Friday, February 23, 2018

प्यारे लीलवान की कहानी

           
                               
दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की हवा में राजनीति थी लेकिन हिंदी के अध्यापकों की तर्ज पर विद्यार्थी भी इसमें कम ही सक्रिय रहते थे । नामवर सिंह की कक्षा चल रही थी और बाहर छात्र संघ के आवाहन पर नारे लगाता जुलूस गुजरा तो उन्होंने धूमिल की कविता सुनाई कि यह विरोध काँख भी ढँकी रहे, मुट्ठी भी तनी रहे वाला है । उस समय हिंदी के विद्यार्थी मतदान करते थे, चुनाव में खड़ा नहीं होते थे । अध्यापक भी स्वाभिमानी विद्यार्थी पसंद नहीं करते थे । जिन्हें अध्यापकों की निकटता की कामना होती वे सक्रिय राजनीति से दूर रहते थे । पूरे विश्वविद्यालय में केवल हिंदी के विद्यार्थी अध्यापकों का पांव छूते थे । यह भी एक सचाई है कि समूचे हिंदी जगत में जिस संस्कृति का बोलबाला था उसका प्रतिपक्ष रचने में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के हिंदी के अध्यापक कामयाब नहीं हुए थे । स्वाभाविक था कि ऐसी स्थिति में विद्रोही किस्म के विद्यार्थियों का दम घुटता था । लीलवान भी ऐसे विद्यार्थियों में से थे इसलिए कक्षाओं में उनकी मौजूदगी थोड़ी कम ही रहती थी ।
जुलाई में प्रवेश के कुछ ही महीने बाद जब अक्टूबर में चुनाव की घोषणा हुई तो हिंदी के विद्यार्थी जयप्रकाश लीलवान का नाम संयुक्त सचिव पद के प्रत्याशी के बतौर देखकर खुशी हुई । वे इन्साफ नामक एक नए संगठन की ओर से चुनाव लड़ रहे थे । इस संगठन के बारे में जानने से उनकी आगामी भूमिका को समझने में आसानी होगी । वह साल पारंपरिक वाम छात्र संगठन एस एफ़ आई से लोकप्रिय विक्षोभ का साल था । ऊपरी तौर पर इसकी वजह चीन में तियेन-आन-मेन की घटना नजर आती थी लेकिन इसके मूल में माकपा की पिछलग्गूपन की राजनीति थी । बहरहाल उसका एक प्रतिपक्ष फ़्री थिंकरों और कुछ अराजक नक्सल गुटों के अवसरवादी संश्रय के रूप में सामने आया । इसके मुकाबले इन्साफ ज्यादा वाम समर्थक समूह था । इस संगठन से चुनाव लड़ने का फैसला लीलवान ने सचेत रूप से किया था । उनके इस फैसले की प्रतिध्वनि बाद के जीवन में लिखित साहित्य से मिलती है ।
चुनाव में जीत तो उपर्युक्त अवसरवादी संश्रय की हुई लेकिन उसके बाद एकाधिक सवाल सामने आए जिसमें विभिन्न समूहों के पक्ष की कड़ी परीक्षा हुई । अध्यापन के लिए होने वाले साक्षात्कार हेतु यू जी सी की नेट परीक्षा अनिवार्य कर दी गई । इस पर रुख तय करने के लिए विद्यार्थियों की आम सभा हुई । विभिन्न संगठनों के लिए यह संकट की घड़ी थी । प्रतिभाशाली विद्यार्थी समूह इसके पक्ष में थे लेकिन उस परीक्षा का स्वरूप ग्रामीण पृष्ठभूमि के और वंचित विद्यार्थियों के लिए बहिष्कारक था । साथ ही विविधता से भरे समाज में परीक्षा का एक ही तरीका स्वाभाविक तौर पर कुछ भूभागों के प्रत्याशियों के लिए लाभकर होता । उस परीक्षा का स्वरूप विषय की जानकारी के मुकाबले सूचना संग्रह की प्रवृत्ति को बढ़ावा देने वाला था । तब तक विश्वविद्यालय प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होने पर खुशी मनाने लगा था । फिर भी पुराना आदर्शवाद कहीं न कहीं बचा हुआ था जो नौकरशाही की सेवा को ज्ञानार्जन से बेहतर नहीं मानता था । ऐसे में लीलवान और उनके संगठन ने नेट परीक्षा के विरोध में आवाज उठाई और मतदान किया । आम तौर पर लीलवान बहुत मुखर नहीं थे लेकिन समझ और पक्ष दोनों उनका स्पष्ट होता और उससे उन्हें डिगाना कठिन होता ।   
इसके कुछ ही दिनों बाद मंडल आयोग को लागू करने की घोषणा हुई । वह ऐसा समय था जब सचमुच जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की विद्यार्थी राजनीति को बाहरी दुनिया और समाज के जटिल यथार्थ को नजदीक से देखना पड़ा । छात्र संघ ने इसकी बौद्धिक आलोचना विकसित करने का अकादमिक रुख अपनाना चाहा लेकिन बात इससे बहुत आगे चली गई थी । मतदान हुआ जिसमें मंडल आयोग का विरोध करने का फैसला हुआ । तब तक विश्वविद्यालय कुलीनता के अड्डे ही हुआ करते थे । समाज के मलाईदार सवर्ण समुदाय की ही पहुंच उच्च शिक्षा केंद्रों तक हुआ करती थी । विद्यार्थियों में मुखर भी यही समुदाय सबसे अधिक था । सरकार बुर्जुआ थी जिसने तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए ही सही एक बड़ा रणनीतिक दांव खेला था । सभी संगठन विभ्रम की स्थिति में थे । उस समय लीलवान और उनके संगठन ने मंडल आयोग का समर्थन किया था । थोड़े दिनों बाद उनके संगठन के वरिष्ठ नेता सरकार के मंत्री जार्ज फ़र्नांडिस के करीब जाने लगे । लीलवान आखिरकार प्रतिबद्ध वामपंथी थे सो इस प्रक्रिया में सक्रिय राजनीति से दूर होते गए ।        
लीलवान की कविता और राजनीति की यही कुंजी है । पारंपरिक वाम के विरोध में लेकिन अराजक वामपंथ या अवसरवादी समूह निर्माण के मुकाबले व्यापक वाम के भीतर वे अपनी कविता और राजनीति में जीवन भर बने रहे । अपनी इसी वैचारिक स्थिति के चलते वे अस्मितावादियों में मार्क्सवादी और जड़ मार्क्सवादियों में अस्मितावादी समझे जाते रहे । बहरहाल जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पढ़ते या चुनाव लड़ते हुए अस्मिता के मुकाबले उनका मार्क्सवाद ही अधिक मुखर रहा ।
अध्ययन के खत्म होने के बाद मिली नौकरी में अपने आपको गला देना किसी भी रचनात्मक और प्रतिभाशाली मनुष्य के लिए मुश्किल होता है । कुछ दिनों के असमंजस के बाद लीलवान ने कविता लिखने का रास्ता अपनाया । आरक्षण पर हुए बवाल के बाद अस्मिता की राजनीति धीरे धीरे उभर रही थी । दलित लेखकों का एक समूह हिंदी साहित्य की दुनिया में दाखिल होने की कोशिश कर रहा था । इसके लिए सबसे बड़ी चुनौती साहित्य के बारे में अभिजात नजरिए से टकराना था । पहले की तरह ही खामोशी के साथ लेकिन दृढ़तापूर्वक लीलवान इन लेखकों के साथ शामिल हो गए । उनके असमय देहांत ने मेरे लिए एक खामोश समर्थक दोस्त तो छीना ही हिंदी की साहित्यिक दुनिया में बदलाव लाने के लिए प्रतिबद्ध एक आंदोलन का प्रबल योद्धा भी हमसे छीन लिया था ।

उनके जीवित रहते बिना बहुत बोले भी एक तरह का संवाद जारी रहता था । उसे और भी गहन बनाया जा सकता था । इसका दोनों को लाभ मिलता लेकिन कुछ चीजों के सिलसिले में अफसोस ही उनकी कहानी बनकर रह जाता है । लीलवान के लेखन में उनकी पक्षधरता के साथ गहरी समझ भी प्रत्यक्ष है ।         

Friday, February 2, 2018

कुबेर दत्त की निगाह में रामविलास शर्मा

            
कुबेर दत्त की लिखी, सम्पादित और परिकल्पित प्रस्तुत किताब अपने आपमें नायाब दस्तावेज है कुबेर दत्त केवल दूरदर्शन माध्यम के सिद्धहस्त और समर्पित कलाकार थे बल्कि कला के तमाम रूपों में उनकी गहन गति थी इसके साथ ही उनमें साहित्य से अनुराग, समझ और स्पष्ट पक्षधरता भी थी इन सबकी अभिव्यक्ति इस किताब में हुई है आकार में छोटी होने के बावजूद कई खंडों में प्रकाश्य किताबों की सामग्री इसमें भरी हुई है रामविलास शर्मा का साहित्य तो विशाल है ही, उसके बहुत सारे विविध पहलू भी हैं इतनी विशालता और बहुआयामी चिंतन लेखन को देख पाना लगभग असम्भव प्रतीत होता है यह किताब इस काम के लिए मार्गदर्शक है कि किसी विराट व्यक्तित्व को किस तरह एक छोटी सी किताब में रोचक तरीके से समेट दिया जाए किताब में किसी भी कदम पर बोझ का अनुभव नहीं होता रामविलास शर्मा को समग्रता में समझने के लिए इस तरह की किताब की जरूरत बहुत दिनों से थी कुबेर दत्त की बहुमुखी सृजनात्मकता के प्रमाण भी इस किताब में बिखरे हुए हैं
रामविलास शर्मा के जीवित रहते उन पर हमला करना एक अवसरवादी उद्योग था ढेर सारे विद्वानों की कृपा प्राप्त करने का यह बेहद आसान रास्ता था इस रास्ते पर चलकर हिंदी साहित्य की प्रोफ़ेसरी तक हासिल हो जाती थी ऐसे हमलावरों के विरोध में कुबेर जी का सात्विक क्रोध भी किताब में प्रकट हुआ है रामविलास जी के आसपास का पूरा जमघट भी किताब में उपस्थित है । इस विशाल जमघट में व्यक्तियों के साथ घटनाओं और विचारों की भी जोरदार मौजूदगी है । इसमें केदारनाथ अग्रवाल के साथ दोस्ती तो है ही, उनकी कविता के बहाने आधुनिक हिंदी साहित्य का वैकल्पिक इतिहास लिखने का इशारा भी है । इसके साथ नागार्जुन और निराला भी उपस्थित हैं । उस प्रस्तावित इतिहास की धुरी 1946 के नाविक विद्रोह का क्रांतिकारी माहौल है । इस माहौल की काव्यात्मक छाया को खोलने के क्रम में कविता के विश्लेषण के परिष्कृत औजारों का विनियोग भी अच्छी तरह से किया गया है । सभी जानते हैं कि रामविलास शर्मा के लिए 1857 बेहद जरूरी संदर्भ है । उनके भाषा चिंतन में निहित उपनिवेशवाद विरोध को भी पहचाना गया है । जीवन के आखिरी दिनों में ॠगवेद का जिक्र उनकी लगभग प्रत्येक किताब में होता था । अपने इस अभियान का परिप्रेक्ष्य भी रामविलास जी ने स्पष्ट किया है । मार्क्सवाद और भारत का विवेचन तो उनक मौलिक योगदान था । किताब में ढेर सारे निजी जीवन के प्रसंग भी बेलाग आए हैं । उनकी किताबों में संगीत का जिक्र अक्सर आता है । ऊपर से समझ नहीं आता कि इसकी शिक्षा उन्होंने कब पाई । किताब में संगीत से उनके लगाव के साथ न सीख पाने का क्षोभ भी मर्यादित ढंग से जाहिर हुआ है । रामविलास जी के भाषा संबंधी चिंतन के एक साथी किशोरीदास वाजपेयी भी थे । कुबेर जी ने कनखल में जाकर किशोरीदास वाजपेयी से मुलाकात की थी । उस प्रसंग को भी रामविलास जी के संदर्भ में कुबेर जी ने सुचारु तरीके से व्यक्त किया है । साहित्य के विवेचन में रामविलास जी ने रूपवादियों से अधिक गहरी रूप की सामाजिक व्याख्या की है । इन सब बातों के साथ ही निजी जीवन को याद करते हुए रामविलास जी ने पूर्वजों की विरासत को सहेजने की आवश्यकता बताई है, पढ़ाई के स्थानों की स्मृति को ताजा किया है और अध्यापकों की सीखें गिनाई हैं । इस किताब से रामविलास जी की किताबों के परिप्रेक्ष्य प्रकट होते हैं । समूचे हिंदी समाज और साहित्य की जन पक्षधर विवेचना का रामविलास जी की विराट परियोजना का परिचय मिलता है । इस किताब में इतना सब कुछ तो है ही, कुबेर जी का कवि भी बीच बीच में मारक जीवंत गद्य की झलक दिखलाता चलता है ।
कुछ किताबें ऐसी होती हैं कि उनका कोई भी परिचय मूल पुस्तक को पढ़ने के आनंद का स्थान नहीं ले सकता । उनकी मौलिक रचनात्मकता विधाओं की संकीर्ण सीमाओं को तोड़कर धड़ल्ले से उन्हें अनूठी कृति के बतौर स्थापित कर देती है । कुबेर दत्त की यह किताब ऐसी ही नायाब रचना है । इसकी संक्षिप्ति और विस्तार दोनों स्पृहणीय हैं । इसमें जितने रामविलास शर्मा हैं उतने ही कुबेर दत्त भी हैं । जगह जगह कुबेर दत्त की खामोशी भी उनकी शाब्दिक मुखर अभिव्यक्ति की तरह ही बोलती गई है । जहां जरूरी लगा वहां रामविलास शर्मा को बोलने दिया गया है और जहां जरूरी लगा वहां कुबेर दत्त बोलते हैं । स्वाभाविक है कि कुबेर जी कम बोले हैं लेकिन उस हस्तक्षेप की प्रस्तुति इतनी सक्षम है कि लगता है उसके बिना कुछ अधूरा छूट रहा था, बात पूरी नहीं हो रही थी । इस हस्तक्षेप के बाद अब पूरी हुई है ।
रामविलास शर्मा के व्यक्तित्व और सोच विचार को सही संदर्भ में देखने के लिए यह किताब अनिवार्य साबित होगी । निजी जीवन की उनकी सादगी और दृढ़ प्रतिबद्धता के साथ साथ बाज के उड़ान जैसी व्यापकता और ऊंचाई तथा सूक्ष्म पर्यवेक्षण के साथ साथ तीक्ष्ण विश्लेषण इस किताब में पूरी भव्यता के साथ प्रकट हुए हैं । किताब उनके लिए भी उपयोगी है जिन्होंने रामविलास शर्मा का अधिकांश लेखन पढ़ रखा है और उनके लिए भी इसका महत्व कम नहीं है जो रामविलास जी का लेखन बस अभी पढ़ना शुरू कर रहे हैं ।   

                                                              

Thursday, December 21, 2017

पूंजीवाद का संक्षिप्त इतिहास

                  
                                         
2017 में बाडली हेड से यनाइस वरफ़काइस की किताब ‘टाकिंग टु माइ डाटर एबाउट द इकोनामी: ए ब्रीफ़ हिस्ट्री आफ़ कैपिटलिज्म’ का प्रकाशन हुआ । ग्रीक से इसका अंग्रेजी अनुवाद जेकब मो ने लेखक यनाइस के साथ मिलकर किया है । ग्रीक में 2013 में इसका प्रकाशन हुआ था । लिखने का कारण यह था कि अर्थशास्त्र जैसी महत्वपूर्ण चीज को वे सिर्फ अर्थशास्त्रियों के हाथ में छोड़ना उचित नहीं समझते थे । इस विषय का अध्यापन करते हुए उन्हें लगता था कि नौजवानों को आसानी से समझ में आने लायक भाषा में इसे बताना जरूरी है । उन्हें महसूस हुआ कि अर्थशास्त्र के माडल जितना ही वैज्ञानिक होते गए हैं उतना ही अर्थशास्त्र वास्तविक अर्थतंत्र से दूर होता गया है । किताब अर्थशास्त्र को लोकप्रिय बनाने के मुकाबले इस मकसद से लिखी गई है कि आम लोग अर्थतंत्र को अपने कब्जे में ले लें । अर्थतंत्र को समझने के लिए यह भी जानना जरूरी है कि इसके विशेषज्ञ आम तौर पर गलत बातें बोलते हैं । बेहतर समाज और प्रामाणिक लोकतंत्र की स्थापना के लिए सबका अर्थतंत्र के बारे में आधिकारिक रूप से बोलना और जानना बहुत जरूरी है । अर्थतंत्र के उतार चढ़ाव से हमारे जीवन में चाहे अनचाहे ढेर सारी चीजें तय होती हैं, उसकी ताकत ने लोकतंत्र को मजाक बनाकर रख दिया है, उसकी सेहत से हमारी आशा आकांक्षा का रूप तय होता है । यह किताब बिना किसी संदर्भ, पाद टिप्पणी या अकादमिक तामझाम के लिखी गई है । केवल नौ दिनों में इसे लेखक ने एक झोंक में लिख डाला । इसके छपने के बाद ग्रीस के हालात ने उन्हें देश का वित्त मंत्री बना दिया । देश की जनता की ओर से उन्हें लगातार पूंजी के अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों से जूझना पड़ा । उनका कहना है कि आज की तमाम समस्याओं पर बात करते हुए अधिकतर सबसे प्रमुख सचाई यानी पूंजीवाद की चर्चा नहीं की जाती । लेखक ने मूल रूप से पूंजीवाद की ही बात की है लेकिन उसका सीधा उल्लेख किए बिना उसकी जगह पर ‘बाजार समाज’ जैसे सुबोध पद का इस्तेमाल किया है । किताब की शुरुआत ही मजेदार तरीके से होती है जब विषमता को समझाने के लिए वे कहते हैं कि सभी बच्चे नंगे पैदा होते हैं लेकिन उसके तुरंत बाद कुछ को महंगे कपड़ों में ढक दिया जाता है जबकि अधिकतर बच्चों को चीथड़े लपेटे रहना पड़ता है । कुछ समय बीतने के बाद कुछ उपहार में कपड़ों की जगह फोन की उम्मीद करने लगते हैं जबकि ज्यादातर जूते पहनकर स्कूल जाने को तरसते रहते हैं । कुछ बच्चों को स्कूल में हिंसा और अभाव का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं करना पड़ता । यनाइस की लड़की सिडनी में शिक्षा प्राप्त कर रही थी जिसके साथ कल्पित बातचीत के रूप में किताब लिखी गई है । यनाइस उसे सोचने के लिए उकसाते हैं कि आस्ट्रेलिया में इंग्लैंड से आकर गोरे लोगों ने स्थानीय निवासियों का कत्ल करके कब्जा किया । इसके उलट यह भी तो हो सकता था कि आस्ट्रेलिया के आदिवासी लंदन पर कब्जा कर लेते । उनका कहना है कि अगर इस सवाल के बारे में ठीक से नहीं विचार करेंगे तो यही मानेंगे कि या तो यूरोपीय लोग अधिक बुद्धिमान और सक्षम थे या आस्ट्रेलिया के आदिवासी भले थे । यहां आकर विषमता का सवाल बुद्धिमत्ता और क्षमता से जुड़ जाता है ।
यनाइस का कहना है कि बहुतेरे लोग बाजार और अर्थतंत्र को एक ही चीज समझ लेते हैं लेकिन ऐसा नहीं है । विनिमय के लिए बाजार पहले से था, अर्थतंत्र बाद में आया । उसकी विकास प्रक्रिया को मनुष्य के विकास से जोड़कर देखने की कोशिश उन्होंने की है । उनके अनुसार भाषा और भोजन ऐसी दो चीजें हैं जिनके चलते मनुष्य अपनी प्राकृतिक अवस्था से बाहर आया । भाषा से पहले भी मनुष्य के कंठ में ध्वनि थी लेकिन भाषा उसका सर्वथा नया उपयोग थी । इसी तरह प्रकृति से प्राप्त सामग्री को आग के उपयोग से सुपाच्य बनाना भोजन के क्षेत्र में बहुत बड़ा बदलाव था । इन बदलावों ने मनुष्य को अन्य प्राणियों से अलग रास्ते पर डाल दिया । जनसंख्या की बढ़ोत्तरी ने प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं के अतिरिक्त भोजन का कोई और रास्ता खोजने की जरूरत पैदा की । इसी क्रम में खेती होनी शुरू हुई । खेती से ही अधिशेष का जन्म हुआ क्योंकि इसकी उपज को बचाकर रखा जा सकता था । इससे पैदा हुए बदलावों में उनके अनुसार लेखन, कर्ज, धन (मुद्रा), राज्य (सरकार), नौकरशाही, सेना, पुरोहित, तकनीक और आदिम किस्म के जैव-रासायनिक युद्ध को शामिल किया जा सकता है ।
इसी क्रम में बाजार समाज का उदय हुआ । इसे बाजार युक्त समाज से वे अलगाते हैं । उनके अनुसार बाजार शुरू से रहा है लेकिन बाजार समाज का उदय कृषि आधारित समाज के विनाश के बाद ही हुआ । कृषि आधारित समाज के खात्मे की कहानी को विस्तार से समझाने के बाद उन्होंने इस पहलू पर भी रोशनी डाली है कि यह प्रक्रिया पहले इंग्लैंड में ही क्यों पूरी हुई । बाजार समाज के संचालन में मुख्य भूमिका कर्ज की होती है । इसके लिए कर्ज वैसे ही है जैसे ईसाइयत के लिए नर्क: बहुत ही दुखद लेकिन अपरिहार्य । शुरू में कर्ज पर ब्याज की मनाही इस्लाम की तरह ही ईसाइयत में भी थी लेकिन बाजार समाज की जरूरत के चलते खुद ईसाइयत ही विभाजित हो गई और नया प्रोटेस्टेन्ट चर्च विकसित हो गया । बचत के मुकाबले खर्च करना ही पूंजीवाद को टिका सकता है । खर्च करने के लिए कर्ज लेना पड़ता है । कर्ज लौटाने की नैतिकता के बारे में ढेर सारी कहानियों तो मौजूद हैं ही इनके ही साथ ब्याज की वापसी को भी जोड़ दिया गया । कर्ज लेने देने की इस प्रक्रिया में बैंक नामक संस्था का उदय हुआ ।
जब कर्ज पर ब्याज लेने में निहित शर्म समाप्त हो गई तो कर्ज देने वाले बैंक ब्याज के जरिए अकूत मुनाफ़ा लूटने लगे । इनके पास धन की अदला बदली के मामले में अपार ताकत आ गई । उन्होंने इस ताकत का इस्तेमाल करके इस अदला बदली की व्यवस्था को अचानक ठप करना शुरू कर दिया । कर्ज का गणित यह है कि भविष्य में होने वाली आमदनी से कर्ज की वापसी की आशा होती है । भविष्य के विनिमय मूल्य के आधार पर वर्तमान में कर्ज लिया जाता है । थोड़ा बहुत उधार तो परिवारीजन, दोस्त मित्र और सहयोगियों से जुटाया जा सकता है लेकिन बड़ा कर्ज देने के लिए बैंक होते हैं । पहले बैंक लोगों से उनकी बचत जमा करवाते थे और जरूरतमंद को कर्ज देते थे । जमा करने वाले को ब्याज कम देते और कर्ज पर बेशी ब्याज वसूलते थे । इस तरह उन्हें मुनाफ़ा मिलता था । अब वे कर्ज की रकम देने के लिए अपनी बचत का ध्यान नहीं रखते । अपने पास रकम हुए बिना भी कागज पर कर्ज दे देते हैं । जिसे वे कर्ज देते हैं भविष्य में उसके व्यवसाय की सफलता की आशा होती है । भविष्य की उस सफलता के एवज में वे कर्ज लेने वाले से ब्याज और तमाम अन्य खर्च वसूलते हैं । चूंकि बैंकों को इस कर्ज से मुनाफ़ा मिलता है इसलिए वे कर्ज पर कर्ज दिए चले जाते हैं । बैंक पहले चुकाने वाले की क्षमता आंककर कर्ज दिया करते थे लेकिन 1920 दशक से इस तरह की सावधानी समाप्त हो गई । औद्योगिक क्रांति के बाद आबार समाजों का अर्थतंत्र विशाल हो गया और उनके लिए कर्ज के ईंधन की जरूरत भी बढ़ती गई । दूसरी ओर बैंकों ने गड़बड़ी की हालत में उसके परिणामों से अपने आपको सुरक्षित रखने का तरीका खोज निकाला । इसके लिए उन्होंने बचत से अधिक ब्याज पर इन कर्जों के शेयर बेच दिए । यह ब्याज कर्ज पर मिलने वाले ब्याज से कम ही होता था इसलिए बैंक का मुनाफ़ा कायम रहता था । कर्ज लेने वाले के दिवालिया होने पर बैंक की जगह शेयर धारक नुकसान उठाते थे । लेकिन एक समय बाद ये कर्ज ऐसी अवस्था में पहुंच गए कि कर्जदार को होने वाला कोई भी मुनाफ़ा बैंक के कर्ज की वापसी में मददगार न रह गया । जिस भविष्य की आशा में ये कर्ज दिए गए थे वह भविष्य कर्ज के बोझ के नीचे चरमराने लगा । व्यवसाय बंद हुए, रोजगार छिने और कर्ज के लौटने की सम्भावना जाती रही । बैंक के डूबने की अफवाह के चलते लोग अपनी बचत का पैसा निकलने लगे । बैंक के पास पैसा तो था ही नहीं वह तो कर्ज के बतौर बाहर था । लोगों की बचत की रकम पर बैंक ने डाका डाला । असल में जिस प्रक्रिया से मुनाफ़ा और संपदा का जन्म होता है उसी प्रक्रिया से संकट भी पैदा होता है । बैंक जब संकट में फंसते हैं तो उसी सरकार से बचाने की गुहार लगाते हैं जिसे अन्यथा वे सभी जरूरी कामों से निकाल बाहर करना चाहते हैं । सरकार भी सीधे उनकी मदद करने की जगह केंद्रीय बैंक की मार्फत उसी तरह भविष्य में सफलता की आशा में बिना धन रहे भी कर्ज दे देती है ।

इसी क्रम में वे मशीन के सवाल पर भी विचार करते हैं । मशीन की अंतर्विरोधी भूमिका की पहचान करते हुए वे बताते हैं कि मशीन से उत्पादन तो बढ़ता है लेकिन उसे खरीदने वाले कम हो जाते हैं क्योंकि मशीन किसी व्यक्ति को विस्थापित करती है । व्यक्ति के पास धन नहीं आएगा तो मशीन की सहायता से बढ़ा हुआ उत्पादन खरीदेगा कौन । मशीन के सवाल पर वे लुड के समर्थकों को भी याद करते हैं और कहते हैं कि वे मशीन के उपयोग के विरोध में नहीं थे बल्कि मशीन पर मुट्ठी भर लोगों के कब्जे का विरोध कर रहे थे ।बिटक्वाइन जैसी मुद्रा को वे मुद्रा पर राज्य के एकाधिकार का विरोध मानते हैं । उन्होंने बताया है कि 2007 के वित्तीय संकट के तुरंत बाद इसका आगमन अनायास नहीं हुआ । इस संबंध में उनकी मान्यता है कि मुद्रा का आविष्कार ही विनिमय के मुकाबले कर्ज को दर्ज करने के लिए हुआ था इसलिए उसके साथ राज्य का जुड़ाव अवश्यंभावी है । वे सवाल उठाते हैं कि यदि बिटक्वाइन की चोरी हो जाए तो इसे कौन देखेगा । इससे साबित होता है कि मुद्रा के साथ ही राज्य सहित तमाम संस्थाओं का उद्भव संयोग नहीं है । अपनी बात की पुष्टि के लिए वे एकदम शुरुआती मुद्रा के बतौर प्रयुक्त कौड़ियों का हवाला देते हैं जिन पर सार्वजनिक भंडार में जमा व्यक्ति के अनाज की मात्रा दर्ज हुआ करती थी । लेकिन उस मात्रा में अनाज की वापसी राज्य ही सुनिश्चित करता था ।   
पारंपरिक शब्दावली की जगह नई शब्दावली का इस्तेमाल उन्होंनेउपयोग मूल्यके लिए भी किया है । इसके लिए वे अंग्रेजी मेंएक्सपीरिएन्शियलपद का प्रयोग करते हैं यानी जिसका अनुभव मात्र किया जा सके या हिंदी में उसे हमआनुभविक मूल्यकह सकते हैं । इसके साथ ही वे यह भी बताते हैं कि मजदूर की श्रमशक्ति को केवल उसके विनिमय मूल्य के लिए खरीदा जाता है जबकि अन्य चीजों का विनिमय मूल्य उनके आनुभविक मूल्य पर आधारित होता है । पर्यावरण के सवाल पर लेखक का कहना है कि बाजार समाज इसके लिए कभी काम नहीं करेगा क्योंकि पर्यावरण में कोई विनिमय मूल्य नहीं होता और बाजार समाज के लिए मूल्यवान वही है जिसमें विनियम मूल्य है । इस समाज के समर्थकों का कहना है कि चूंकि पर्यावरण सबका है इसलिए किसी का नहीं है । जब वह किसी का नहीं है तो उसकी चिंता कोई क्यों करे । इसका हल उसके पास यह है कि जो सामुदायिक है उसका निजीकरण कर दिया जाए । जब वह किसी की निजी संपत्ति हो जाएगा तो स्वाभाविक रूप से वह व्यक्ति उसे सुरक्षित रखने का प्रयत्न करेगा । यनाइस निजीकरण के इस वैचारिक अभियान के विकल्प के रूप में सब कुछ के लोकतंत्रीकरण का नारा देते हैं । अंत में वे घोषित करते हैं कि अर्थशास्त्र बाजार समाज को कायम रखने का औजार है और व्यर्थ ही वैज्ञानिकता का दावा करता है । जिस परिघटना का यह अध्ययन करता है उसमें कुछ भी ऐसा नहीं होता जो प्रयोगशाला के सुरक्षित वातावरण में सम्भव है । इस विषय में अपने प्रवेश को वे विशेषज्ञों के एकाधिकार को तोड़ने की कार्रवाई बताते हैं । अर्थशास्त्र के साथ ही मीडिया को भी वे बाजार समाज के निर्णायक संरक्षकों में मानते हैं । इन दोनों को वे उस विचारधारा का अंग मानते हैं जो बाजार समाज को अजेय बताती है ।

Saturday, December 2, 2017

धनवान और निर्धन

                 
                                 
2011 में बेसिक बुक्स से ब्रांको मिलानोविक की किताबद हैव्स ऐंड द हैव-नाट्स: ए ब्रीफ़ ऐंड इडियोसिंक्रेटिक हिस्ट्री आफ़ ग्लोबल इनइक्वलिटीका प्रकाशन हुआ । लेखक के अनुसार किताब में इतिहास और वर्तमान में आय और संपत्ति संबंधी विषमता का विवेचन किया गया है ।
उनका कहना है कि सत्ता और संपत्ति का भेद सभी मानव समाजों में पाया जाता है । विषमता सामाजिक परिघटना है और यह सापेक्षिक होती है । इसका अस्तित्व मनुष्यों के ऐसे समूह में होता है जिनके बीच सरकार, भाषा, धर्म या स्मृतियों की साझेदारी हो । किताब में मनोरंजक तरीके से बताया गया है कि हमारे दैनंदिन जीवन के कई क्षेत्रों में आय और संपत्ति संबंधी विषमता मौजूद है । अपने सुपरिचित प्रसंगों को भी दूसरे कोण से देखने पर विषमता नजर आ सकती है । मकसद यह दिखाना है कि अमीरी और गरीबी हमारे जीवन में मौजूद रहे हैं ।
किताब में तीन तरह की विषमताओं को उजागर किया गया है । एक तो वह जो किसी एक ही समुदाय के विभिन्न व्यक्तियों के बीच होती है । इसे हम बहुत आसानी से पहचान सकते हैं क्योंकि यह शब्द सुनते ही सबसे पहले हमारे दिमाग में इसी किस्म की विषमता का ध्यान आता है । दूसरी वह जो  विभिन्न देशों के बीच मौजूद होती है । जब भी हम किसी अन्य देश की यात्रा पर जाते हैं या अंतर्राष्ट्रीय समाचार देखते हैं तो इस प्रकार की विषमता नजर आती है । कुछ देशों में अधिकांश लोग गरीब नजर आते हैं जबकि कुछ अन्य देशों में अधिकतर लोग अमीर नजर आते हैं । देशों के बीच की यह विषमता प्रवास में भी झलकती है जिसके तहत गरीब देशों के कामगार संपन्न देशों में बेशी कमाई के लिए जाते हैं । तीसरा प्रकार वैश्विक विषमता का है जो ऊपर बताई गई दोनों प्रकार की विषमता का जमाजोड़ है । यह चीज वैश्वीकरण के बाद उभरी है क्योंकि उसके बाद ही हम अपनी हालत की तुलना दूसरे देश के लोगों के साथ करने के आदी हुए हैं । जैसे जैसे वैश्वीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी इस तरह की विषमता का प्रसार होगा ।     
इन विषमताओं को स्पष्ट करने के लिए किस्सों का सहारा लिया गया है । तीनों खंडों के शुरू में संबंधित विषमता के बारे में अर्थशास्त्रियों के लेख दिए गए हैं । किस्सों के मुकाबले लेख थोड़ा अधिक ध्यान की मांग करते हैं । किताब के अंत में आगे के अध्ययन के लिए एक पुस्तक सूची भी दी गई है । लेखक पिछले पचीस सालों से विषमता का अध्ययन कर रहे थे जिसके चलते उनके पास आंकड़ों, सूचनाओं और किस्सों का भंडार जमा हो गया था इसलिए लिखते समय विशेष असुविधा नहीं हुई । साफ है कि किताब के लेखन में लेखक को संख्याओं और इतिहास से अपने लगाव से भारी मदद मिली । इसके जरिए जो लक्ष्य वे पाना चाहते थे वे थे- रोचक तरीके से किस्से पढ़ते हुए पाठक का कुछ नए तथ्यों से परिचय कराना, संपत्ति और आमदनी के मामले में विषमता के दबा दिए गए मुद्दे को चर्चा में ले आना और पुराने किस्म की सामाजिक सक्रियता को प्रेरित करने के लिए खासकर संकट के समय अमीरी गरीबी के सवाल को बहस के केंद्र में स्थापित करना । वे चाहते हैं कि लोग अश्लील किस्म की अमीरी के औचित्य पर सवाल खड़ा करें । वे यह भी चाहते हैं कि देशों के भीतर और देशों के बीच मौजूद भारी विषमता को भी स्वीकार न कर लिया जाए ।

ये ऐसे सवाल हैं जिनकी उपेक्षा आसानी से जनमत के तमाम निर्माता कर बैठते हैं । उनका तर्क होता है कि सभी विषमताओं का जन्म बाजार से होता है और इस पर बहस करने से कोई लाभ नहीं है । लेकिन लेखक का कहना है इनका जन्म बाजार से न होकर राजनीतिक शक्ति की सापेक्षिकता से होता है और बाजार का नाम लेकर इन पर बात करने से बचना मुश्किल है । बाजार आधारित अर्थतंत्र भी समाज की रचना है और इसका निर्माण जनता की सुविधा के लिए हुआ है । इसलिए किसी भी लोकतांत्रिक समाज में जनता के पास इसके संचालन के बारे में सवाल करने का अधिकार होगा । अंत में लेखक ने कहा है कि उनके तमाम निष्कर्ष विश्व बैंक के सर्वेक्षणों पर आधारित गणना से हासिल है ।

Thursday, November 23, 2017

उत्तर औद्योगिक समाज: एक साहित्य सर्वेक्षण

          
                                                            
बहुत सरल शब्दों में कहें तो उत्तर औद्योगिक समाज ऐसा समाज होता है जहां के सकल अर्थतंत्र में औद्योगिक गतिविधियों के मुकाबले सेवा क्षेत्र में अधिक लाभ होने लगे । इस पद को जन्म देने का श्रेय अलैं तूरें को जाता है । इस परिघटना को समझने के लिए सूचना समाज, ज्ञान अर्थतंत्र और नेटवर्क समाज जैसे पदों का भी प्रयोग किया जाता है । इसे समाज में उत्पादक गतिविधियों के मुकाबले सेवाओं के प्रावधान की ओर अर्थतंत्र के रूपांतरण से भी पहचाना जाता है । साफ है कि ज्ञान भी जब पूंजी का मूल्य महत्व प्राप्त करने लगे तो मूल्य का स्रोत शारीरिक श्रम से अधिक मानसिक श्रम समझा जाने लगता है । स्वाभाविक है कि यदि किसी समाज में उत्पादन की प्रमुखता नहीं होगी तो उस समाज में उपभोक्ताओं का ही बोलबाला होगा । इसलिए इसे उपभोक्तावाद के उभार के रूप में भी देखा जाना चाहिए । सवाल यह भी है कि उपभोग करने के लिए उत्पादन होना तो होगा ही, भले यह उत्पादन उस देश में न हो जहां मजदूरी ज्यादा देनी हो और उद्योगों को वहां स्थानांतरित कर दिया जाए जहां सस्ता श्रम और संसाधन मुफ़्त हासिल हों । इसी के चलते इस परिघटना को साम्राज्यवाद की ही निरंतरता मानकर गरीब मुल्कों के नवउपनिवेशीकरण की जटिल प्रक्रिया से भी जोड़कर देखा जाना चाहिए ।   
तूरें के बाद इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण अध्ययन के रूप में डैनिएल बेल की किताब ‘द कमिंग आफ़ पोस्ट-इंडस्ट्रियल सोसाइटी: ए वेन्चर इन सोशल फ़ोरकास्टिंग’ का नाम लिया जाता है । ढेर सारे लोग बेल को ही इस धारणा और पदावली का उद्भावक मानते हैं । इस किताब का प्रकाशन पहली बार 1973 में बेसिक बुक्स से हुआ था । उसके बाद 1976 और 1999 में भी उसके संस्करण निकले जिनके लिए लेखक ने अलग से प्रस्तावनाएं लिखीं । किताब के संस्करणों की इस निरंतरता से ही इस धारणा की लोकप्रियता और इस धारणा को स्थापित करने में उल्लिखित किताब का महत्व समझा जा सकता है । साठ के विद्रोही दशक के बाद का सत्तर का दशक पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका में कुछेक बुनियादी बदलावों का दशक माना जाता है । खास बात यह है कि साठ के दशक से बदलाव की जो ताकतें पैदा हुईं उन पर भी सत्तर के बदलावों का गहरा असर पड़ा और उन्होंने नए रूप धारण किए । इस अर्थ में उत्तर औद्योगिक समाज कोई इकहरी परिघटना नहीं है बल्कि वह एकाधिक आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक बदलावों का समुच्चय है । हमेशा की तरह ही बदलाव के शुरू के दिनों में उसकी नवीनता का पता नहीं चला लेकिन हाल के दिनों में आकर उस समय शुरू हुए बदलावों का अनुभव अत्यंत मारक और आत्मघाती हो चला है । इस संक्षिप्त आलेख में उन सभी बदलावों का विवेचन संभव नहीं है इसलिए उनमें से कुछेक की ही चर्चा की जाएगी । वैसे भी सामाजिक बदलाव बेहद जटिल प्रक्रिया होती है जिसके सभी रेशों को अलगाना कई बार संभव नहीं होता ।
उत्तर औद्योगिक समाज पर विचार करने वाली किताबों में मासाचुसेट्स इंस्टीच्यूट आफ़ टेक्नोलाजी प्रेस से प्रकाशित डैनिएल कोहेन की फ़्रांसिसी में प्रकाशित किताब का अंग्रेजी अनुवादथ्री लेक्चर्स आन पोस्ट-इंडस्ट्रियल सोसाइटी’ 2009 में छपा । किताब में लेखक ने बताया कि मार्क्स के मुताबिक इतिहास कुछेक चरणों से होकर गुजरता है और पूंजीवाद भी एक चरण है । पूंजीवाद का भी इतिहास है । बीसवीं सदी का पूंजीवाद उन्नीसवीं सदी के पूंजीवाद से अलग किस्म का था और आज का पूंजीवाद बीसवीं सदी के पूंजीवाद से अलग किस्म का है । बीसवीं सदी के पूंजीवाद के केंद्र में औद्योगिक कारखाना था । इसके इर्द गिर्द काम करने वालों के बीच आंगिक जुड़ाव होता था । इंजीनियरों का काम अकुशल मजदूरों को दीक्षित करना होता था । प्रबंधक लोग अन्य सभी लोगों की तरह ही वेतनभोगी हुआ करते थे और उनका काम आर्थिक उलटफेर से संस्थान की रक्षा करना होता था । इसके लिए सभी कारखाने सुरक्षा के उपाय करते थे ताकि कामगारों को काम मिलना बंद न हो । सामंती समाज की तरह ही बीसवीं सदी का औद्योगिक समाज उत्पादन के साथ ही रक्षा की व्यवस्था भी निर्मित करता था । इक्कीसवीं सदी का पूंजीवाद व्यवस्थित रूप से औद्योगिक समाज को ध्वस्त करने में मुब्तिला है । आपस में जुड़ी हुई औद्योगिक इकाइयों को एक दूसरे से अलगाया जा रहा है । जिन कामों को गैर जरूरी माना जा रहा है उन्हें ठेके पर दिया जा रहा है । इंजीनियरों को प्रयोगशालाओं में ऐसे काम दिए जा रहे हैं जिनके चलते मजदूरों से उनका सम्पर्क नहीं रह जाता है । इसके चलते सभी कामगार और परोक्ष रूप से समूचा समाज सुरक्षाविहीन हो गया है । उत्तर औद्योगिक समाज क्या है इसके लिए यह जानना होगा कि वह क्या नहीं है । अर्थ कि औद्योगिक गतिविधियों की अनुपस्थिति से उत्तर औद्योगिकता परिभाषित होती है । रोजगार भी उद्योग के मुकाबले सेवा क्षेत्र में अधिक मिल रहा है इसलिए सकारात्मक तरीके से कहें तो यह सेवा समाज कहा जाएगा । ऐसे ही एक सदी पहले कृषि के मुकाबले उद्योग की ओर रूपांतरण हुआ था । इस बदलाव के बावजूद वस्तुओं की मांग में कमी नहीं आई है । इससे ही सवाल पैदा होता है कि ये वस्तुएं आती कहां से हैं । विकसित देशों से निर्माण का काम अधिकाधिक विकासशील देशों की ओर भेजा जा रहा है । अर्थात उत्तर औद्योगिक समाज एक तरह के नव साम्राज्यवादी संबंध पर भी टिका हुआ है । विकसित देशों के लोगों की जीवन पद्धति को बनाए रखने के लिए लगातार विकासशील देशों के सस्ते श्रम और प्राकृतिक संसाधनों की लूट होती रहती है ।        

इसके साथ ही आज की दुनिया में हम मोटे तौर पर दो परिघटनाओं को पहचान सकते हैं जो उत्तर औद्योगिक समाज के उत्पाद कहे जा सकते हैं । इनमें से पहली परिघटना है- विकसित पश्चिमी देशों में लगातार बढ़ती विषमता । इसको लेकर 1995 में ही जोएल आइ नेल्सन ने एक जोरदार किताब लिखी थीपोस्ट-इंडस्ट्रियल कैपिटलिज्म: एक्सप्लोरिंग इकोनामिक इनइक्वलिटी इन अमेरिकाजिसका प्रकाशन सेज पब्लिकेशंस से हुआ था । हाल के दिनों में सामाजिक विषमता संबंधी बहस बेहद उत्तेजक तरीके से प्रकट हुई है । इसके पीछे एक फ़्रांसिसी अर्थशास्त्री का अध्ययन है । पिकेटी नामक इस फ़्रांसिसी अर्थशास्त्री की 2014 में प्रकाशित किताब कैपिटल इन द ट्वेंटी फ़र्स्ट सेंचुरीकी चर्चा इस समय सबसे अधिक हो रही है । मजेदार बात है कि पिकेटी मार्क्सवादी नहीं हैं । किताब के एक समीक्षक जेम्स के गालब्रेथ के मुताबिक वे नव-शास्त्रीय अर्थशास्त्र की मान्यताओं से प्रभावित हैं । मार्क्स का वे विरोध नहीं करते बल्कि सिर्फ़ यह कहते हैं कि मार्क्स को पर्याप्त आँकड़े सुलभ नहीं थे । अपनी किताब की भूमिका में पिकेटी ने कहा है कि मार्क्स ने औद्योगिक क्रांति के दौरान उन्नीसवीं सदी में ही संपदा के संकेंद्रण की जिस प्रवृत्ति को पहचाना था वह सरोकार, और खासकर असीम संचय की प्रवृत्ति का मार्क्स द्वारा उद्घाटन, इक्कीसवीं सदी में और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है । पिकेटी के मुताबिक फ़्रांस में अर्थशास्त्री को बहुत भाव नहीं दिया जाता इसलिए उसे अन्य अनुशासनों से संवाद करना ही पड़ता है । वे खुद अर्थशास्त्रियों के गणित से लगाव को बचकाना मानते हैं और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पर जोर देते हैं । उनका कहना है कि गणित से केवल वैज्ञानिकता का आभास मिलता है । इसके बावजूद वे पद्धति के बतौर आंकड़ों पर भरोसा करते हैं ।  पिकेटी का आँकड़ों से लगाव इस बात से जाहिर होता है कि विषमता के इस अध्ययन में बीस से अधिक देशों के पिछले दो सौ सालों से ज्यादा समय के आँकड़ों का विश्लेषण किया गया है । इस आधार पर उन्हें विषमता में भारी बढ़ोत्तरी दिखाई पड़ती है । कुछ हद तक इसके चलते भी यह किताब इसी विषय पर लिखी अन्य पूर्ववर्ती किताबों से अलग है । अपनी किताब को पिकेटी अर्थशास्त्र और इतिहास के संयुक्त अनुशासन के भीतर रखना पसंद करते हैं । इतिहास के भीतर की नवीनता को इसका आधार बताते हुए वे कहते हैं कि अब इतिहास में छोटी अवधि में आनेवाले बदलावों की जगह लंबी अवधि में आनेवाले परिवर्तनों पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है । राजनीतिक उलटफेर के विवरण के मुकाबले ‘रोक और संतुलन’ की अधिक स्थिर प्रणालियों का उपयोग किया जा रहा है । इसमें आर्थिक विकास के माडल, बाजार की गति के मात्रात्मक विश्लेषण, जनांकिकीय प्रसार और संकोच, मौसम के दीर्घकालीन असरात, सामाजिक स्थिरता तथा तकनीकी खोजों के चलते होने वाले बदलाव और निरंतरता जैसी चीजों पर ध्यान देने से समाज के विभिन्न गहनतर स्तरों का पता चल रहा है । इस मामले में भी इस किताब की नवीनता जाहिर है । मुख्य रूप से वे विकसित देशों को अपने अध्ययन का विषय बनाते हैं । आंकड़ों के सहारे पिकेटी ने साबित किया है कि विकसित देशों में पिछले ढाई सौ सालों में विषमता अबाध गति से बढ़ती रही है, केवल दोनों विश्व युद्धों के बीच का समय ऐसा रहा जब इसमें गिरावट देखी गई । दोनों महायुद्धों में संसाधनों की जिस पैमाने पर बर्बादी हुई उसने सब पर असर डाला इसीलिए विषमता में यह गिरावट नजर आती है । विकसित देशों में संपदा के मामले में बढ़ती विषमता का उनका अध्ययन एक खास सूत्र पर टिका हुआ है । वे कहते हैं कि पूँजी पर मुनाफे की दर अर्थतंत्र में वृद्धि की दर से अधिक बनी हुई है इसलिए इस विषमता के कम होने के कोई आसार नहीं हैं । वे यह भी कहते हैं कि इसके चलते किरायाभोगी (रेंटियर) पूँजी की बाढ़ आई हुई है जो मुख्य रूप से सट्टा बाजार में लगी हुई है और उसी के मुनाफ़े पर टिकी हुई है । इसी परिघटना को वित्तीकरण भी कहा जाता है और हाल के भारी आर्थिक संकट के पीछे वित्तीकरण की इसी प्रवृत्ति को प्रधान कारण माना जा रहा है ।
पिकेटी का यह भी कहना है कि इसके चलते लोकतांत्रिक व्यवस्था को खतरा पैदा हो गया है । इस समस्या के समाधान के बतौर वे प्रगतिशील आय-कर, विरासत कर आदि से अलग वैश्विक संपदा कर लादने का भी प्रस्ताव कर रहे हैं । फ़्रांस के रहनेवाले पिकेटी के लिए संपदा कर कोई नई बात नहीं है क्योंकि राजनीतिक क्रांतियों के इस देश में विषमता को बढ़ने से रोकने के लिए इसका प्रावधान लंबे दिनों से बना हुआ है । विकसित देशों में लोकतंत्र के क्षरण की परिघटना को समझने की कोशिश लगातार की जा रही है । इस प्रसंग में 2013 में नेशन बुक्स से जान निकोल्स और राबर्ट डब्ल्यू मैकचेस्नी की किताब ‘डालरोक्रेसी: हाउ द मनी-ऐंड-मीडिया एलेक्शन कांप्लेक्स इज डेस्ट्राइंग अमेरिका’ का प्रकाशन हुआ । इस किताब में ध्यान देने की बात यह शब्दावली है जिससे लेखकों ने समस्या को व्यक्त किया है । लोकतंत्र को हम सभी डेमोक्रेसी शब्द से अभिहित करते हैं लेकिन लेखकों का जोर इस बात पर है कि अब डेमोक्रेसी डालरोक्रेसी में बदल गई है । डेमोस यानी जनता की जगह अब डालर का राज चलता है । जिस देश में सबसे पहले न केवल लोकतंत्र की स्थापना हुई बल्कि गुलामी के आर्थिक तौर पर लाभकर होने के बावजूद गृहयुद्ध झेलकर जिसने गुलाम प्रथा को खत्म किया उसी देश में धनपशुओं द्वारा राजनीतिक सत्ता पर कब्जा जमा लेना एक दुर्घटना की तरह है जिसको लेकर अनेक विद्वान चिंतित दिख रहे हैं ।      
विषमता के ही प्रकरण में हिंदू’ अखबार में निकोलस डी क्रिस्ताफ़ लिखितऐन इडियट्स गाइड टु इन-इक्वलिटीशीर्षक लेख में बताया गया है कि अमेजन की बिक्री के आँकड़ों के अनुसार पिकेटी की किताब हाल में सबसे अधिक बिकने वाली किताब रही है । उनका कहना है कि अमेरिकी लोग विषमता की इस परिघटना को समझना चाहते हैं क्योंकि यह उनका प्रतिदिन का अनुभव हो चुका है । सबसे धनी 1% लोगों के पास सबसे गरीब 90% लोगों से अधिक संपत्ति जमा हो गई है । दुनिया के सबसे धनी 85 लोगों के पास शेष समस्त संपत्ति का आधा हिस्सा है । 2010 में अमेरिका में होने वाली कुल आमदनी का 93% सबसे अमीर 1% लोगों के हिस्से आया । यह भारी विषमता आर्थिक वृद्धि के लिए बाधा बन गई है । अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के एक शोध पत्र में भी माना गया है कि समतापरक समाजों में तीव्र आर्थिक वृद्धि देखी जाती है । समाजार्थिक विषमता के चलते सामाजिक अस्थिरता पैदा होती है । समाज में दरारें पैदा होती हैं और नीचे पड़े लोग अपने आपको अधिकारविहीन समझने लगते हैं । बाजार पर से लोगों का भरोसा उठने लगता है और लगता है कि लोगों की संपत्ति उठाकर धनियों को सौंप दी जा रही है । संपत्ति का स्रोत परिश्रम की जगह राजनीतिक जोड़ तोड़ नजर आने लगता है ।
उत्तर औद्योगिक समाज में राजनीतिक व्यवहार को समझने के लिए पारंपरिक औजारों की अपर्याप्तता को देखते हुए नए तरह के वर्ग के उदय को परखा जा रहा है । इसी बात को समझाने के लिए जान मैकएडम्स ने 2015 में एक किताब लिखी ‘द न्यू क्लास इन पोस्ट-इंडस्ट्रियल सोसाइटी’ जिसका प्रकाशन पालग्रेव मैकमिलन से हुआ है । लेखक का कहना है कि पूंजीवादी लोकतंत्र में राजनीति को लोकतांत्रिक वर्ग संघर्ष समझा जाता था । अस्सी दशक के आरम्भ में सेमूर मार्टिन लिपसेट ने माना था कि विकसित देशों में राजनीतिक दलों ने वर्ग संघर्ष के सिद्धांत को अवश्य तिलांजलि दे दी थी लेकिन उनकी नीतियों और उनको मिले समर्थन से जाहिर होता था कि वे अलग अलग वर्गों से जुड़े हुए हैं । लोकतंत्र में संख्या बल के चलते अधिकांश राजनीतिक दल निचले या मध्य वर्ग से जुड़े होते थे । इस प्रवृत्ति में निश्चित बदलाव दिखाई पड़ रहे हैं ।   
हमने पहले ही जिक्र किया है कि उत्तर औद्योगिक समाज को ज्ञान के अर्थतंत्र से भी जोड़कर देखा जाता है । इसी धारणा की वस्तुगत चीरफाड़ करते हुए पीटर मर्फी ने किताब लिखी ‘यूनिवर्सिटीज ऐंड इनोवेशन इकोनामीज: द क्रिएटिव वेस्टलैन्ड आफ़ पोस्ट-इंडस्ट्रियल सोसाइटी’ जिसका प्रकाशन भी इसी साल ऐशगेट से हुआ है । ज्ञान को भी समूची आर्थिकी से जोड़कर देखने की प्रवृत्ति में बढ़ोत्तरी आई है । ज्ञान के उत्पादन के केंद्र होने के नाते विश्वविद्यालय ठोस रूप से पूंजीवादी आर्थिकी के अंग बनाए जा रहे हैं । जिसे हम उत्तर औद्योगिक समाज कह रहे हैं वह और कुछ नहीं नए दौर का पूंजीवाद है । इसने समाज के सभी अंगों को प्रभावित किया है और मुनाफ़े के तर्क का अभूतपूर्व विस्तार किया है । इस समाज में लोकतंत्र से जुड़े हुए जो बदलाव आए हैं उन्हें भी लोगों ने सदी के मोड़ पर ही पहचानना शुरू कर दिया था । प्रचलित मुहावरे के मुताबिक मीडिया लोकतंत्र का स्तम्भ माना जाता है लेकिन हम सभी जानते हैं कि जन संचार का कोई भी माध्यम भारी पूंजी निवेश के बिना नहीं चल सकता । ऐसे में अत्यंत स्वाभाविक है कि पूंजी के स्वरूप में आने वाले बदलाव उससे जुड़ी सभी चीजों को प्रभावित करेंगे । अपने देश में मीडिया का जो हाल है वह विश्वव्यापी बदलाव का अंग है । उसके भीतर हाल में आए बदलाव को 2014 में मंथली रिव्यू प्रेस से प्रकशित राबर्ट डब्ल्यू मैकचिस्नी की किताबब्लोइंग द रूफ़ आफ़ द ट्वेन्टी-फ़र्स्ट सेन्चुरी: मीडिया, पोलिटिक्स, ऐंड द स्ट्रगल फ़ार पोस्ट-कैपिटलिस्ट डेमोक्रेसीमें विश्लेषित किया गया है ।
विकसित देशों की बढ़ती विषमता के साथ ही जिस दूसरी परिघटना को इसके साथ जोड़ा जाता है वह है- तीसरी दुनिया के देशों में बड़े पैमाने पर उपनिवेशीकरण की वापसी । ये दोनों ही बदलाव सत्तर के दशक से शुरू हुए हैं । इन बड़े बदलावों के साथ लिपटी हुई विचारधारा भी प्रकट हुई है जिसे लोकप्रिय भाषा में नवउदारवाद कहा जाता है । इस नवउदारवाद को विकसित देशों के वित्तीकरण, विकासशील देशों के नव उपनिवेशीकरण और समाज में लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण से जोड़कर समझा जाना चाहिए । विकसित देशों के बौद्धिक समुदाय ने बर्बरता के इस उत्थान को खूबसूरत नाम दिया था जिसकी ठोस सच्चाई साम्राज्यवाद की नए रूप में वापसी है । खुद विकसित देशों में इस उत्तर औद्योगिक समाज के प्रभाव नवसामंती मूल्यों के पुनरागमन के रूप में प्रकट हो रहे हैं । शिक्षा के निजीकरण ने नए तरह की वर्ण व्यवस्था को जन्म दिया है जिसमें धनी व्यक्ति की संतान को ही अच्छी शिक्षा सुलभ होगी । इसके साथ ही सामंती समाज से जुड़े सभी पदानुक्रम भी प्रकट हो रहे हैं । नस्ल और लिंग आधारित व्यवस्थाजन्य भेदभाव कम होने की जगह रूढ़ होते जा रहे हैं ।               

Friday, November 17, 2017

गोरख: राई भर का साथ पहाड़ भर का काम

          
                                            
गोरख पांडे से कुछेक बार की ही मुलाकातें रहीं लेकिन इतने से ही जो रिश्ता बना उसने बड़ी भारी जिम्मेदारी दे दी तीन बार बनारस और एक बार इलाहाबाद बनारस में पहली बार वे लगभग एक सप्ताह अवधेश प्रधान के पास रुके थे तब मैं ग्यारहवीं कक्षा का छात्र था वहीं रहकर उन्होंनेलोकचेतनाके लिएकविता की वापसीवाला लेख लिखा था एक हाथ से टेक लगाकर अधलेटे जांघ के सहारे दफ़्ती पर कागज रखकर लिखने की विचित्र मुद्रा पहली बार देखने को मिली थी प्रूफ़ पढ़ते हुए उनके तर्क पर मुग्ध होकर बोला कि मुझे यह बात नहीं सूझी थी बोले इसीलिए तो हम लोगों की जरूरत पड़ती है अपनी उपयोगिता की यह समझ उनमें आखिरी दिनों तक रही जब बीमारी के बाद लौटकर जे एन यू आए तो डाक्टरों ने अकेला छोड़ने से मना किया था जिन सज्जन को रात में उनके पास रहना होता उन्होंने शिकायती लहजे में कहा कि मेरे भी तो काम हैं गोरख ने सहानुभूति जताने की जगह राजनीतिक कार्यकर्ता के भाव से समझाया कि लोग कम हैं और जिम्मेदारी ज्यादा तो सभी को निबटाने के लिए समय सही तरीके से बांटिए अपनी देखरेख को वे बाकायदे एक गंभीर दायित्व मानकर यह बात बोल रहे थे
जन संस्कृति मंच के गठन के सिलसिले में एक बैठक काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आयोजित थी । उसे गोरख जी संचालित कर रहे थे । ढेर सारे लोग थे । याद है धन संग्रह की बात हो रही थी । कोई बोला कि दिल्ली में तो घनीभूत स्रोत हैं । तपाक से गोरख बोले इसीलिए तो पीड़ा हैं । कहने की जरूरत नहीं कि ये कथन जयशंकर प्रसाद के ‘आंसू’ के एक छंद से निकले थे । हिंदी साहित्य के उनके अध्ययन का पार नहीं था । लखनउ के शकुंतला मिश्र विश्वविद्यालय के अध्यापक देवेंद्र ने बताया कि यू जी सी में उनसे पूछा गया था मत्स्येंद्रनाथ के गुरु कौन थे । देवेंद्र ने क्षोभ के साथ यह बात गोरख को बताई । गोरख बोले आपको नहीं मालूम ? देवेंद्र शर्मिंदा होकर रह गए । बहरहाल सांगठनिक बैठक को धैर्य के साथ चलाने की कला उनमें देखी थी इसलिए उन्हें अराजक कहने वालों पर यकीन नहीं होता ।
दूसरी बार फिर अवधेश प्रधान के घर पर ही । उम्र ऐसी हो चली थी कि कुछ समझदारी आने लगी थी । कविता भी लिखता था । इस बार साथ घूमे और बातें भी कीं । एक छोटी काव्य गोष्ठी भी हुई थी । उस गोष्ठी में गोरख ने जो कविताएं सुनाईं उन्हें अजय कुमार ने टेप में रेकार्ड कर लिया था । उसी से ‘आशा का गीत’ और ‘बीसवीं सदी’ शीर्षक कविताएं मिलीं । गोरख की आवाज उसी टेप में सुरक्षित है । ‘आशा का गीत’ पर हल्का सा मजाक भी हुआ क्योंकि अजय जी की पत्नी का नाम आशा है । गोरख जी का कुर्ता भाभी जी ने मरम्मत करके धुल दिया था । गोरख जी पहचान ही नहीं पा रहे थे । बताने पर निष्कर्ष निकालते हुए बोले कि कभी कभी चीजों का रूप बदल जाने से भी वे बदल जा सकती हैं । जाना कि दर्शन की समस्याओं से हर समय वे मुब्तिला रहते थे । गोष्ठी में मैंने एक कविता सुनाई जो कविता के बारे में थी । मजाक करते हुए गोरख बोले कविता किसी का नाम तो नहीं । तब राम जी भाई के प्रभाव में मुक्तिबोध का नशा चढ़ा हुआ था । उनकीइस चौड़े ऊंचे टीले परसुनाई । गोरख ने धीरज के साथ सुना । फिर बातचीत शुरू की । बोले किसी का अनुकरण ठीक नहीं होता । सीखना बड़े लोगों से चाहिए ।
खुद जिन लोगों से सीखने की बात कही उनमें कालिदास, गालिब और ब्रेख्त का नाम था । वे साहित्याचार्य थे । पहले इस पढ़ाई की गम्भीरता के बारे में नहीं जानता था । बाद में डिग्री कालेज में एक सहकर्मी मिले जो सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से आचार्य रहे थे । उन्होंने आचार्य का जो स्तर बताया उससे पता चला कि संस्कृत में वार्तालाप करने की योग्यता उन लोगों में होती है । ऐसे में स्वाभाविक है कि गोरख जी को समूचा संस्कृत साहित्य हस्तामलकवत रहा होगा । बताया था कि पहले ही साल उन्हें इतने अंक मिले थे कि लोग देखने आते थे । क्रांतिकारी धारा के साथ संस्कृत पढ़े लोगों में केवल गोरख ही नहीं जुड़े थे । उनके एक अन्य सहपाठी मोदनाथ प्रश्रित भी नेपाल में क्रांतिकारी वामपंथी धारा से जुड़े ही नहीं, सांसद और बाद में मदन भंडारी की सरकार में शिक्षा मंत्री भी बने । गोरख के साथ पढ़ते हुए ही उन्होंनेनेपाली बहादुरनामक एक मशहूर हिंदी कविता भी लिखी थी । बाद में पता चला कि नेपाली वामपंथी आंदोलन में संस्कृत के अध्यापकों का महत्वपूर्ण योगदान है । वे नेपाली समाज के पारम्परिक बौद्धिक माने जाते हैं । इस पूरी परिघटना से जाना कि क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ने में किसी भी बात से बाधा नहीं आती है ।
इस नाते गोरख की कविता पर संस्कृत के क्लासिक साहित्य के प्रभाव के पहलू पर सोचने का रास्ता खुलता है । संस्कृत साहित्य के विद्वान अपनी भाषा को व्याकरण की उपज नहीं मानते बल्कि उसके मूल जनजीवन में खोजते हैं । गोरख की कविताओं और गीतों में जन जीवन की घनघोर उपस्थिति के पीछे संस्कृत की इस क्लासिक परंपरा का प्रभाव सम्भव है । उनका गीतझुर झुर बहे बयार गमक गेंदा की आवेहै तो हिंदी में लेकिन इसकी भाषा, भाव, छंद और निर्वाह पर नजर डाली जाए तो क्लासिक और लोक की मिली जुली जमीन दिखाई पड़ेगी । उनकी कविताओं में स्त्री की निर्णायक उपस्थिति के पीछे भी कहीं न कहीं कालिदास मौजूद हो सकते हैं । न केवल गोरख पर इस प्रभाव का सही विवेचन अब तक नहीं हो सका है बल्कि उनके पहले के प्रगतिशील कवि नागार्जुन पर भी संस्कृत साहित्य के असर का कारण सही गंभीरता के साथ नहीं देखा गया है । इसके लिए संस्कृत साहित्य के प्रति भी नकारवादी की बजाए आलोचनात्मक नजरिया अपनाना होगा । लम्बे समय तक इसमें सब कुछ की अभिव्यक्ति हुई है । सौंदर्य, आभिजात्य और शिष्टता के साथ ही गर्हित, विद्रोह और विचार की भी अभिव्यक्ति संस्कृत भाषा में होती रही है । इसलिए उससे यथास्थितिवादियों को ही नहीं विद्रोहियों को भी सामग्री मिलती रही है ।
उर्दू साहित्य के प्रभाव को केवल गजलों में खोजना उचित नहीं होगा । विरोधाभास को गोरख जी ने कविता में जितनी आसानी से साधा उसकी मिसाल दुर्लभ है और यह बात गालिब तथा ब्रेख्त से जुड़ती है । इस तत्व को उनके पहले कविता संग्रह के संयोजन में देख सकते हैं । उसमें मुक्त छंद की खड़ी बोली की कविताओं वाला खंड तो बुआ को समर्पित है लेकिन भोजपुरी गीतों वाला खंड ज्योति जी के लिए है । साफ है कि वे ग्रामीण बुआ को आधुनिक स्तर पर उठाना चाहते हैं और आधुनिका ज्योति जी को लोक संवेदना के पास ले जाना चाहते हैं ।चादर लम्बी होती गई है, पाँव सिमटता जाए हैमें एक मशहूर कहावत के साथ छेड़छाड़ के अतिरिक्त विरोधाभास भी पहचान सकते हैं । इसी तरहसरजमीं सब्ज मुफ़लिसी से है, बस्ती आबाद बेपनाहों सेमें विरोधाभास के सहारे विडम्बना को तीखा किया गया है ।
शब्दों की कंजूसी भी उन्होंने बड़े कवियों से सीखी ।पैसे का गीतमें लगातार लगता है कि तुक के लिए भी कुछेक शब्द आ सकते हैं लेकिन प्रत्येक पंक्ति समूची और स्वतंत्र कहानी लेकर आती है । प्रत्येक पंक्ति में अंतिम शब्द समान हैंअजी पैसे कीलेकिन उसके पहले के शब्दों से मिलकर उनका अर्थ बदल जाता है ।लपटों से बुनी ससुराल’, ‘सबसे मीठी झनकारऔरखाए जा पंचों मारके साथ मिलकर ये शब्द एक समूचा संसार खड़ा कर देते हैं । परिवार, कानून और अभिजात साहित्य संस्कृति की दुनिया असल में पैसे से मिलकर उत्पीड़क बन जाती है और गुलामी को मजबूत बनाती है । इन संस्थाओं के बीच समानता भी गोरख ने महसूस की । बाद में उनके शोध प्रबंध का अनुवाद करते हुए महसूस किया कि अलगाव की दार्शनिक धारणा को वे किस तरह वर्तमान व्यवस्था की तमाम चीजों को व्याख्यायित करने के लिए इस्तेमाल करते थे ।
गंगा की घाटों पर घूमते हुए उनके कुछ पुराने साथियों से संवाद सुने । उनमें से ढेर सारे लोग चुनाव बहिष्कार के दिनों में फंसे हुए थे । गहराई के साथ राजनीतिक परिस्थिति के बदलाव को स्पष्ट करते हुए तदनुरूप लड़ाई के तौर तरीकों में बदलाव का तर्क देकर वे चुनाव संबंधी कार्यनीति पर बात कर रहे थे । तभी जयप्रकाश नारायण का सुनाया संस्मरण समझ पाया कि वे जब सोनारपुरा में कुछेक दिन साथ रहे थे तो गोरख ने विदा करते हुए कहा कि बीमार होने के कारण बातचीत नहीं हो पाई । मतलब कि उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में थोड़ा बहुत भी वाम समझ जिस किसी कार्यकर्ता में थी उसके साथ गोरख की जीवंत बातचीत होती रहती थी । इस मामले में एक और बात पर ध्यान गया । वैचारिक राजनीतिक बातचीत में उम्र का अंतर उनके लिए कोई बाधा नहीं था । राम जी राय उनसे दस साल छोटे थे । हम लोग तो बच्चे ही कहलाएंगे लेकिन कभी इस अंतराल का अनुभव नहीं हुआ । संवाद में महत्व सवाल और समस्या का होता है और बातचीत भी उसे सुलझाने की ओर सिर्फ ले जाती है तो इस यात्रा में ‘सिर बोझ भारी क्या’ !
बहरहाल आखिरी मुलाकात इलाहाबाद में हुई । कर्नलगंज में संगठन के दफ़्तर में चौकी पर लेटे हुए थे । गंभीर मुख । उसके एक दिन पहले एक गोष्ठी में जो बोले वही सब ‘समकालीन कविता में रूप की समस्याएं’ में लिखा देखा । बाद में पता चला यहीं संपन्न बैठक में तीखा विवाद हुआ था । दिल्ली लौटते ही संगठन के पदों से इस्तीफ़ा भेजा । उसके बाद अकेले पड़ते गए । खबर आती रहती कि सिज़ोफ़्रेनिया की चपेट में हैं । कल्पना की दुनिया के नागरिक होकर रह गए थे । फिर अस्पताल में दाखिल कराए जाने की सूचना । अचानक आत्मघात की खबर मिली । उसके बाद से उनकी अनुपस्थिति की लम्बी यात्रा शुरू हुई जो अब तक जारी है ।
उनकी तरह ही कुछ दिन मैं भी माले का पूर्णकालिक कार्यकर्ता रहा । उस दौरान बैठकों और सभाओं में गोरख के गीत गाता । एक बार हरिबंशी मास्टर साहब ने एक सभा मेंतू हउअ श्रम के सुरुजवा हो हम किरिनिया तोहारगाया था और इसकी व्याख्या की थी । पता चला वे सच में जमीनी कार्यकर्ताओं की आकांक्षाओं और भावनाओं को सटीक तरीके से पकड़ते और उन्हें माकूल भाषा में व्यक्त करने में सक्षम थे ।
जब उन्होंने आत्मघात किया था तब काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर के अंतिम साल में था । हिंदी साहित्य की दुनिया के मुकाबले वैचारिक बहसों की दुनिया अधिक आकर्षक लगती थी । उसी लिहाज से इधर उधर कुछ लिखने की कोशिश शुरू की थी । दैनिकआजमें एक छोटी सी टिप्पणी लिखी । शीर्षक उनकी एक गजल से दियावक्त गुजरे है कत्लगाहों से। इससे पहले का टुकड़ा तो शब्द संक्षिप्ति की मिसाल थाटूटे घुटनों से बंद राहों से। यह गजल उनके ही मुख से बनारस में सुनी थी । इसके एक शेरखुदकुशी करती हैं उम्मीदें/ छत की चूलों पर लटक बांहों सेमें कानपुर में तीन बहनों की सामूहिक आत्महत्या की छाया है । इस गजल का ही एक शेरएक नश्तर चुभा है ख्वाबों में/ लहू टपकता है निगाहों सेतो ऐसा है जिसके लिए शुक्ल जी की यह बात मानी जा सकती है कि कविता तो वह विशेष पद रचना ही होती है । व्याख्या करते जाइए लगेगा ही नहीं कि पूरा सौंदर्य खुला । पहले तो यही कि सपने और उसे देखने वाले में इतनी अभिन्नता है कि एक को नुकसान होने से दूसरा भी घायल होता है । इसके बाद कि चोट पहले सपने पर लगती है । हौसला टूट जाए तो बचना मुश्किल होता है । तुलना के लिए सूरदास का पदजा दिन मन पंछी उड़ जैहैं, ता दिन तेरे तन तरुवर के सबै पात झरि जैहैंको याद कर लीजिए । एक और प्रत्याख्यान- सपना तो नींद में आता है । यह सपना आकांक्षा है, निरा सपना नहीं । आंखों से ऐसी मोहब्बत हो कि उनमें दर्द देखते ही दुनिया को जितनी जल्दी हो बदल देने की इच्छा होने लगे तभी उनके देखे सपनों के घायल होने पर उनसे लहू टपकता महसूस होगा । यहां फ़ैज़ को भी याद कर सकते हैं- कर न दे शहर को जल थल तो चश्मे नम क्या है । बहरहाल उनके देहांत के छह महीने बाद दिल्ली में उसी जेएनयू में दाखिला लिया जहां वे रहे थे । मुनिरका में रह रहे प्रमोद सिंह के पास अक्सर जाता । दोस्त बहुत जल्दी बन जाते हैं । सबके साथ आदतन खूब बहसें करता । प्रमोद बोले गोरख के रहते तुम लोग आ गए होते तो शायद वे अभी न मरते । उनके देहांत के एक साल पूरा होने परप्रतिपक्षनामक पत्रिका में फिर एक निहायत छोटी टिप्पणी लिखी । उनके देहांत के बाद जिन लोगों ने संस्मरण लिखे थे उनमें ज्यादातर ने गोरख पर अपने अहसान गिनाए थे । लोगों के इस रुख पर क्रोध उस टिप्पणी में आ गया था ।
उनका महत्व बहुत धीरे धीरे खुल रहा था । दोस्त राधेश्याम राय ने गोरख की कविता पर जब एम फिल का लघु शोध प्रबंध लिखने का निश्चय किया तो जितना समझ आया मदद की । गोरख की कविता में आजादी बहुत बड़ा मूल्य है । बनारस में ही उन्होंने बताया था कि जो गीत आजकलसपनों की मंजिल हो सुख का आधार होकी शक्ल में मिलता है उसे उन्होंने जब लिखा था तोसुख का संसार होथा । दस साल बाद यह छोटा सा बदलाव किया था । आजादी सुख का आधार होती है यह बातसुख के बारे मेंशीर्षक लेख में भी मिलती है । यह बदलाव उनके दार्शनिक चिंतन से आया था । अंदाजा उनके शोध प्रबंध के अनुवाद के समय चला । आजादी तमाम रूपों में उनके समस्त लेखन में मौजूद है । संस्कृति से भी स्वतंत्रता का गहरा रिश्ता जन संस्कृति मंच के घोषणापत्र में रेखांकित किया था । इसे सही तरीके से समझने के लिए यूरोपीय दर्शन कीअनिवार्यता बनाम स्वतंत्रताकी लम्बी बहस को देखना होगा । इसी बहस में हस्तक्षेप करते हुए एंगेल्स नेड्यूहरिंग मत खंडनमें लिखा किअनिवार्यता तभी तक अंधी होती है जब तक उसे समझ नहीं लिया जाता। इस कोण को राधेश्याम राय ने गोरख पर लिखे पहले शोध में उजागर किया है । ‘मेहनत के हाथों से आजादी की सड़कें ढलें’ जैसी दार्शनिक सूक्ति को कविता में ढालने के लिए श्रम की महत्ता के स्वीकार के साथ ही उसकी सृजनात्मक सम्भावना की समझ भी होनी चाहिए । उनके गीतों के सहज प्रवाह के चक्कर में कई बार अर्थ की गहराई छूट जाने की आशंका होती है । विचार को कविता में ढालने के मामले में वे कबीर और मुक्तिबोध से तुलनीय लगते हैं ।   
इसके बाद उनके लिखे का भंडार मिलना शुरू हुआ तो उसे प्रकाश में लाने की कोशिश शुरू की । सबसे पहले उनका एम ए का लघु शोध प्रबंध मिला बनारस में । काशी हिंदू विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर करते हुए उन्होंने यह प्रबंध हर्षनारायण के निर्देशन में लिखा था ।धर्म की मार्क्सवादी धारणाशीर्षक यह किताब अपने तरह की अकेली किताब है । बिना किसी हिचक के कहा जा सकता है कि धर्म के सवाल पर तत्कालीन नकारवाद की छाया होते हुए भी इसमें मार्क्सवादी समझ की परिष्कृति मौजूद है । उसे किताब की शक्ल देने के लिए अध्यायीकरण किया लेकिन मूल शोध प्रबंध को बहुत नहीं छेड़ा । पीएच डी का शोध जे एन यू से लिखा था । वह मिला उनके मित्र तिलक के पास । शोध प्रबंध अंग्रेजी में था । अनुवाद का काम मृत्युंजय और अवधेश के साथ मिलकर पूरा किया । शोधअस्तित्ववाद में अलगाव की धारणापर लिखा गया था । आश्चर्यजनक रूप से उसमें सबसे हाल के चिंतक इस्तवान मेज़ारोस का भी उल्लेख था । मेज़ारोस ने सार्त्र पर काम किया था । गोरख की यह किताब अस्तित्ववाद पर बहुत ही विवेचनापरक है । जे एन यू में दर्शन का यह पहला शोध प्रबंध था ।
इन शोध ग्रंथों के अतिरिक्त कागजों का एक बंडल अवधेश प्रधान जे एन यू के उनके कमरे से उठा लाए थे और मुझे सौंप दिया । उसमें एक लेख ऐसा महसूस हुआ जो उनके लेख ‘सरलता के पक्ष में’ का ही दूसरा रूप था । अंग्रेजी में टंकित प्रपत्र था ‘साइंटिफ़िक मेथड’ जिसका हिंदी अनुवाद मृत्युंजय ने किया । एक और टंकित प्रपत्र मिला ‘बौद्ध दर्शन और मार्क्सवाद’ जो उन्होंने सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय की किसी संगोष्ठी में प्रस्तुत किया था । उनके सम्पूर्ण गद्य को छापने की योजना बनी तो बनारस में लोकचेतना में प्रकाशित ‘कविता की वापसी’ वाला लेख मिल गया । कभी दिल्ली से एक अंग्रेजी पत्रिका डी प्रेमपति के संपादन में निकली थी- मार्क्सिज्म टुडे । उसके पहले अंक में गोरख जी ने माओ के विरोध में एम बासवपुन्नैया के लेखन का विरोध करते हुए लम्बा लेख लिखा था । वह अंक प्रसन्न कुमार चौधरी के खजाने में मिला तो उसका हिंदी अनुवाद किया । इसी खोजबीन के दौरान इतिहासकार सलिल मिश्र ने उनकी एक डायरी होने का संकेत दिया । पता नहीं किस तरह वह उनके पास पड़ी हुई थी । बनारस में जब उन्हें सिजोफ़्रेनिया का पहला दौरा पड़ा था उसके कुछ दिन पहले से शुरू होकर उनके पहली बार दिल्ली आने तक की वह डायरी विभिन्न अनुभवों, साथियों के जिक्र और कविताओं के प्रारूपों से भरी थी ।
हिंदी में उनके जिक्र से लोग बचते हैं । कविता के क्षेत्र में उनकी याद को मिटा देने की कोशिश के पीछे कुछ स्वनामधन्य कवियों और आलोचकों की हीनता ग्रंथि है । बिना किसी संकोच के कहा जा सकता है कि यदि हिंदी कविता पर नक्सलबाड़ी का असर देखना हो तो गोरख के बिना वह अराजक विद्रोह भावना से आगे की चीज नहीं प्रतीत होगा । नक्सलबाड़ी का प्रभाव हिंदी में जिस उन्नत समझदारी की ओर ले गया उसकी मिसाल गोरख की कविता है । इस मामले में वे निराला और मुक्तिबोध की परम्परा में आते हैं । तोड़ फोड़ को कविता में साध लेना आसान नहीं होता । उनके समकालीन बड़े कवि लोकप्रियता के मामले में उनसे ईर्ष्या करते थे । कवि का नाम जाने बिना उनके भोजपुरी गीत बिहार और उत्तर प्रदेश के आंदोलनकारी किसान कार्यकर्ता गाते थे । जन संस्कृति मंच के नेता के बतौर वैचारिक और रचनात्मक दोनों स्तरों पर उन्होंने ऐसे लेखकों की जमात खड़ी की जिनमें क्रांतिकारी समझ और लोक चेतना का अद्भुत समन्वय मिलता है । उनके गद्य की तरह सहज प्रवाही और विचार सघन गद्य हिंदी में बहुत कम दिखाई देता है ।