसका स्पष्ट उल्लेख उन्होंने देश को संविधान समर्पित करते हुए अपने भाषण में किया । उन्होंने हिंदू राष्ट्र के गठन की संभावना में देश का विनाश देखा और इसके खतरे के बारे में देशवासियों को आगाह किया ।
हमारे देश की दीर्घ परंपरा और स्वाधीनता आंदोलन के आलोड़न का प्रभाव न केवल उपर्युक्त सांस्थानिक ढांचे में प्रकट हुआ बल्कि 1946 से लेकर 1951 तक के राजनीतिक जीवन में निरंतर उपस्थित रहा । तेलंगाना विद्रोह और नाविक विद्रोह स्वाधीनता के आगे पीछे बुनियादी सामाजिक बदलाव पर आधारित मूलगामी स्वाधीनता की संभावना उजागर करते हैं । आश्चर्य नहीं कि आजाद हिंद फौज के सेनानियों- सहगल, ढिल्लों और शाहनवाज- पर चले मुकदमे के विरोध में हुई गोलबंदी ने नेहरू तक को वकालत का गाउन दुबारा पहनने के लिए मजबूर कर दिया था । इस व्यापक गोलबंदी ने मानो अशफ़ाक़ और बिस्मिल की साझा विरासत की याद ताजा कर दी । इसी प्रसंग में काश्मीर और मणिपुर में शेख अब्दुल्ला तथा इराबट सिंह के नेतृत्व में संचालित बदलाव हमारे लिए भाजपाई एकात्मता के मुकाबले सच्ची संघीयता निर्मित करने की कोशिश के लिए एक प्रारूप मुहैया कराते हैं ।      
आज हम कम्युनिस्टों पर इस बात की जिम्मेदारी आ पड़ी है कि देश के इस गौरवशाली अतीत की समस्त सकारात्मक विरासत को आयत्त करते हुए प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों और उपजाऊ जलवायु तथा दीर्घकालीन वैज्ञानिक पांडित्य वाले इस विराट देश को समाजवादी संकल्प के साथ नई सदी में आगे ले चलें । इस यात्रा में हमें समयानुकूल परिवर्तनशील सामाजिक चेतना के विकासमान इतिहास से सदैव प्रेरणा मिलती रहेगी । इसके लिए हमें अतीत की इस समृद्ध विरासत के आधार पर उसके समस्त सकारात्मक तत्वों को समाहित करते हुए जनता के भारत के ऐसे सपने का ताना बाना बुनना होगा जिसमें गांधी की हिंदू-मुस्लिम एकता, भारत को एशियाई उपनिवेशवाद विरोधी जागरण का अंग बनाने के नेहरू और लोहिया के प्रयासों, फुले-आंबेडकर और पेरियार के सामाजिक समता पर आधारित लोकतांत्रिक राजनीति को भविष्य में मुकम्मल धर्मनिरपेक्ष संघीय समाजवादी राष्ट्र और समाज बनाने के कार्यभार के साथ गूंथा जा सके ।     
इस कार्य में हमें उन ताकतों से डटकर लोहा लेना होगा जिन्होंने कभी देश के लिए कोई कुर्बानी नहीं दी । वे तो देश की जनता को सभी सम्भव तरीकों से आपस में केवल बांट देना चाहते हैं ताकि मुट्ठी भर लोग इस देश को अनंत काल तक निरंतर अबाध लूटते रह सकें । सत्तर साल पहले धर्म के नाम पर इस देश की जनता ने जो मानसिक भौगोलिक विभाजन झेला था उसके घाव अब तक सूखे नहीं हैं । अब और विभाजन हमें कमजोर और वेध्य बनाएगा । हमारा विश्वास है कि जिस देश की जनता ने आपस में व्यापकतम चट्टानी एका कायम करके दुनिया के सबसे ताकतवर साम्राज्य से लोहा लिया और उसे धूल चटा दी वह इस एकता में दरार नहीं पड़ने देगी और वर्तमान हमले का भी बहादुरी से मुकाबला करते हुए मानव गरिमा से सम्पन्न समतामूलक लोकतांत्रिक स्वतंत्रता को अपने लिए अर्जित करेगी और समाज तथा राजनीति में विषमता को स्थापित करने की इस ताजा कोशिश को मटियामेट कर देगी । इस उद्देश्य को हासिल करने के लिए सभी तरह के प्रयास करने हेतु हम संकल्पबद्ध और समर्पित हैं ।                                           

Thursday, March 1, 2018

लैटिन अमेरिकी साहित्य का गौरव


           
                                        
गैब्रिएल गार्शिया मार्खेज का नाम लैटिन अमेरिकी साहित्य के लिए गर्व का विषय है । उनका उपन्यास सौ सालों का एकांत समूचे जादुई यथार्थवादी धारा का उदाहरण बनकर उभरा । असल में उन्हें जादुई यथार्थवाद तक सीमित करने के पीछे हिंदी की साहित्यिक दुनिया की राजनीतिक मानसिकता का निर्णायक योगदान था । यदि उन्हें उपन्यास लेखन की एक कला का जनक बना दिया जाए तो उसके अनुकरण में लिखा ढेर सारा फर्जी लेखन भी प्रयोगधर्मी साबित किया जा सकता था । तब वे केवल तकनीक के खिलाड़ी बनकर रह जाते और उनके लेखन में अभिव्यक्त कठोर यथार्थ के समक्ष शर्मिंदा होने से हिंदी के सभी कथाकार आराम से बच सकते थे । सभी लोग जादू दिखा देते और इस नए फैशन में शरीक हो लेते । कोई न कहता कि तीसरी दुनिया के एक गरीब देश का लेखक जिस समय लोकतंत्र के पक्ष में खड़ा होकर जनता के दुर्भाग्य का चित्रण कर रहा है उसी समय हम हिंदी के कथाकार रेशमी भाषा में मध्यवर्ग का दुखड़ा क्यों रो रहे थे । ऐसा योजना बनाकर तो नहीं हुआ लेकिन जिस तरह जादुई यथार्थवाद का हल्ला मचाया गया उसमें मनोहर श्याम जोशी कथा कहने के शिल्प की नकल करने लगे । न केवल इतना बल्कि आलोचक गण के हाथों नागार्जुन और मुक्तिबोध जैसे प्रगतिशील लेखकों को भी इसी खित्ते में खींच लाया गया । जादुई यथार्थवाद के इर्द गिर्द बुना हुआ यह समूचा माहौल बौद्धिक दरिद्रता का प्रमाण तो था ही हिंदी के साहित्यिकों की नजाकत भरी पसंद का भी द्योतक था । उसे जादुई कह देने से उसके यथार्थ होने के मानसिक दबाव से कुछ हद तक मुक्ति मिल जाती थी ।
अगर लैटिन अमेरिका के ही थोड़ा पुराने जमाने के प्रख्यात कवि पाब्लो नेरुदा के संस्मरण देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि जिसे जादुई कहा जाता है वह असल में लैटिन अमेरिका का यथार्थ है । आश्चर्य नहीं कि नेरुदा की कविता के कलात्मक गुणगान के बीच उनके संस्मरणों की इस किताब का जिक्र ही नहीं होता । इन संस्मरणों में व्याप्त राजनीति के सहारे ही नेरुदा की कविता में निहित राजनीतिक प्रतिरोध को समझा जा सकता है । समूचे लैटिन अमेरिका में दीर्घकालीन साम्राज्यवादी हस्तक्षेप ने उस महाद्वीप के यथार्थ का निर्माण किया है । पुराने साम्राज्यवाद से लड़कर जब इन मुल्कों ने मुक्ति हासिल की तो बगल के देश अमेरिका के नए साम्राज्यवाद से सामना हुआ । उस महाद्वीप का शायद ही कोई देश होगा जिसे अमेरिका ने चैन से जीने दिया हो । लगभग प्रत्येक देश में कठपुतली सरकारों को स्थानीय आबादी के माथे पर बिठा दिया गया । इन शासकों को अपने देश की आम जनता के कल्याण की चिंता करने के मुकाबले अमेरिकी कंपनियों के व्यापारिक हितों की देखभाल करनी होती है । इसी इतिहास और वर्तमान ने लैटिन अमेरिकी देशों के उस यथार्थ को जन्म दिया है जिसमें स्थानीय मूलवासियों की हजारों साल पुरानी जीवन पद्धति और समाज व्यवस्था के साथ सभी प्राकृतिक संसाधनों को भकोसकर मुनाफा पैदा करनेवाली अत्याधुनिक सर्वभक्षी जीवन पद्धति और समाज व्यवस्था मौजूद है । कहना न होगा कि इनके बीच शांतिपूर्ण सहअस्तित्व नहीं होता । इनमें आपस में हिंसक टकराव होते हैं । जिसे जादुई यथार्थवाद की तकनीक समझा जाता है वह इसी बहुस्तरीय यथार्थ की अभिव्यक्ति है ।
याद दिलाने की जरूरत नहीं कि जो यथार्थ लैटिन अमेरिका का है, हमारे देश का भी अधिकाधिक वही यथार्थ बनता चला जा रहा है । हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति की पुत्री की भारत यात्रा के दौरान भारत सरकार के रुख को गुलामी के अतिरिक्त किस मानसिक ढांचे में समझा जा सकता है ! इसका मतलब कि मार्खेज ने जिस यथार्थ का चित्रण किया है उस यथार्थ के निर्माण में उपनिवेशवाद का योगदान है । और उसकी पैदाइश के इसी स्रोत के चलते उपनिवेशित देशों में उस यथार्थ का विस्तार होता जा रहा है । इस राजनीतिक संदर्भ से काटकर देखने से मार्खेज केवल जादू-टोना का बखान करने वाले उपन्यासकार नजर आएंगे और उनके वर्णित यथार्थ को वास्तविक संसार और समय में समझने की जरूरत नहीं रह जाएगी । क्रीतदास बौद्धिक समुदाय की ओर से यह रणनीति सोच समझकर अपनाई गई थी । जिस राजनीतिक संदर्भ में उस उपन्यास को देखा जाना अपेक्षित है उसे फ़िदेल कास्त्रो, मार्खेज और माराडोना की एक संयुक्त तस्वीर अच्छी तरह बता देती है । ये तीनों व्यक्ति लैटिन अमेरिका के औपनिवेशिक हालात के विरोध के कीर्तिस्तम्भ रहे हैं और इसलिए उनकी निकटता अचरज की बात न थी । इससे यह भी पता चलता है कि लैटिन अमेरिका में विकसित उपनिवेशवाद का यह वाम विपक्ष एकांगी नहीं था वरन उस भूभाग की सम्पूर्ण रचनात्मकता को समेटे हुए था ।
अगर आप उपन्यास के महाकाव्यात्मक स्वरूप का आनंद उठाने की प्रतिभा रखते हैं तो यह उपन्यास गहरे और दीर्घकाल तक टिकने वाले नशे जैसा प्रभाव डालता है । इस महाकाव्यात्मक उपन्यास की ढेर सारी व्याख्या की गई है । उसकी लोकप्रियता का आलम यह था कि खुद लेखक के मुताबिक ढेर सारे दोस्तों ने आपस में चंदा करके उसकी एक प्रति पढ़ने के लिए खरीदी थी । पढ़े जाने के बाद उस प्रति की हालत खस्ता हो चुकी थी । मार्खेज ने उन सबके हस्ताक्षर लेकर वह प्रति अपने पास यादगार के बतौर रख ली और उन सबको एक एक प्रति अपनी ओर से भेंट की । यह उपन्यास उनको एकाधिक असफल कोशिशों के बाद साहित्य की दुनिया में स्थापित करने में सफल रहा ।
उपन्यास मनुष्य की लोकतांत्रिक और नियंत्रणकारी चाहतों की टकराहट का भव्य चित्र प्रस्तुत करता है । मकोंदो नामक कल्पित जगह पर जब एक नया अधिकारी नियुक्त होता है तो उसे नगर की सभी इमारतों को एक ही रंग में रंगवाने की सनक सवार होती है । आश्चर्य नहीं कि वहां से लेकर यहां तक सभी तानाशाहों की सामान्य प्रवृत्ति एकरूपता से उन्मादी प्रेम है । विविधता उन्हें उलझन में डालती है । इसके बरक्स एक स्थानीय व्यक्ति बुएन्दिया साहब अड़ जाते हैं कि उनकी इमारत जिस रंग की है उसे नहीं बदलेंगे । रुचियों का यह मासूम सा विरोध मूल्यों के बड़े विरोध में बदल जाता है और आखिरकार बुएन्दिया साहब उस अधिकारी को मार डालते हैं । यहीं से बुएन्दिया द्वारा विद्रोहियों के नेतृत्व की कहानी शुरू होती है और वे तानाशाही के विरोध में लड़ाई के प्रतीक बन जाते हैं ।
इस विद्रोही के प्रति सामान्य जन में ऐसी चाहत पैदा होती है कि माताएं अपनी पुत्रियों को उनके पास गर्भधारण के लिए कारागार में भेजती हैं । इन संसर्गों से उन्हें जो बच्चे पैदा होते हैं उनका बपतिस्मा कराते समय माथे पर पादरी जो निशान लगाता है वह निशान उनकी स्थायी पहचान बन जाता है । बीच में बुएन्दिया साहब घरबारी हो जाते हैं लेकिन कुछ दिनों बाद जब फिर से विद्रोह का निश्चय करते हैं तो उनके पुत्रों को माथे के निशान के आधार पर पहचानकर भिन्न भिन्न जगहों पर एक साथ मार डाला जाता है । यह हत्याकांड बहुत कुछ हमारे देश में पिछले दिनों अलग अलग जगहों पर एक ही तरीके से मारे जाने वाले बुद्धिजीवियों की हत्याओं की याद ताजा कर देता है । यदि इस उपन्यास को लैटिन अमेरिका के एक देश में सीमित करके देखा जाएगा तो इसकी सार्वभौमिक लोकप्रियता को समझने में कठिनाई होगी । तीसरी दुनिया के उपनिवेशित देशों की साझा समस्या के बतौर समझे जाने के कारण ही हमारे देश में भी इस उपन्यास का अनुवाद विभिन्न भाषाओं में हुआ और पढ़ा भी गया ।
इसी तरह का प्रसंग उस कस्बे के पास स्थापित किसी केले के कारखाने का है जिसके मालिकान मजदूरों की मजदूरी का पैसा हजम करके गायब हो जाते हैं । मजदूर अपना पैसा वापस पाने के लिए लम्बा मुकदमा लड़ते हैं । मुकदमे के दौरान पहले तो मालिकान की पहचान स्थापित होने में समस्या आती है । वे साबित करना चाहते हैं कि उनके नाम तो वही हैं जो कारखाने के मालिकान के थे लेकिन वे लोग कोई और मनुष्य हैं । बहरहाल उनकी पहचान साबित होने के बाद कारखाने के अस्तित्व के सिलसिले में विवाद पैदा हो जाता है । इसके भी निपटने के बाद मजदूरों की पहचान की समस्या आती है । हमारे अपने देश या इसी जैसे तीसरी दुनिया के अधिकांश देशों में कारखानों और कामगारों के बीच विवाद की स्थिति में ऐसे हालात पैदा होना कोई अनजानी बात नहीं । इसी विवाद के चलते कस्बे में सबसे भीषण नरमेध होता है । इस नरमेध का भीषण दृश्य भी मार्खेज ने बहुत संवेदनशील तरीके से बुना है ।
केले के कारखाने के मालिकान मजदूरी के सवाल पर समझौता वार्ता के लिए आनेवाले हैं । रेल स्टेशन पर उनकी ट्रेन आने से पहले ही स्टेशन के बाहर मजदूरों का हुजूम एकत्र हो जाता है । भीड़ नीचे मैदान में फैली हुई है और ऊपर छतों पर सैनिक मशीनगन तानकर निशाने के घेरे में समूची भीड़ को लिए हुए हैं । ट्रेन के आने के साथ भगदड़ होती है और मशीनगनों से गोलियों की बारिश होने लगती है । अपार जन समुद्र पर बरसती गोलियों के चलते मारे गए लोगों को ट्रेन के डिब्बों में भरकर दूर कहीं फेंक देने के लिए ले जाया जाता है । लाशों के बीच से लुढ़ककर एक सज्जन बाहर गिर पड़ते हैं । पैदल चलकर वे जब वापस कस्बे पहुंचते हैं तो उनकी बातों पर कोई विश्वास करने को तैयार नहीं होता । सरकारी कागजों में न तो उस कारखाने की मौजूदगी दर्ज है और न ही ऐसी किसी घटना का विवरण ही लिखा मिलता है । यह बताने की कोई खास जरूरत नहीं कि मजदूरों के साथ कारखानों के मालिकों के ऐसे विवाद हमारे देश सहित न केवल दक्षिण एशिया के देशों में कई बार घटित हुए हैं बल्कि उनका भुलाया जाना भी कोई नई बात नहीं । हम सबकी आंखों के सामने देश की राजधानी दिल्ली के बगल में मारुति और हीरो होंडा के मजदूरों के साथ जो हुआ उस तरह के व्यवहार की एक झलक इस पूरे घटनाक्रम के चित्रण में मिलती है ।
स्मृतिभ्रंश का ऐसा ही एक और दृश्य उपन्यास में आया है और वह पूरा दृश्य इस स्मृतिभ्रंश के ऐतिहासिक कारकों की ओर इंगित करता है । होता यह है कि एक यात्री उस कस्बे में आता है और लेमनजूस जैसी मीठी गोलियों की बिक्री करता है । कस्बे के लोगों को तत्काल लाभ के लिए यह धंधा आकर्षक प्रतीत होता है और वे भी इन गोलियों को बनाना शुरू कर देते हैं । नींद आ जाने पर यदि वे सो गए तो उनका मुनाफा कम हो जाएगा इसलिए पूरा कस्बा रात दिन जागकर वे मीठी गोलियां बनाता रहता है । नतीजतन कस्बे में अनिद्रा की बीमारी फैल जाती है । नींद न पूरी होने के चलते लोगों की याददाश्त कमजोर पड़ने लगती है । पहले जब उन्हें चीजों के नाम भूलने लगते हैं तो वे वस्तुओं पर नाम लिखकर चिपकाना शुरू करते हैं । फिर उन्हें इन वस्तुओं के काम भी भूलने लगते हैं । इनके बारे में भी लिखकर रख लेने के बाद शब्दों के अर्थ भी भूलने लगते हैं । औपनिवेशिक हस्तक्षेप से लैटिन अमेरिका की स्थानीय भाषाओं के लुप्त होने का ऐसा प्रतीकात्मक आख्यान शायद ही कहीं और मिलेगा । मार्खेज इस वृत्तांत के जरिए कहना चाहते हैं कि तीसरी दुनिया के देशों में उपनिवेशवादी हस्तक्षेप से जो स्मृतिभ्रंश हुआ है उसकी मूल वजह लाभ पर आधारित पूंजीवादी समाज व्यवस्था की स्थापना है । अब भी बहुतेरे बौद्धिकजन इस स्मृतिभ्रंश का कारण संस्कृति के क्षेत्र में खोजते रहते हैं । उनकी तुलना में इस उपन्यासकार की यह सूझ न केवल अधिक मौलिक है बल्कि एक हद तक यथार्थ को समझने में अधिक कारगर भी है ।
लगभग तीस साल पहले पढ़े गए इस उपन्यास का नशा उपर्युक्त कारणों से तारी हुआ था । उसके बाद से निरंतर उनके लिखे को खोजकर पढ़ने का सिलसिला शुरू हुआ जो अब तक जारी है । क्रानिकल आफ़ ए डेथ फ़ोरटोल्डमें हत्या के सहज हो जाने का जैसा हाहाकारी चित्रण है उसे हम सभी आजकल देश के विभिन्न कोनों में होने वाली पूर्वघोषित हत्याओं में देख रहे हैं । लेखक को इस अमानवीय वातावरण में उम्मीद मनुष्य के भीतर मौजूद अपराध बोध से है जिसने उस हत्या के चश्मदीदों को ताउम्र बेचैन बनाए रखा । उपन्यास में होने वाली उस हत्या के वर्णन की कला के बीच हम उपनिवेशित समाजों में व्याप्त हिंसा के बारे में जताए गए नैतिक विरोध की आंच को ओझल कर बैठते हैं । फिर से दुहराने की जरूरत नहीं कि हिंसा की वैसी ही व्याप्ति हमारे भी देश समाज में होती जा रही है ।
मार्खेज के अध्ययन के इसी क्रम में उनके पत्रकारीय लेखन की महानता का भी अंदाजा लगा । फ़िदेल कास्त्रो और शकीरा के बारे में लिखे उनके लेखों से हमें लैटिन अमेरिकी जनता और समाज की रचनात्मकता के बहुरंगी फलक की जानकारी मिलती है जिसमें राजनीति से लेकर नृत्य तक का विस्तार है । किसी भी बड़े साहित्यकार की तरह उन्होंने कुछ परदे रचे हैं । जादू जैसी घटनाओं की मौजूदगी इसी तरह का परदा है । अगर आप धोखे के इन परदों में ही अपना पूरा ध्यान केंद्रित रखते हैं तो उस परदे के पीछे व्यक्त सच्चाई तक पहुंचने से वंचित रह जाते हैं । यदि ऐसा हुआ तो यही मानना होगा कि इस महान लेखक की साधना और लैटिन अमेरिका नामक उस महाद्वीप की साहित्यिक परंपरा में उसके योगदान का समुचित विवेचन मूल्यांकन करने में हम अक्षम हो चुके हैं । तीसरी दुनिया की साहित्यिक बिरादरी के साथ हमारी साझेदारी समझ के स्तर पर खतरे में है । इससे संकेत मिलेगा कि हमने प्रगतिशील साहित्य के वैश्विक परिप्रेक्ष्य को भी भुला दिया है । दुनिया के सभी बड़े साहित्यकारों की तरह मार्खेज ने यथार्थ का केवल चित्रण नहीं किया है बल्कि उसे समझने के कुछ अत्यंत कारगर उपकरण भी मुहैया कराए हैं ।                                     

Friday, February 23, 2018

प्यारे लीलवान की कहानी

           
                               
दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की हवा में राजनीति थी लेकिन हिंदी के अध्यापकों की तर्ज पर विद्यार्थी भी इसमें कम ही सक्रिय रहते थे । नामवर सिंह की कक्षा चल रही थी और बाहर छात्र संघ के आवाहन पर नारे लगाता जुलूस गुजरा तो उन्होंने धूमिल की कविता सुनाई कि यह विरोध काँख भी ढँकी रहे, मुट्ठी भी तनी रहे वाला है । उस समय हिंदी के विद्यार्थी मतदान करते थे, चुनाव में खड़ा नहीं होते थे । अध्यापक भी स्वाभिमानी विद्यार्थी पसंद नहीं करते थे । जिन्हें अध्यापकों की निकटता की कामना होती वे सक्रिय राजनीति से दूर रहते थे । पूरे विश्वविद्यालय में केवल हिंदी के विद्यार्थी अध्यापकों का पांव छूते थे । यह भी एक सचाई है कि समूचे हिंदी जगत में जिस संस्कृति का बोलबाला था उसका प्रतिपक्ष रचने में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के हिंदी के अध्यापक कामयाब नहीं हुए थे । स्वाभाविक था कि ऐसी स्थिति में विद्रोही किस्म के विद्यार्थियों का दम घुटता था । लीलवान भी ऐसे विद्यार्थियों में से थे इसलिए कक्षाओं में उनकी मौजूदगी थोड़ी कम ही रहती थी ।
जुलाई में प्रवेश के कुछ ही महीने बाद जब अक्टूबर में चुनाव की घोषणा हुई तो हिंदी के विद्यार्थी जयप्रकाश लीलवान का नाम संयुक्त सचिव पद के प्रत्याशी के बतौर देखकर खुशी हुई । वे इन्साफ नामक एक नए संगठन की ओर से चुनाव लड़ रहे थे । इस संगठन के बारे में जानने से उनकी आगामी भूमिका को समझने में आसानी होगी । वह साल पारंपरिक वाम छात्र संगठन एस एफ़ आई से लोकप्रिय विक्षोभ का साल था । ऊपरी तौर पर इसकी वजह चीन में तियेन-आन-मेन की घटना नजर आती थी लेकिन इसके मूल में माकपा की पिछलग्गूपन की राजनीति थी । बहरहाल उसका एक प्रतिपक्ष फ़्री थिंकरों और कुछ अराजक नक्सल गुटों के अवसरवादी संश्रय के रूप में सामने आया । इसके मुकाबले इन्साफ ज्यादा वाम समर्थक समूह था । इस संगठन से चुनाव लड़ने का फैसला लीलवान ने सचेत रूप से किया था । उनके इस फैसले की प्रतिध्वनि बाद के जीवन में लिखित साहित्य से मिलती है ।
चुनाव में जीत तो उपर्युक्त अवसरवादी संश्रय की हुई लेकिन उसके बाद एकाधिक सवाल सामने आए जिसमें विभिन्न समूहों के पक्ष की कड़ी परीक्षा हुई । अध्यापन के लिए होने वाले साक्षात्कार हेतु यू जी सी की नेट परीक्षा अनिवार्य कर दी गई । इस पर रुख तय करने के लिए विद्यार्थियों की आम सभा हुई । विभिन्न संगठनों के लिए यह संकट की घड़ी थी । प्रतिभाशाली विद्यार्थी समूह इसके पक्ष में थे लेकिन उस परीक्षा का स्वरूप ग्रामीण पृष्ठभूमि के और वंचित विद्यार्थियों के लिए बहिष्कारक था । साथ ही विविधता से भरे समाज में परीक्षा का एक ही तरीका स्वाभाविक तौर पर कुछ भूभागों के प्रत्याशियों के लिए लाभकर होता । उस परीक्षा का स्वरूप विषय की जानकारी के मुकाबले सूचना संग्रह की प्रवृत्ति को बढ़ावा देने वाला था । तब तक विश्वविद्यालय प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होने पर खुशी मनाने लगा था । फिर भी पुराना आदर्शवाद कहीं न कहीं बचा हुआ था जो नौकरशाही की सेवा को ज्ञानार्जन से बेहतर नहीं मानता था । ऐसे में लीलवान और उनके संगठन ने नेट परीक्षा के विरोध में आवाज उठाई और मतदान किया । आम तौर पर लीलवान बहुत मुखर नहीं थे लेकिन समझ और पक्ष दोनों उनका स्पष्ट होता और उससे उन्हें डिगाना कठिन होता ।   
इसके कुछ ही दिनों बाद मंडल आयोग को लागू करने की घोषणा हुई । वह ऐसा समय था जब सचमुच जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की विद्यार्थी राजनीति को बाहरी दुनिया और समाज के जटिल यथार्थ को नजदीक से देखना पड़ा । छात्र संघ ने इसकी बौद्धिक आलोचना विकसित करने का अकादमिक रुख अपनाना चाहा लेकिन बात इससे बहुत आगे चली गई थी । मतदान हुआ जिसमें मंडल आयोग का विरोध करने का फैसला हुआ । तब तक विश्वविद्यालय कुलीनता के अड्डे ही हुआ करते थे । समाज के मलाईदार सवर्ण समुदाय की ही पहुंच उच्च शिक्षा केंद्रों तक हुआ करती थी । विद्यार्थियों में मुखर भी यही समुदाय सबसे अधिक था । सरकार बुर्जुआ थी जिसने तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए ही सही एक बड़ा रणनीतिक दांव खेला था । सभी संगठन विभ्रम की स्थिति में थे । उस समय लीलवान और उनके संगठन ने मंडल आयोग का समर्थन किया था । थोड़े दिनों बाद उनके संगठन के वरिष्ठ नेता सरकार के मंत्री जार्ज फ़र्नांडिस के करीब जाने लगे । लीलवान आखिरकार प्रतिबद्ध वामपंथी थे सो इस प्रक्रिया में सक्रिय राजनीति से दूर होते गए ।        
लीलवान की कविता और राजनीति की यही कुंजी है । पारंपरिक वाम के विरोध में लेकिन अराजक वामपंथ या अवसरवादी समूह निर्माण के मुकाबले व्यापक वाम के भीतर वे अपनी कविता और राजनीति में जीवन भर बने रहे । अपनी इसी वैचारिक स्थिति के चलते वे अस्मितावादियों में मार्क्सवादी और जड़ मार्क्सवादियों में अस्मितावादी समझे जाते रहे । बहरहाल जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पढ़ते या चुनाव लड़ते हुए अस्मिता के मुकाबले उनका मार्क्सवाद ही अधिक मुखर रहा ।
अध्ययन के खत्म होने के बाद मिली नौकरी में अपने आपको गला देना किसी भी रचनात्मक और प्रतिभाशाली मनुष्य के लिए मुश्किल होता है । कुछ दिनों के असमंजस के बाद लीलवान ने कविता लिखने का रास्ता अपनाया । आरक्षण पर हुए बवाल के बाद अस्मिता की राजनीति धीरे धीरे उभर रही थी । दलित लेखकों का एक समूह हिंदी साहित्य की दुनिया में दाखिल होने की कोशिश कर रहा था । इसके लिए सबसे बड़ी चुनौती साहित्य के बारे में अभिजात नजरिए से टकराना था । पहले की तरह ही खामोशी के साथ लेकिन दृढ़तापूर्वक लीलवान इन लेखकों के साथ शामिल हो गए । उनके असमय देहांत ने मेरे लिए एक खामोश समर्थक दोस्त तो छीना ही हिंदी की साहित्यिक दुनिया में बदलाव लाने के लिए प्रतिबद्ध एक आंदोलन का प्रबल योद्धा भी हमसे छीन लिया था ।

उनके जीवित रहते बिना बहुत बोले भी एक तरह का संवाद जारी रहता था । उसे और भी गहन बनाया जा सकता था । इसका दोनों को लाभ मिलता लेकिन कुछ चीजों के सिलसिले में अफसोस ही उनकी कहानी बनकर रह जाता है । लीलवान के लेखन में उनकी पक्षधरता के साथ गहरी समझ भी प्रत्यक्ष है ।         

Friday, February 2, 2018

कुबेर दत्त की निगाह में रामविलास शर्मा

            
कुबेर दत्त की लिखी, सम्पादित और परिकल्पित प्रस्तुत किताब अपने आपमें नायाब दस्तावेज है कुबेर दत्त केवल दूरदर्शन माध्यम के सिद्धहस्त और समर्पित कलाकार थे बल्कि कला के तमाम रूपों में उनकी गहन गति थी इसके साथ ही उनमें साहित्य से अनुराग, समझ और स्पष्ट पक्षधरता भी थी इन सबकी अभिव्यक्ति इस किताब में हुई है आकार में छोटी होने के बावजूद कई खंडों में प्रकाश्य किताबों की सामग्री इसमें भरी हुई है रामविलास शर्मा का साहित्य तो विशाल है ही, उसके बहुत सारे विविध पहलू भी हैं इतनी विशालता और बहुआयामी चिंतन लेखन को देख पाना लगभग असम्भव प्रतीत होता है यह किताब इस काम के लिए मार्गदर्शक है कि किसी विराट व्यक्तित्व को किस तरह एक छोटी सी किताब में रोचक तरीके से समेट दिया जाए किताब में किसी भी कदम पर बोझ का अनुभव नहीं होता रामविलास शर्मा को समग्रता में समझने के लिए इस तरह की किताब की जरूरत बहुत दिनों से थी कुबेर दत्त की बहुमुखी सृजनात्मकता के प्रमाण भी इस किताब में बिखरे हुए हैं
रामविलास शर्मा के जीवित रहते उन पर हमला करना एक अवसरवादी उद्योग था ढेर सारे विद्वानों की कृपा प्राप्त करने का यह बेहद आसान रास्ता था इस रास्ते पर चलकर हिंदी साहित्य की प्रोफ़ेसरी तक हासिल हो जाती थी ऐसे हमलावरों के विरोध में कुबेर जी का सात्विक क्रोध भी किताब में प्रकट हुआ है रामविलास जी के आसपास का पूरा जमघट भी किताब में उपस्थित है । इस विशाल जमघट में व्यक्तियों के साथ घटनाओं और विचारों की भी जोरदार मौजूदगी है । इसमें केदारनाथ अग्रवाल के साथ दोस्ती तो है ही, उनकी कविता के बहाने आधुनिक हिंदी साहित्य का वैकल्पिक इतिहास लिखने का इशारा भी है । इसके साथ नागार्जुन और निराला भी उपस्थित हैं । उस प्रस्तावित इतिहास की धुरी 1946 के नाविक विद्रोह का क्रांतिकारी माहौल है । इस माहौल की काव्यात्मक छाया को खोलने के क्रम में कविता के विश्लेषण के परिष्कृत औजारों का विनियोग भी अच्छी तरह से किया गया है । सभी जानते हैं कि रामविलास शर्मा के लिए 1857 बेहद जरूरी संदर्भ है । उनके भाषा चिंतन में निहित उपनिवेशवाद विरोध को भी पहचाना गया है । जीवन के आखिरी दिनों में ॠगवेद का जिक्र उनकी लगभग प्रत्येक किताब में होता था । अपने इस अभियान का परिप्रेक्ष्य भी रामविलास जी ने स्पष्ट किया है । मार्क्सवाद और भारत का विवेचन तो उनक मौलिक योगदान था । किताब में ढेर सारे निजी जीवन के प्रसंग भी बेलाग आए हैं । उनकी किताबों में संगीत का जिक्र अक्सर आता है । ऊपर से समझ नहीं आता कि इसकी शिक्षा उन्होंने कब पाई । किताब में संगीत से उनके लगाव के साथ न सीख पाने का क्षोभ भी मर्यादित ढंग से जाहिर हुआ है । रामविलास जी के भाषा संबंधी चिंतन के एक साथी किशोरीदास वाजपेयी भी थे । कुबेर जी ने कनखल में जाकर किशोरीदास वाजपेयी से मुलाकात की थी । उस प्रसंग को भी रामविलास जी के संदर्भ में कुबेर जी ने सुचारु तरीके से व्यक्त किया है । साहित्य के विवेचन में रामविलास जी ने रूपवादियों से अधिक गहरी रूप की सामाजिक व्याख्या की है । इन सब बातों के साथ ही निजी जीवन को याद करते हुए रामविलास जी ने पूर्वजों की विरासत को सहेजने की आवश्यकता बताई है, पढ़ाई के स्थानों की स्मृति को ताजा किया है और अध्यापकों की सीखें गिनाई हैं । इस किताब से रामविलास जी की किताबों के परिप्रेक्ष्य प्रकट होते हैं । समूचे हिंदी समाज और साहित्य की जन पक्षधर विवेचना का रामविलास जी की विराट परियोजना का परिचय मिलता है । इस किताब में इतना सब कुछ तो है ही, कुबेर जी का कवि भी बीच बीच में मारक जीवंत गद्य की झलक दिखलाता चलता है ।
कुछ किताबें ऐसी होती हैं कि उनका कोई भी परिचय मूल पुस्तक को पढ़ने के आनंद का स्थान नहीं ले सकता । उनकी मौलिक रचनात्मकता विधाओं की संकीर्ण सीमाओं को तोड़कर धड़ल्ले से उन्हें अनूठी कृति के बतौर स्थापित कर देती है । कुबेर दत्त की यह किताब ऐसी ही नायाब रचना है । इसकी संक्षिप्ति और विस्तार दोनों स्पृहणीय हैं । इसमें जितने रामविलास शर्मा हैं उतने ही कुबेर दत्त भी हैं । जगह जगह कुबेर दत्त की खामोशी भी उनकी शाब्दिक मुखर अभिव्यक्ति की तरह ही बोलती गई है । जहां जरूरी लगा वहां रामविलास शर्मा को बोलने दिया गया है और जहां जरूरी लगा वहां कुबेर दत्त बोलते हैं । स्वाभाविक है कि कुबेर जी कम बोले हैं लेकिन उस हस्तक्षेप की प्रस्तुति इतनी सक्षम है कि लगता है उसके बिना कुछ अधूरा छूट रहा था, बात पूरी नहीं हो रही थी । इस हस्तक्षेप के बाद अब पूरी हुई है ।
रामविलास शर्मा के व्यक्तित्व और सोच विचार को सही संदर्भ में देखने के लिए यह किताब अनिवार्य साबित होगी । निजी जीवन की उनकी सादगी और दृढ़ प्रतिबद्धता के साथ साथ बाज के उड़ान जैसी व्यापकता और ऊंचाई तथा सूक्ष्म पर्यवेक्षण के साथ साथ तीक्ष्ण विश्लेषण इस किताब में पूरी भव्यता के साथ प्रकट हुए हैं । किताब उनके लिए भी उपयोगी है जिन्होंने रामविलास शर्मा का अधिकांश लेखन पढ़ रखा है और उनके लिए भी इसका महत्व कम नहीं है जो रामविलास जी का लेखन बस अभी पढ़ना शुरू कर रहे हैं ।   

                                                              

Thursday, December 21, 2017

पूंजीवाद का संक्षिप्त इतिहास

                  
                                         
2017 में बाडली हेड से यनाइस वरफ़काइस की किताब ‘टाकिंग टु माइ डाटर एबाउट द इकोनामी: ए ब्रीफ़ हिस्ट्री आफ़ कैपिटलिज्म’ का प्रकाशन हुआ । ग्रीक से इसका अंग्रेजी अनुवाद जेकब मो ने लेखक यनाइस के साथ मिलकर किया है । ग्रीक में 2013 में इसका प्रकाशन हुआ था । लिखने का कारण यह था कि अर्थशास्त्र जैसी महत्वपूर्ण चीज को वे सिर्फ अर्थशास्त्रियों के हाथ में छोड़ना उचित नहीं समझते थे । इस विषय का अध्यापन करते हुए उन्हें लगता था कि नौजवानों को आसानी से समझ में आने लायक भाषा में इसे बताना जरूरी है । उन्हें महसूस हुआ कि अर्थशास्त्र के माडल जितना ही वैज्ञानिक होते गए हैं उतना ही अर्थशास्त्र वास्तविक अर्थतंत्र से दूर होता गया है । किताब अर्थशास्त्र को लोकप्रिय बनाने के मुकाबले इस मकसद से लिखी गई है कि आम लोग अर्थतंत्र को अपने कब्जे में ले लें । अर्थतंत्र को समझने के लिए यह भी जानना जरूरी है कि इसके विशेषज्ञ आम तौर पर गलत बातें बोलते हैं । बेहतर समाज और प्रामाणिक लोकतंत्र की स्थापना के लिए सबका अर्थतंत्र के बारे में आधिकारिक रूप से बोलना और जानना बहुत जरूरी है । अर्थतंत्र के उतार चढ़ाव से हमारे जीवन में चाहे अनचाहे ढेर सारी चीजें तय होती हैं, उसकी ताकत ने लोकतंत्र को मजाक बनाकर रख दिया है, उसकी सेहत से हमारी आशा आकांक्षा का रूप तय होता है । यह किताब बिना किसी संदर्भ, पाद टिप्पणी या अकादमिक तामझाम के लिखी गई है । केवल नौ दिनों में इसे लेखक ने एक झोंक में लिख डाला । इसके छपने के बाद ग्रीस के हालात ने उन्हें देश का वित्त मंत्री बना दिया । देश की जनता की ओर से उन्हें लगातार पूंजी के अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों से जूझना पड़ा । उनका कहना है कि आज की तमाम समस्याओं पर बात करते हुए अधिकतर सबसे प्रमुख सचाई यानी पूंजीवाद की चर्चा नहीं की जाती । लेखक ने मूल रूप से पूंजीवाद की ही बात की है लेकिन उसका सीधा उल्लेख किए बिना उसकी जगह पर ‘बाजार समाज’ जैसे सुबोध पद का इस्तेमाल किया है । किताब की शुरुआत ही मजेदार तरीके से होती है जब विषमता को समझाने के लिए वे कहते हैं कि सभी बच्चे नंगे पैदा होते हैं लेकिन उसके तुरंत बाद कुछ को महंगे कपड़ों में ढक दिया जाता है जबकि अधिकतर बच्चों को चीथड़े लपेटे रहना पड़ता है । कुछ समय बीतने के बाद कुछ उपहार में कपड़ों की जगह फोन की उम्मीद करने लगते हैं जबकि ज्यादातर जूते पहनकर स्कूल जाने को तरसते रहते हैं । कुछ बच्चों को स्कूल में हिंसा और अभाव का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं करना पड़ता । यनाइस की लड़की सिडनी में शिक्षा प्राप्त कर रही थी जिसके साथ कल्पित बातचीत के रूप में किताब लिखी गई है । यनाइस उसे सोचने के लिए उकसाते हैं कि आस्ट्रेलिया में इंग्लैंड से आकर गोरे लोगों ने स्थानीय निवासियों का कत्ल करके कब्जा किया । इसके उलट यह भी तो हो सकता था कि आस्ट्रेलिया के आदिवासी लंदन पर कब्जा कर लेते । उनका कहना है कि अगर इस सवाल के बारे में ठीक से नहीं विचार करेंगे तो यही मानेंगे कि या तो यूरोपीय लोग अधिक बुद्धिमान और सक्षम थे या आस्ट्रेलिया के आदिवासी भले थे । यहां आकर विषमता का सवाल बुद्धिमत्ता और क्षमता से जुड़ जाता है ।
यनाइस का कहना है कि बहुतेरे लोग बाजार और अर्थतंत्र को एक ही चीज समझ लेते हैं लेकिन ऐसा नहीं है । विनिमय के लिए बाजार पहले से था, अर्थतंत्र बाद में आया । उसकी विकास प्रक्रिया को मनुष्य के विकास से जोड़कर देखने की कोशिश उन्होंने की है । उनके अनुसार भाषा और भोजन ऐसी दो चीजें हैं जिनके चलते मनुष्य अपनी प्राकृतिक अवस्था से बाहर आया । भाषा से पहले भी मनुष्य के कंठ में ध्वनि थी लेकिन भाषा उसका सर्वथा नया उपयोग थी । इसी तरह प्रकृति से प्राप्त सामग्री को आग के उपयोग से सुपाच्य बनाना भोजन के क्षेत्र में बहुत बड़ा बदलाव था । इन बदलावों ने मनुष्य को अन्य प्राणियों से अलग रास्ते पर डाल दिया । जनसंख्या की बढ़ोत्तरी ने प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं के अतिरिक्त भोजन का कोई और रास्ता खोजने की जरूरत पैदा की । इसी क्रम में खेती होनी शुरू हुई । खेती से ही अधिशेष का जन्म हुआ क्योंकि इसकी उपज को बचाकर रखा जा सकता था । इससे पैदा हुए बदलावों में उनके अनुसार लेखन, कर्ज, धन (मुद्रा), राज्य (सरकार), नौकरशाही, सेना, पुरोहित, तकनीक और आदिम किस्म के जैव-रासायनिक युद्ध को शामिल किया जा सकता है ।
इसी क्रम में बाजार समाज का उदय हुआ । इसे बाजार युक्त समाज से वे अलगाते हैं । उनके अनुसार बाजार शुरू से रहा है लेकिन बाजार समाज का उदय कृषि आधारित समाज के विनाश के बाद ही हुआ । कृषि आधारित समाज के खात्मे की कहानी को विस्तार से समझाने के बाद उन्होंने इस पहलू पर भी रोशनी डाली है कि यह प्रक्रिया पहले इंग्लैंड में ही क्यों पूरी हुई । बाजार समाज के संचालन में मुख्य भूमिका कर्ज की होती है । इसके लिए कर्ज वैसे ही है जैसे ईसाइयत के लिए नर्क: बहुत ही दुखद लेकिन अपरिहार्य । शुरू में कर्ज पर ब्याज की मनाही इस्लाम की तरह ही ईसाइयत में भी थी लेकिन बाजार समाज की जरूरत के चलते खुद ईसाइयत ही विभाजित हो गई और नया प्रोटेस्टेन्ट चर्च विकसित हो गया । बचत के मुकाबले खर्च करना ही पूंजीवाद को टिका सकता है । खर्च करने के लिए कर्ज लेना पड़ता है । कर्ज लौटाने की नैतिकता के बारे में ढेर सारी कहानियों तो मौजूद हैं ही इनके ही साथ ब्याज की वापसी को भी जोड़ दिया गया । कर्ज लेने देने की इस प्रक्रिया में बैंक नामक संस्था का उदय हुआ ।
जब कर्ज पर ब्याज लेने में निहित शर्म समाप्त हो गई तो कर्ज देने वाले बैंक ब्याज के जरिए अकूत मुनाफ़ा लूटने लगे । इनके पास धन की अदला बदली के मामले में अपार ताकत आ गई । उन्होंने इस ताकत का इस्तेमाल करके इस अदला बदली की व्यवस्था को अचानक ठप करना शुरू कर दिया । कर्ज का गणित यह है कि भविष्य में होने वाली आमदनी से कर्ज की वापसी की आशा होती है । भविष्य के विनिमय मूल्य के आधार पर वर्तमान में कर्ज लिया जाता है । थोड़ा बहुत उधार तो परिवारीजन, दोस्त मित्र और सहयोगियों से जुटाया जा सकता है लेकिन बड़ा कर्ज देने के लिए बैंक होते हैं । पहले बैंक लोगों से उनकी बचत जमा करवाते थे और जरूरतमंद को कर्ज देते थे । जमा करने वाले को ब्याज कम देते और कर्ज पर बेशी ब्याज वसूलते थे । इस तरह उन्हें मुनाफ़ा मिलता था । अब वे कर्ज की रकम देने के लिए अपनी बचत का ध्यान नहीं रखते । अपने पास रकम हुए बिना भी कागज पर कर्ज दे देते हैं । जिसे वे कर्ज देते हैं भविष्य में उसके व्यवसाय की सफलता की आशा होती है । भविष्य की उस सफलता के एवज में वे कर्ज लेने वाले से ब्याज और तमाम अन्य खर्च वसूलते हैं । चूंकि बैंकों को इस कर्ज से मुनाफ़ा मिलता है इसलिए वे कर्ज पर कर्ज दिए चले जाते हैं । बैंक पहले चुकाने वाले की क्षमता आंककर कर्ज दिया करते थे लेकिन 1920 दशक से इस तरह की सावधानी समाप्त हो गई । औद्योगिक क्रांति के बाद आबार समाजों का अर्थतंत्र विशाल हो गया और उनके लिए कर्ज के ईंधन की जरूरत भी बढ़ती गई । दूसरी ओर बैंकों ने गड़बड़ी की हालत में उसके परिणामों से अपने आपको सुरक्षित रखने का तरीका खोज निकाला । इसके लिए उन्होंने बचत से अधिक ब्याज पर इन कर्जों के शेयर बेच दिए । यह ब्याज कर्ज पर मिलने वाले ब्याज से कम ही होता था इसलिए बैंक का मुनाफ़ा कायम रहता था । कर्ज लेने वाले के दिवालिया होने पर बैंक की जगह शेयर धारक नुकसान उठाते थे । लेकिन एक समय बाद ये कर्ज ऐसी अवस्था में पहुंच गए कि कर्जदार को होने वाला कोई भी मुनाफ़ा बैंक के कर्ज की वापसी में मददगार न रह गया । जिस भविष्य की आशा में ये कर्ज दिए गए थे वह भविष्य कर्ज के बोझ के नीचे चरमराने लगा । व्यवसाय बंद हुए, रोजगार छिने और कर्ज के लौटने की सम्भावना जाती रही । बैंक के डूबने की अफवाह के चलते लोग अपनी बचत का पैसा निकलने लगे । बैंक के पास पैसा तो था ही नहीं वह तो कर्ज के बतौर बाहर था । लोगों की बचत की रकम पर बैंक ने डाका डाला । असल में जिस प्रक्रिया से मुनाफ़ा और संपदा का जन्म होता है उसी प्रक्रिया से संकट भी पैदा होता है । बैंक जब संकट में फंसते हैं तो उसी सरकार से बचाने की गुहार लगाते हैं जिसे अन्यथा वे सभी जरूरी कामों से निकाल बाहर करना चाहते हैं । सरकार भी सीधे उनकी मदद करने की जगह केंद्रीय बैंक की मार्फत उसी तरह भविष्य में सफलता की आशा में बिना धन रहे भी कर्ज दे देती है ।

इसी क्रम में वे मशीन के सवाल पर भी विचार करते हैं । मशीन की अंतर्विरोधी भूमिका की पहचान करते हुए वे बताते हैं कि मशीन से उत्पादन तो बढ़ता है लेकिन उसे खरीदने वाले कम हो जाते हैं क्योंकि मशीन किसी व्यक्ति को विस्थापित करती है । व्यक्ति के पास धन नहीं आएगा तो मशीन की सहायता से बढ़ा हुआ उत्पादन खरीदेगा कौन । मशीन के सवाल पर वे लुड के समर्थकों को भी याद करते हैं और कहते हैं कि वे मशीन के उपयोग के विरोध में नहीं थे बल्कि मशीन पर मुट्ठी भर लोगों के कब्जे का विरोध कर रहे थे ।बिटक्वाइन जैसी मुद्रा को वे मुद्रा पर राज्य के एकाधिकार का विरोध मानते हैं । उन्होंने बताया है कि 2007 के वित्तीय संकट के तुरंत बाद इसका आगमन अनायास नहीं हुआ । इस संबंध में उनकी मान्यता है कि मुद्रा का आविष्कार ही विनिमय के मुकाबले कर्ज को दर्ज करने के लिए हुआ था इसलिए उसके साथ राज्य का जुड़ाव अवश्यंभावी है । वे सवाल उठाते हैं कि यदि बिटक्वाइन की चोरी हो जाए तो इसे कौन देखेगा । इससे साबित होता है कि मुद्रा के साथ ही राज्य सहित तमाम संस्थाओं का उद्भव संयोग नहीं है । अपनी बात की पुष्टि के लिए वे एकदम शुरुआती मुद्रा के बतौर प्रयुक्त कौड़ियों का हवाला देते हैं जिन पर सार्वजनिक भंडार में जमा व्यक्ति के अनाज की मात्रा दर्ज हुआ करती थी । लेकिन उस मात्रा में अनाज की वापसी राज्य ही सुनिश्चित करता था ।   
पारंपरिक शब्दावली की जगह नई शब्दावली का इस्तेमाल उन्होंनेउपयोग मूल्यके लिए भी किया है । इसके लिए वे अंग्रेजी मेंएक्सपीरिएन्शियलपद का प्रयोग करते हैं यानी जिसका अनुभव मात्र किया जा सके या हिंदी में उसे हमआनुभविक मूल्यकह सकते हैं । इसके साथ ही वे यह भी बताते हैं कि मजदूर की श्रमशक्ति को केवल उसके विनिमय मूल्य के लिए खरीदा जाता है जबकि अन्य चीजों का विनिमय मूल्य उनके आनुभविक मूल्य पर आधारित होता है । पर्यावरण के सवाल पर लेखक का कहना है कि बाजार समाज इसके लिए कभी काम नहीं करेगा क्योंकि पर्यावरण में कोई विनिमय मूल्य नहीं होता और बाजार समाज के लिए मूल्यवान वही है जिसमें विनियम मूल्य है । इस समाज के समर्थकों का कहना है कि चूंकि पर्यावरण सबका है इसलिए किसी का नहीं है । जब वह किसी का नहीं है तो उसकी चिंता कोई क्यों करे । इसका हल उसके पास यह है कि जो सामुदायिक है उसका निजीकरण कर दिया जाए । जब वह किसी की निजी संपत्ति हो जाएगा तो स्वाभाविक रूप से वह व्यक्ति उसे सुरक्षित रखने का प्रयत्न करेगा । यनाइस निजीकरण के इस वैचारिक अभियान के विकल्प के रूप में सब कुछ के लोकतंत्रीकरण का नारा देते हैं । अंत में वे घोषित करते हैं कि अर्थशास्त्र बाजार समाज को कायम रखने का औजार है और व्यर्थ ही वैज्ञानिकता का दावा करता है । जिस परिघटना का यह अध्ययन करता है उसमें कुछ भी ऐसा नहीं होता जो प्रयोगशाला के सुरक्षित वातावरण में सम्भव है । इस विषय में अपने प्रवेश को वे विशेषज्ञों के एकाधिकार को तोड़ने की कार्रवाई बताते हैं । अर्थशास्त्र के साथ ही मीडिया को भी वे बाजार समाज के निर्णायक संरक्षकों में मानते हैं । इन दोनों को वे उस विचारधारा का अंग मानते हैं जो बाजार समाज को अजेय बताती है ।