Wednesday, July 19, 2017

अक्टूबर क्रांति की सैद्धांतिकी

              
                                         
यह साल सोवियत संघ की बोल्शेविक क्रांति का शताब्दी वर्ष तो है ही, उस क्रांति के सैद्धांतिक सवालों को सटीक तरीके से उठाने और सुलझाने वाली लेनिन की मशहूर किताब ‘राज्य और क्रांति’ के लेखन का भी शताब्दी वर्ष है । अक्टूबर क्रांति के युगांतरकारी स्वरूप के बारे में ढेर सारे विद्वानों ने लिखा है । रूस की उस क्रांति का प्रभाव इतना गहरा था कि आज भी तमाम विकसित और विकासशील दुनिया में उसकी प्रतिध्वनि सुनाई पड़ती है । वह क्रांति वाम आंदोलन के भीतर के अवसरवाद और अराजकतावाद से निर्मम वैचारिक लड़ाई लड़ते हुए संपन्न हुई थी । इस तीखी लड़ाई का अक्स इस किताब में मौजूद है ।
रूसी क्रांति का गहरा रिश्ता प्रथम विश्व युद्ध से है । इसी विश्व युद्ध ने अन्य सामाजिक जनवादियों से लेनिन को अलग कर दिया था । दूसरे इंटरनेशनल से जुड़े अन्य नेताओं ने जहां इस युद्ध में अपने अपने देशों के शासकों का साथ दिया था वहीं लेनिन ने इस युद्ध के जनविरोधी साम्राज्यवादी चरित्र को पहचानकर इससे पैदा संकट का क्रांति की जीत के लिए इस्तेमाल किया । रूस की अक्टूबर क्रांति पूरी व्यावहारिक के साथ साथ सैद्धांतिक तैयारी के साथ संपन्न हुई थी । 1917 की फ़रवरी में जो क्रांति हुई उससे जारशाही का खात्मा हो गया और एक अस्थायी सरकार का गठन हुआ । तबसे लेकर अक्टूबर तक का समय दोहरी सत्ता का समय था । अस्थायी सरकार के साथ ही जनता के बीच से स्वत:स्फूर्त रूप से उपजी सोवियतें भी मौजूद थीं । मुख्य रूप से सैनिकों और मजदूरों की इन सोवियतों में आम तौर पर वामपंथियों का प्रभुत्व था । असल जीवन में इन सोवियतों के आदेश ही लागू होते थे । इसी माहौल में जनता के भीतर बढ़ते विक्षोभ ने अस्थायी सरकार और सोवियतों को एक दूसरे के आमने सामने खड़ा कर दिया था । बुर्जुआ राज्य और जनता के प्रतिनिधियों की सत्ता का यह विरोध एक हद तक इस किताब के सैद्धांतिक स्वरूप की आत्मा है ।
सैनिक युद्ध से ऊबे हुए थे । उनके बीच बोल्शेविकों की शांति संबंधी अपील तेजी से असर कर रही थी । अस्थायी सरकार लगातार अलोकप्रिय होती जा रही थी । क्रांति आसन्न थी । सरकार में शामिल लोग बोल्शेविकों के विरुद्ध वैचारिक हमला जारी रखे हुए थे । क्रांति में बोल्शेविकों को नेतृत्व देने के लिए लेनिन जुलाई में पेत्रोग्राद लौटे ही थे कि उनके जर्मनी के मुखबिर होने की अफवाह उड़ा दी गई । अचानक बोल्शेविकों के लिए पेत्रोग्राद सुरक्षित नहीं रह गया । जगह जगह उन पर हमले होने लगे । सोवियतों की सत्ता ने बोल्शेविकों को दमन न होने का भरोसा दिया लेकिन अस्थायी सरकार ने नेताओं की गिरफ़्तारी का हुक्म जारी कर दिया । शुरू में लेनिन ने गिरफ़्तारी देकर मुकदमे का सामना करने का फैसला किया लेकिन माहौल इतना खराब था कि साथियों की सलाह पर जुलाई के शुरू में उन्हें गुप्त तरीके से शहर छोड़ना पड़ा । सुदूर देहात में गुप्त जीवन बिताते हुए लकड़ी के एक कुन्दे को कुर्सी और दूसरे को मेज बनाकर दो महीने में उन्होंने यह किताब लिखी । उन्हें बचने की उम्मीद नहीं थी इसलिए निर्देश लिखा कि कुछ हो जाने पर नीली नोटबुक कोराज्य और क्रांतिके रूप में छाप दिया जाए ।
इस तरह की सैद्धांतिक किताब की जरूरत उन्हें एकाध साल पहले से ही महसूस हो रही थी । उन्होंने बुखारिन के चिंतन में राज्य के सिलसिले में मार्क्सवादी समझ से भटकाव देखा और इस किताब की योजना बनाई । 1917 के शुरू में प्रवास के दौरान किताब के लिए सामग्री उन्होंने तैयार कर ली थी । स्विट्ज़रलैंड से रूस के लिए आते हुए यह सामग्री वे पीछे छोड़ आए थे । जुलाई विद्रोह की असफलता के बाद इसी सामग्री के आधार पर यह किताब लिखी गई थी । उन्हें इसकी जरूरत महसूस हुई क्योंकि न केवल प्लेखानोव बल्कि काउत्सकी भी इस सवाल पर भ्रमित दिखाई पड़े । सात अध्यायों में किताब लिखने की योजना थी लेकिन 1905 और 1917 की क्रांतियों के अनुभव संबंधी सातवां अध्याय लिखा नहीं जा सका । उसका खाका बना लिया था । लगा कि उस पर विस्तार से लिखना होगा इसलिए जो सामग्री थी उसे ही प्रकाशित करवा लिया ।
पांडुलिपि में लेखक के बतौर एफ़ एफ़ इवानोव्सकी का नाम दर्ज था । लेनिन को लगा था कि उनके नाम से छपने पर किताब जब्त हो जाएगी । आखिरकार इसका प्रकाशन 1918 में हो सका । उस समय तक किसी छद्म नाम की जरूरत ही नहीं रह गई थी । 1919 में दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ जिसमें किताब के दूसरे अध्याय में ‘मार्क्स ने 1852 में प्रश्न को किस तरह पेश किया था’ शीर्षक नया अनुभाग जोड़ा गया ।
इस किताब में लेनिन का केंद्रीय तर्क यह है कि राज्य का उदय ही वर्ग विभाजित समाज में शासक वर्ग की सत्ता को दमन के सहारे बनाए रखने के लिए हुआ था । यही नहीं राज्य की मौजूदगी का मतलब है कि समाज में न केवल परस्पर विरोधी वर्ग और उनके स्वार्थ बने हुए हैं बल्कि उनके बीच का अंतर्विरोध असमाधेय है । असल में अक्टूबर क्रांति से पहले जब फ़रवरी क्रांति में जारशाही का अंत हो गया और अस्थायी सरकार का गठन हुआ तो इस अस्थायी सरकार में शामिल विभिन्न वामपंथी गुटों में परिस्थिति के दबाव के चलते राज्य के बारे में तमाम किस्म के भ्रम फैल रहे थे । कुछ लोगों को लग रहा था कि चूंकि राज्य वर्गोपरि हो जाता है इसलिए उसका उपयोग किया जा सकता है । दूसरे सिरे पर अन्य लोग तत्काल राज्य के खात्मे के पक्ष में थे ।
इस स्थिति में लेनिन को राज्य के बारे में मार्क्सवादी धारणा को स्पष्ट करना सैद्धांतिक से अधिक व्यावहारिक सवाल महसूस हुआ । उन्होंने जोर देकर कहा कि राज्य की भूमिका वर्ग संघर्ष को खत्म करने की नहीं होती । उसकी मौजूदगी ही वर्ग संघर्ष के तीखेपन का प्रमाण है । इसी सिलसिले में पेरिस कम्यून से ली गई मार्क्स की सीख को भी बार बार किताब में दोहराया गया है । मार्क्स ने कहा था कि सर्वहारा का काम पहले से मौजूद राज्य की बनी बनाई मशीनरी से नहीं चल सकता । उसे राज्य की अपनी मशीनरी का निर्माण करना होता है । इसे मार्क्स की तरह ही लेनिन ने भीसर्वहारा की तानाशाहीके जरिए लागू होता दिखाया है । लेनिन इस बात पर जोर देते हैं कि बुर्जुआ राज्य का ध्वंस सर्वहारा का कर्तव्य है । इस कर्तव्य को पूरा करने के लिए लेनिन नियमित सेना की जगह पर सशस्त्र जन मिलीशिया की स्थापना, राज्य के कामों की जटिलता को समाप्त करके नौकरशाही को अप्रासंगिक बना देने और अल्पतंत्र की तानाशाही के बरक्स बहुमत की तानाशाही कायम करने का उपाय सुझाते हैं । कहने की जरूरत नहीं कि अक्टूबर क्रांति के बाद बनने वाली व्यवस्था के लिए ये बेहद ठोस सवाल थे । अचरज नहीं कि नई सत्ता के मंत्रियों ने अपने आपको संबंधित विभागों का जन कमीसार कहना पसंद किया ।
बुर्जुआ राज्य और क्रांति के बाद स्थापित होने वाली सत्ता के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण अंतर की ओर लेनिन ने पेरिस कम्यून संबंधी मार्क्स के लेखन के सहारे इशारा किया । मार्क्स ने कहा था कि पेरिस कम्यून ने विधायिका और कार्यपालिका को मिला दिया था । असल में अगर कार्यपालिका अलग रहती है तो विधायिका केवल बहसबाजी का अड्डा बनकर रह जाती है । लोकतंत्र वहीं तक सीमित रह जाता है और राज्य के असली काम नौकरशाही के जरिए कार्यपालिका निपटाती है । संसार के लगभग सभी लोकतांत्रिक देशों में विधायिका की इस कमजोरी को महसूस किया जाता रहा है । बुर्जुआ लोकतांत्रिक राज्य की जान विधायिका नहीं, सैन्यतंत्र और नौकरशाही का ढांचा होता है । क्रांति के बाद स्थापित होने वाली सत्ता का काम इस मुखौटे को वास्तविक ताकत में बदलना है । राज्य के काम को संचालित करने वाली वास्तविक संस्थाओं को जनता के नियंत्रण में लाकर ही उन्हें कारगर बनाया जा सकता है । इसका संबंध समाज के संचालन को अधिकाधिक आसान बनाने से भी है ।
आज भी इस किताब की प्रासंगिकता को समझा जा सकता है । अनेक वामपंथी नेता वर्तमान राज्य कोकल्याणकारी राज्यमें तब्दील करने की बात करते देखे जा सकते हैं और इसमें तत्कालीन भ्रमों की अनुगूंज सुनना मुश्किल नहीं है । बुर्जुआ शासन को अल्पतंत्र की तानाशाही मानने की प्रतिध्वनि 1% के शासन की धारणा में महसूस किया जा सकता है । उसके मुकाबले 99% की वंचना की समझ मार्क्स से उपजी थी किंतु लेनिन के जरिए हम तक पहुंची है । सबसे पुराने लोकतंत्र का दावा करने वाले देश अमेरिका में भी तमाम राजनेता इस बात को मानने लगे हैं कि देश की असली ताकत कांग्रेस के चुने हुए प्रतिनिधियों के मुकाबले थैलीशाहों, जासूसी और निगरानी की संस्थाओं तथा सेना के हाथों में केंद्रित होती गई है ।   

अंध-राष्ट्रवाद की तत्कालीन बीमारी भी अक्सर वाम राजनीतिज्ञों के एक हिस्से को आज भी बुर्जुआ शासकों के साथ खड़ा कर देती है । जिस तरह उस समय के रूस में जर्मनी के विरुद्ध उन्माद से लेनिन ने लोहा लिया था उसी तरह कई बार हमें भी पड़ोसी मुल्कों के विरुद्ध उन्माद से जूझना पड़ता है । बुर्जुआ वर्ग के पास सर्वहारा को रक्षात्मक मुद्रा में धकेल देने का सबसे आजमाया हुआ हथियार युद्धोन्माद है । युद्ध और कुछ नहीं संकटग्रस्त पूंजी के पुनर्गठन का माध्यम होता है । इसके सहारे वह अपने बर्बर शोषक शासन के लिए वैधता तो हासिल करता ही है देश की सीमा के भीतर भी विभिन्न समुदायों के कत्लेआम के लिए उकसावा प्रदान करता है । ऐसी स्थितियों में लेनिन की यह किताब हमें हमेशा भ्रम और निराशा से बाहर निकालने में मदद करती रहेगी ।                                 

Sunday, July 2, 2017

इक्कीसवीं सदी में अक्टूबर क्रांति

                
                                            
अक्टूबर क्रांति को महज सौ साल बीते हैं लेकिन उसकी बात प्रागैतिहासिक काल जैसी महसूस होती है । क्रांति का अर्थ सूचना-संचार की तकनीकों के लिए सीमित हो चला है और राजनीतिक क्रांति की कल्पना कठिन हो गई है । इसकी प्रासंगिकता ही संदेह के घेरे में है और हालात में बदलाव को वर्तमान व्यवस्था के भीतर ही खोजा जा रहा है । फिर भी रह रह कर दबी हुई आग की तरह रूसी बोल्शेविक क्रांति की भावना धधक उठती है । रूसी बोल्शेविक क्रांति के बारे में पूरी बीसवीं सदी में और इक्कीसवीं सदी के इन वर्षों में जो भी बातें हुईं या हो रही हैं उन सबके साथ राजनीति जुड़ी हुई है । इसका कारण है कि अतीत का कोई भी मूल्यांकन शुद्ध रूप से वस्तुगत नहीं होता । हमारी वैचारिक मान्यताओं से इतिहास के बारे में हमारी राय प्रभावित होती है । रूसी क्रांति के मामले में ये मान्यताएं और भी दृढ़ रही हैं ।
अंतर्राष्ट्रीय वाम आंदोलन में मार्क्स की विरासत के स्वाभाविक दावेदार जर्मनी के सामाजिक जनवादी थे  लेकिन प्रथम विश्व युद्ध के समय लेनिन को छोड़कर लगभग सभी सामाजिक जनवादियों ने अपनी अपनी सरकारों का साथ दिया था । ये लोग दूसरे इंटरनेशनल से जुड़े हुए थे । अकेले लेनिन ने इसे साम्राज्यवादी युद्ध माना और इससे उपजे हालात का लाभ क्रांति के लिए उठाया । रूस एशिया और यूरोप दोनों में बंटा हुआ था । लेनिन को उम्मीद थी कि रूसी क्रांति के प्रभाव से यूरोप में क्रांतियों की लहर पैदा होगी । खासकर उन्हें जर्मनी से बहुत आशा थी । इतिहास की वास्तविक गति में ऐसा कुछ हुआ नहीं और रूस को अपने बल पर ही क्रांति को टिकाए रखना पड़ा ।
इसके चलते पश्चिमी मार्क्सवाद की धारा और रूसी क्रांति से प्रभावित कम्यूनिस्टों की तीसरे इंटरनेशनल की धाराएं अलग अलग विकसित हुईं । पश्चिमी मार्क्सवाद से जुड़े लोग रूसी क्रांति और उसके नेताओं को मान्यता देने में हिचकते हैं । कुछ लोग इसके लिए ग्राम्शी, रोज़ा लक्जेमबर्ग, क्लारा जेटकिन और लूकाच को लेनिन के विरोध में खड़ा करके उनका साथ देने लगते हैं । कुछ अन्य लोग लेनिन को तो मान्यता दे देते हैं लेकिन स्तालिन के सवाल पर अड़ जाते हैं । उदाहरण के लिए प्रसिद्ध मार्क्सवादी इतिहासकार एरिक हाब्सबाम ने जब बीसवीं सदी में मार्क्सवाद के उत्थान पतन का जायजा लिया तो उन्होंने विभिन्न दौरों में मार्क्सवाद की उठती गिरती किस्मत पर प्रकाश डाला । इन दौरों में जहाँ पहला दौर 1880 से 1914 का है वहीं दूसरा दौर सीधे 1929 से 1945 का है । बीच का 1914 से 1929 तक का दौर, हो सकता है, बिना किसी कारण के छोड़ दिया गया हो लेकिन लेनिन के बाद सोवियत संघ और अन्य मुल्कों में हो रहे विकास के प्रति लेखक की अरुचि की झलक भी इससे मिलती है ।
आम धारणा ही स्तालिन को तानाशाह मानती है लेकिन जो मार्क्सवादी हैं उनमें से भी एक हिस्सा स्तालिन के मुकाबले त्रात्सकी के समर्थन में खड़ा हो जाता है । यह सवाल रूसी क्रांति की अवधि के मामले में दुबिधा का रूप ले लेता है । इसके अतिरिक्त स्तालिन के शासन काल में हिटलर की सेनाओं के साथ युद्ध में सोवियत सेना की जीत के चलते थोड़ी दुबिधा यहां भी बनी रहती है । आगे जिन किताबों और लेखकों का जिक्र किया जा रहा है उनके प्रसंग में ये सारे सवाल प्रकट होंगे ।   
1996 में पिमलिको से ओरलैन्डो फ़िगेस की किताब ‘ए पीपुल’स ट्रेजेडी: द रशियन रेवोल्यूशन, 1891-1924’ का प्रकाशन हुआ । भूमिका में वे बताते हैं कि आजकल इतने छोटे बदलावों को भी क्रांति कहने का रिवाज चल पड़ा है कि इस किताब में जिसको क्रांति कहा गया है उसकी व्यापकता को समझने में पाठक को दिक्कत महसूस होगी । रूसी क्रांति प्रभाव के मामले में दुनिया के इतिहास की कुछेक बड़ी घटनाओं में से एक थी । इसके घटित होने के एक पीढ़ी बाद ही दुनिया की एक तिहाई आबादी इसके विचारधारात्मक असर वाले शासन में आ गई । इसने समकालीन दुनिया की शक्ल परिभाषित की और इसकी छाया से बाहर आना बस अभी सम्भव हुआ है । इन्हीं की एक किताब रेवोल्यूशनरी रशिया, 1891-1991: ए पेलिकन इंट्रोडक्शनका प्रकाशन 2014 में पेलिकन से हुआ है । किताब का मकसद रूसी क्रांति को दीर्घकालीन इतिहास के नजरिए से देखना है । लेखक ने सौ सालों को एक ही क्रांतिकारी चक्र के बतौर व्याख्यायित किया है । इसकी शुरुआत 1891 में अकाल के समय ज़ार की तानाशाही के साथ जनता के टकराव से होती है और खात्मा 1991 में सोवियत सत्ता के अंत से होता है । रूसी क्रांति के अधिकतर वर्णन 1917 से थोड़ा पहले से शुरू होकर 1917 के थोड़ा बाद जाकर खत्म हो जाते हैं । लेकिन लेखक का मानना है कि रूसी क्रांति के समूचे चरित्र को समझने के लिए रूस के दीर्घकालीन इतिहास को देखने से हम उसके बीज, उसकी हिंसा, स्वतंत्रता के बाद तानाशाही की परिघटनाओं को रूस के ज़ारशाही अतीत के सहारे समझ सकते हैं । क्रांति के प्रभाव की दीर्घकालिकता भी लम्बे समय के इतिहास से ही स्पष्ट होती है । रूसी क्रांति को बहुत सारे लोग 1921 में गृहयुद्ध के खात्मे के साथ खत्म मान लेते हैं, कुछ लोग 1924 में लेनिन के देहान्त तक उसकी व्याप्ति मानते हैं । कुछ लोग 1927 में त्रात्सकी की पराजय से उसे जोड़ते हैं, कुछ अन्य 1929 में जबरिया खेती के समूहीकरण और उद्योगीकरण तथा पंच वर्षीय योजनाओं तक उसकी निरंतरता स्वीकार करते हैं । लेखक ने इन सबसे अलग रुख अपनाया है ।  
सभी मानते हैं कि रूस के पतन के शुरुआती झटके के तुरंत बाद इक्कीसवीं सदी से थोड़ा पहले ही मार्क्सवाद में व्यापक रुचि पैदा हुई । इस रुचि का दायरा केवल मार्क्सवाद नहीं बल्कि उसके रूसी व्यवहार तक भी फैला हुआ था । उदाहरण के लिए 1999 में यू सी एल प्रेस से मर्क सैंडल की किताब ‘ए शार्ट हिस्ट्री आफ़ सोवियत सोशलिज्म’ का प्रकाशन हुआ । इसमें भी लेखक ने रूसी इतिहास के 1917 से 1991 तक के समय को समाजवादी प्रयोग का समय माना है ।  
2000 में मैकमिलन से राबर्ट सर्विस की किताब ‘लेनिन: ए बायोग्राफी’ का प्रकाशन हुआ । फिर 2002 में पैन बुक्स से उसका प्रकाशन हुआ और 2008 में पैन बुक्स ने ही उसका ईलेक्ट्रानिक संस्करण जारी किया । लेखक का कहना है कि सोवियत संघ में कम्यूनिस्ट पार्टी के संग्रहालय को शोध हेतु खोल देने से उन्हें बाकी जीवनियों के मुकाबले ज्यादा सामग्री देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ।
लेनिन के व्यक्तित्व की उपलब्धियों को गिनाते हुए लेखक ने बोल्शेविक नामक एक गुट को ऐसी पार्टी में बदल देने का उल्लेख किया है जिसने 1917 की क्रांति को संपन्न किया । इस क्रांति के फलस्वरूप दुनिया के इतिहास की पहली समाजवादी सत्ता की स्थापना हुई और तमाम विपरीत स्थितियों में भी कायम रही । प्रथम विश्व युद्ध और गृह युद्ध से सफलतापूर्वक देश को बाहर निकाला गया । कम्यूनिस्ट इंटरनेशनल की स्थापना करके पूरे महाद्वीप की राजनीति को इस सत्ता ने प्रभावित किया । इन सबका कारण यह था कि लेनिन का शुरुआती जीवन रूसी समाज के इतिहास के एक विचित्र समय में गुजरा । उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में रूसी साम्राज्य बुनियादी परिवर्तन से गुजर रहा था और उसी के साथ लेनिन की पीढ़ी ऐतिहासिक बदलावों के भंवर में उलझी हुई थी । दुनिया का सबसे बड़ा देश अपनी संभावनाओं को खोल और परख रहा था । पुराने सामाजिक और सांस्कृतिक बंधन ढीले पड़ रहे थे । अंतर्राष्ट्रीय संपर्क बढ़ रहा था और रूस की सांस्कृतिक और वैज्ञानिक उपलब्धियों को सारा संसार अचम्भे से देख रहा था ।    
लेखक का कहना है कि फिर भी शिक्षित लोगों को बदलाव की रफ़्तार बेहद सुस्त महसूस हो रही थी । उन्हें लगता था कि रूस इतना विराट, इतना विविध और इतना परंपराबद्ध है कि बदल नहीं सकता । रूसी समाज बदलाव का आदी नहीं था । 1861 में अलेक्सान्द्र द्वितीय ने कुछ बदलाव लाने की कोशिश की थी लेकिन बदलाव के समक्ष मुश्किलें बहुत थीं । अमीर-गरीब के बीच चौड़ी खाई थी । देहात की किसान आबादी अपनी दुनिया से बाहर कुछ नहीं सोचती थी । सरकारी अधिकारियों और संपत्तिशाली लोगों के विरुद्ध विक्षोभ फैला हुआ था । दूसरी ओर कोयला, लोहा, हीरा, सोना और तेल का विशाल भंडार था । विशाल भूक्षेत्रों में प्रचुर अन्न पैदा होता था । सुसंस्कृत कुलीन तबका था । महान उपन्यासकार, वैज्ञानिक, संगीतज्ञ और चित्रकार थे । पेशेवर मध्यवर्ग की तादाद में बढ़ोत्तरी हो रही थी । स्थानीय स्वशासन की संस्थाएं विकसित हो रही थीं । नौकरशाही में कुलीनों के मुकाबले पेशेवर लोग अधिक दाखिल हो रहे थे । इस संक्रमण से उथल पुथल पैदा हो रही थी । यथास्थिति के विरोधी, सदियों से समाज का दमन करनेवाली बादशाहत के विरोध में हिंसक उपाय अपना रहे थे । किसानी समाजवाद के पक्षधर अपनी विचारधारा का प्रचार करते थे । उदारपंथी भी थे लेकिन सदी का अंत आते आते जार की तानाशाही के विरुद्ध सबसे प्रभावी विचारधारा के रूप में मार्क्सवाद स्थापित हो गया । जार और पूंजीवाद के अनेक पहलुओं के विरुद्ध बौद्धिक और मेहनतकश हलकों में व्याप्त माहौल से लेनिन को बहुत लाभ मिला । प्रथम विश्व युद्ध में रूस की हालत ने शासन विरोधी माहौल बनाने में मदद की ।
लेनिन पर अपने समय का प्रभाव तो था ही, समय पर उनका प्रभाव भी कुछ कम गहरा नहीं था । पैतृक घर में शिक्षा को उन्नति की राह समझा जाता था । शिक्षा के चलते उन्हें विदेशी भाषाओं को सीखने का मौका मिला, विज्ञान के प्रति लगाव पैदा हुआ और समाज को समझने में सहायक विचारधाराओं से प्रेम हुआ । उन्हें अपनी भावनाओं को काबू में रखना आता था और अपने क्रोध को जुझारू आक्रामकता का रूप देकर वे लंबे समय तक राजनीतिक लड़ाई लड़ सकते थे । अपनी बुनियादी मान्यताओं को उन्होंने दृढ़ता के साथ पकड़े रखा । मार्क्सवाद के अलावा रूसी साहित्य का भी उन पर अमिट असर पड़ा था । छपे हुए शब्दों से उनका नाता अधिक गहरा था । लेनिन घनघोर पढ़ाकू और प्रचंड लिक्खाड़ थे, वक्ता उतने प्रभावी न थे । अध्ययन और राजनीतिक संवेदनशीलता के कारण 1917 में उन्होंने सत्ता दखल की पटकथा लिखी । नतीजतन अक्टूबर में सत्ता दखल को अंजाम दिया । मार्च 1918 में ब्रेस्त-लितोव्स्क की संधि के जरिए रूस पर जर्मनी के हमले को रोका । 1921 में नई आर्थिक नीति लागू करके उन्होंने नवजात सोवियत संघ को जन विक्षोभ से उबारा । इन सभी मौकों पर लेनिन द्वारा संचालित अभियानों ने घटनाओं की दिशा तय की । 
इसी कड़ी में 2002 में आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से ए वेरी शार्ट इंट्रोडक्शन नामक पुस्तक श्रृंखला के तहत स्टीव स्मिथ की किताब ‘द रशियन रेवोल्यूशन: ए वेरी शार्ट इंट्रोडक्शन’ का प्रकाशन हुआ । लेखक ने फ़रवरी और अक्टूबर की क्रांतियों को निरंतरता में देखा है क्योंकि फ़रवरी में ज़ारशाही को उखाड़ फेंका गया और अक्टूबर में बोल्शेविकों ने सत्ता पर कब्जा किया । इसी साल पालग्रेव से जान गुडिंग की किताबसोशलिज्म इन रशिया: लेनिन ऐंड हिज लीगेसी, 1890-1991’ का प्रकाशन हुआ । किताब में लेखक ने बीसवीं सदी में रूस में किए गए समाजवादी प्रयोग के सिलसिले में कुछ बुनियादी सवालों का जवाब देने की कोशिश की है । पहला तो यह कि रूस जैसे पिछड़े अर्ध-एशियाई देश में मार्क्सवाद से प्रभावित समाजवादी विचारों ने कैसे जड़ पकड़ी । इसका जवाब देते हुए वे कहते हैं कि मजबूत भौतिक आधार न होने के बावजूद रूसी समाज को समाजवाद की सबसे अधिक जरूरत थी । लेखक ने रूसी क्रांति की मौजूदगी 1917 के बाद आगामी चौहत्तर सालों तक मानी है ।
2003 में रटलेज से स्टीफेन जे ली की किताब ‘लेनिन ऐंड रेवोल्यूशनरी रशिया’ का प्रकाशन हुआ । किताब इस बात का सबूत है कि मार्क्स के नवोत्थान के साथ उस क्रांतिकारी मार्क्सवादी परंपरा का भी उत्थान हो रहा है जिसे कम्यूनिस्ट आंदोलन की बहसों की गरमी में त्याग सा दिया गया था ।
इसके अगले साल ही 2004 में पालग्रेव मैकमिलन से आर डब्ल्यू डेविस की नई भूमिका के साथ ई एच कार की किताब ‘द रशियन रेवोल्यूशन: फ़्राम लेनिन टु स्तालिन (1917-1929)’ को फिर से छापा गया । मूल रूप से 1979 में इसका प्रकाशन हुआ था । ई एच कार ने तीस साल लगाकर चौदह खंडों में सोवियत संघ का इतिहास लिखा था । उसी सामग्री के आधार पर उन्होंने यह किताब विद्यार्थियों के लिए लिखी थी । सोवियत संघ की समाजवादी व्यवस्था की समस्याओं को गहराई से समझने की इस ऐतिहासिक कोशिश को पलटकर इस समय देखने पर पता चलता है कि क्रांति के बाद नवस्थापित सोवियत सत्ता को इतिहास में पहली बार ऐसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था जिसका न तो मानवता ने कभी सामना किया था, न ही क्रांति के नेतागण को इनके समाधान का कोई अनुभव रहा था । फिर भी विपरीत स्थितियों से जूझते हुए रचनात्मक तरीके से जीवित मनुष्यों के उस समाज में जमीन से उठकर आए सेना और मजदूर समुदाय के नेताओं ने इसे कर दिखाया ।  
2005 में द यूनिवर्सिटी आफ़ मिशिगन प्रेस से मोशे लेविन की किताब ‘लेनिन’स लास्ट स्ट्रगल’ का प्रकाशन हुआ । किताब मूल रूप से लेनिन द्वारा संकट के समय अपनाई गई नई आर्थिक नीति से जुड़े संघर्षों का विश्लेषण करती है । नई आर्थिक नीति का महत्व यह है कि उसके जरिए लेनिन ने योजना और बाजार के समन्वय की दिशा में एक गंभीर प्रयोग किया था । इसी के साथ लेनिन इस समस्या से भी जूझ रहे थे कि जो क्रांति जनता की मुक्ति के लिए हुई थी उससे उत्पन्न राज्य अपने आपमें ऐसा ढांचा बन गया जो मुक्ति के लिए बाधक साबित हो रहा था । ये दोनों समस्याएं आपस में जुड़ी हुई थीं । अर्थतंत्र और प्रशासन के क्षेत्र में जनता की पहलकदमी और पार्टी ढांचे के बीच तालमेल की कोशिश ही लेनिन के जीवन के अंतिम साल का सबसे घनघोर संघर्ष था ।
2006 में अजंता बुक्स इंटरनेशनल से रणधीर सिंह की किताब क्राइसिस आफ़ सोशलिज्म का प्रकाशन हुआ । किताब में समाजवाद के संकट की बात करते हुए रूस में घटित घटनाओं को समझने की कोशिश की गई थी । रणधीर सिंह ने रूस के पतन को किसी घटना या तारीख में देखने की जगह एक प्रक्रिया के रूप में देखा । उन्होंने इस घटना से कुछ सैद्धांतिक सवाल भी उठाए । उनका कहना था कि सत्ता पर बोल्शेविकों के काबिज होने के बाद से ही नौकरशाही का विकास शुरू हो गया । शुरू में लेनिन और बाद में स्तालिन ने इससे लड़ाई जारी रखी लेकिन स्तालिन की मृत्यु के बाद इस तबके ने शासन और पार्टी दोनों पर कब्जा कर लिया । इस प्रक्रिया का विस्तार से विश्लेषण करने के बाद रणधीर सिंह ने दो जरूरी सवाल उठाए । एक तो यह कि तीसरे इंटरनेशनल द्वारा सूत्रबद्ध वर्तमान दौर की कम्यूनिस्ट पार्टियों के सांगठनिक ढांचे में इस नौकरशाही से बचने या पैदा होने के बाद उससे लड़ने की कोई संस्थाबद्ध आंतरिक प्रक्रिया नहीं है । दूसरे यह कि क्रांति के बाद सत्ता मिलने पर वर्गों के निर्माण और फिर उसके कारण वर्ग विभेद की स्थिति पैदा हुई थी । इस वर्ग निर्माण के कारणों और इससे पैदा समस्याओं को हल करने का कोई रास्ता मार्क्सवाद के भीतर नहीं है । स्वाभाविक है कि इन हालात की पूर्व कल्पना मार्क्स-एंगेल्स के लिए कठिन थी ।       
2014 में पालग्रेव मैकमिलन से अगस्त एच निम्ज़ की किताब ‘लेनिन’स एलेक्टोरल स्ट्रेटेजी फ़्राम 1907 टु द अक्टूबर रेवोल्यूशन आफ़ 1917: द बैलट, द स्ट्रीट्स- आर बोथ’ का प्रकाशन हुआ । यह किताब रूसी क्रांति के बारे में लिखी गई अन्य किताबों से इस मामले में अलग है कि जब हम रूसी क्रांति की बात करते हैं तो भूल जाते हैं कि लेनिन ने चुनाव भी लड़े थे । लेखक का दावा है कि बोल्शेविकों की चुनावी रणनीति से अक्टूबर क्रांति का बहुत गहरा रिश्ता है । इस मामले में रूसी क्रांति अब तक की सभी क्रांतियों से अलग है कि उसमें चुनाव अभियानों से हासिल अनुभवों का भरपूर रचनात्मक इस्तेमाल किया गया था ।

2016 में मंथली रिव्यू प्रेस से समीर अमीन की किताब ‘रशिया ऐंड द लांग ट्रान्जीशन फ़्राम कैपिटलिज्म टु सोशलिज्म’ का प्रकाशन हुआ । किताब में रूस के दानवीकरण की कोशिशों का विरोध किया गया है । उनका कहना है कि पश्चिमी संचार माध्यमों द्वारा रात दिन यह प्रचारित किया जा रहा है कि रूस में ज़ारशाही की विरासत को सोवियत संघ के नाम पर जारी रखा गया था । रूस की ऐसी छवि बनाई जा रही है कि जैसे ज़ारशाही के समय उससे बचकर रहना पड़ता था उसी तरह आज भी बचने की जरूरत है और बचाने की जिम्मेदारी अमेरिका और नाटो की संहारक सैन्य शक्ति को दे दी गई है । समीर अमीन की इस किताब में शामिल लेख 1990 से लेकर 2015 के बीच के लिखे हुए हैं । उन्हें उम्मीद है कि इनके जरिए पश्चिमी दुनिया में प्रचारित छवि के विपरीत रूस की वैकल्पिक छवि देखने का मौका पाठकों को मिलेगा ।
2017 में आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से मार्क डी स्टाइनबर्ग की किताबद रशियन रेवोल्यूशन, 1905-1921’ का प्रकाशन हुआ है । लेखक का जोर रूसी क्रांति की कहानी को लोगों के अनुभव के रूप में बताने पर है । इस क्रांति की कहानी भांति भांति से सुनाई गई है । इस क्रांति के तमाम कारण बताए जाते हैं । ऐसा करते हुए संस्थाओं, नेताओं और विचारधाराओं की भूमिका को खासा महत्व दिया जाता है । सामाजिक इतिहास में रूसी समाज के ऊपरी और निचले तबकों की बढ़ती हुई सामाजिक गोलबंदी को घटनाक्रम का प्रधान कारण बताया जाता है । इसी के तहत मनोवृत्तियों और दृष्टिकोणों की जटिल दुनिया में झांकने की कोशिश की जाती है । अनुभव आधारित इतिहास लेखन में जीवंत भागीदारी का सहारा लिया गया है । बाहरी दुनिया के साथ हमारे आंतरिक संवाद को अनुभव कहा जा सकता है । अपने आप से बाहर के अस्तित्व के साथ यह ऐसा टकराव होता है जो हमें अप्रत्याशित तरीके से बदल देता है । दुनिया के बारे में हमारे परिपक्व और विकसित ज्ञान को भी अनुभव कहा जाता है । कुछ हद तक यह व्याख्या भी होता है । अतीत के बारे में हमारे ज्ञान और व्याख्या पर अतीत की अपनी व्याख्या और ज्ञान का प्रभाव पड़ता है । इतिहासकार कोशिश करते हैं कि अतीत के प्रामाणिक अनुभव तक पहुंचें लेकिन ऐसा संभव नहीं होता । अलग बात है कि इस क्रम में तमाम चीजें हाथ लगती हैं । इस यात्रा में संग्रहालय बड़े काम की चीज होते हैं । इसीलिए प्राथमिक स्रोत का महत्व सबसे अधिक होता है । किताब में अखबारों पर स्रोत के रूप में काफी भरोसा किया गया है । अनुभव के इतिहासकार के लिए अखबार अतीत का वर्तमान होते हैं । हालांकि अखबार का संवाददाता भी अखबार की बिक्री से लेकर राजनीतिक लक्ष्य की सेवा तक विभिन्न तत्वों से प्रभावित होकर कोई भी कहानी सुनाता है । रूस में तो सरकारी सेंसर का भी दबाव रहता था । लोग कहते हैं कि अखबार दर्पण होता है लेकिन साथ ही यह भी जानते हैं कि वे दर्पण के अतिरिक्त भी ढेर सारे काम करते हैं । रूस के पत्रकार हमेशा टिप्पणी और राय की जिम्मेदारी उठाना आवश्यक समझते रहे हैं । इसमें तथ्य और उसकी व्याख्या के बीच संतुलन बनाना मुश्किल होता है । अगर वर्ग या किसी कोटि के बजाए ठोस मनुष्य के रूप में लोगों के अनुभवों तक पहुंचना हो तो इन बातों का ध्यान रखना जरूरी हो जाता है । किताब में जिन मूल्यों के लिए लोग लड़े उनकी भी चर्चा है । सामाजिक, आर्थिक, लैंगिक और नृजातीय विषमताओं का भी ध्यान रखा गया है । हिंसा के भी जरिए अभिव्यक्त सत्ता और प्रतिरोध की परिघटना को समेटने की कोशिश की गई है । समझने का प्रयास किया गया है कि लोगों ने स्वतंत्रता को किस तरह समझा, बरता और हासिल किया ।   
2017 में वर्सो से तारिक अली की किताब ‘द डिलेमाज आफ़ लेनिन: टेररिज्म, वार, एम्पायर, लव, रेवोल्यूशन’ का प्रकाशन हुआ है । लेखक के अनुसार किताब का मकसद लेनिन को सही ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखना है । वे ऐसी क्रांति के जनक थे जिसने विश्व राजनीति को बदल दिया, पूंजीवाद और उसके साम्राज्य पर सीधे हमला किया तथा विउपनिवेशीकरण की प्रक्रिया तेज कर दी । इसके लेखन का दूसरा कारण यह है कि वर्तमान शासक विचारधारा और शक्ति संरचना बीसवीं सदी के सामाजिक मुक्ति संघर्षों के प्रति इतनी हिकारत से भरी हुई है कि ऐतिहासिक और राजनीतिक स्मृति का उत्खनन अपने आपमें प्रतिरोध महसूस हो रहा है । अब तो पूंजीवाद का विरोध भी बहुत सीमित हो चला है । सही है कि वर्तमान संघर्ष का लक्ष्य अतीत को दुहराना नहीं होना चाहिए बल्कि उससे सकारात्मक के साथ ही नकारात्मक शिक्षा भी लेनी चाहिए ।
श्री अली का कहना है कि बीसवीं सदी में लेनिन का अतिरिक्त सम्मान करनेवाले उन्हें शायद ही पढ़ते थे । दुनिया भर में तात्कालिक उद्देश्यों के लिए उनकी गलत व्याख्या की गई और उनके विचारों का दुरुपयोग किया गया । उनके विचारों के निर्माण की ऐतिहासिक प्रक्रिया की उपेक्षा की गई । लेनिन रूसी इतिहास के साथ ही यूरोपीय मजदूर आंदोलन की भी पैदाइश थे । इन्हीं दोनों के भीतर से वर्ग और पार्टी के संबंध का सवाल आया था । इस सवाल पर अराजकतावाद और मार्क्सवाद की धाराओं के बीच होड़ रही थी । इस होड़ में मार्क्सवाद की विजय में लेनिन की निर्णायक भूमिका रही । इसीलिए लेनिन के समक्ष उपस्थित दुबिधा की समझ के लिए लेखक को दोनों धाराओं के इतिहास की छानबीन जरूरी लगती है ।
तारिक अली बताते हैं कि लेनिन के बिना अक्टूबर क्रांति सम्भव नहीं थी । जिस गुट और पार्टी का उन्होंने 1903 से ही तमाम कष्ट उठाकर निर्माण किया था वह फ़रवरी 1917 से अक्टूबर 1917 के बीच के निर्णायक महीनों में क्रांति करने के लिए तैयार नहीं थे । लेनिन की विदेश से वापसी से पहले इसके ढेर सारे नेता महत्वपूर्ण मुद्दों पर समझौता करने को तैयार हो गए थे । इसका मतलब कि क्रांति के लिए ही बनाई गई राजनीतिक पार्टी भी नाजुक मौकों पर विचलित हो जा सकती है । लेनिन ने समझ लिया कि अगर इस मौके पर चूक हो गई तो फिर से प्रतिक्रिया की जीत हो जाएगी । उन्होंने जमीनी समर्थकों के बल पर अनिच्छुक बोल्शेविक नेताओं को क्रांति की पहल करके अपने पीछे चलने को मजबूर कर दिया । इसमें उनको युद्ध से उकताए सैनिकों का सबसे अधिक साथ मिला क्योंकि वे भी कई बरसों से खाइयों-खंदकों में आपस में वही बातें कर रहे थे जो बोल्शेविकों के नारों में व्यक्त हुईं । विश्व युद्ध की थकान ने लेनिन को मौका दिया और उन्होंने उसे लपक लिया । क्रांतियों से इतिहास आगे बढ़ता है । उदारपंथी उसके पीछे पीछे घिसटते हैं ।
प्रथम विश्वयुद्ध में लेनिन को पहली दुबिधा का सामना करना पड़ा था जब बहुतेरे लोग अपने अपने देशों के शासकों के समर्थन में खड़े हो गए उनमें जर्मन समाजवादी कार्ल काउत्सकी भी थे जिनका लेनिन बहुत सम्मान करते थे । साम्राज्यवादी युद्धोन्माद के समक्ष बौद्धिक विचलन से बचाव के लिए लेनिन को मार्क्स के विचारों की समझ पर्याप्त लगती थी । जब कार्ल काउत्सकी ने युद्धोन्माद के सामने समर्पण कर दिया तो उन्होंने जर्मन समाजवादियों से सार्वजनिक तौर पर नाता तोड़ लिया । उनकी दूसरी दुबिधा क्रांति के रास्ते के सिलसिले में उपजी । फ़रवरी 1917 के बाद यह सवाल कोई अमूर्त सवाल नहीं रह गया था । लेनिन ने समाजवादी क्रांति की राह चुनी । उनकी पार्टी के अन्य नेता बाद में समझ सके कि मजदूर वर्ग राजनीतिक रूप से वास्तव में आगे था ।
प्रथम विश्व युद्ध और अक्टूबर से पहले फ़रवरी क्रांति न हुए होते तो लेनिन भी ढेर सारे अन्य प्रवासी क्रांतिकारियों की तरह ही जारशाही के पतन की प्रतीक्षा करते हुए मर गए होते । त्रात्सकी भी एक और उपन्यासकार होकर रह गए होते । लेकिन अनुकूल परिस्थितियों के बावजूद उसका लाभ उठाने के लिए माकूल संगठन भी जरूरी होता है । इसके न होने के चलते ही दुनिया का इतिहास असफल क्रांतियों की गाथा से भरा हुआ है । हालांकि ढेर सारे लोग मानते हैं कि इतिहास की गति को मनमाने तरीके से तेज नहीं किया जा सकता लेकिन लेनिन का मानना था कि कभी कभी दशकों का काम कुछेक दिनों में निपटाया जा सकता है । अलग बात है कि यूरोप के मामले में उनकी उम्मीद के मुताबिक घटनाक्रम की गति नहीं रही ।
रूसी क्रांति को सही ऐतिहासिक संदर्भ में देखने के लिए तारिक अली ने रूस में पहले से चली आ रही क्रांति की परम्पराओं को याद दिलाया है । इन परम्पराओं में से एक तो क्रांतिकारी आतंक की धारा थी जिससे रूसी बौद्धिक समुदाय का भी एक हिस्सा जुड़ा हुआ था । इस धारा के लोगों ने ज़ार की हत्या की जिसके बाद चले भयानक दमन में इनके छोटे छोटे समूह खत्म हो गए । फिर भी बीसवीं सदी में बनने वाली अधिकतर राजनीतिक पार्टियों पर इस धारा का मजबूत प्रभाव था । ढेर सारे उदारवादी इतिहासकार समझते हैं कि अगर बोल्शेविक न आए होते तो रूस का पश्चिमी किस्म के लोकतंत्र में रूपांतरण हो गया होता । तारिक अली का अनुमान है कि यदि बोल्शेविकों का जन्म न हुआ होता तो पश्चिमी ताकतों के समर्थन से रूस में बड़े पैमाने पर खून खराबे के साथ सैनिक शासन स्थापित हुआ होता । फ़रवरी क्रांति से गठित सरकार रूस में व्याप्त संकट को हल करने में अक्षम थी । ऐसे हालात में या तो बोल्शेविकों के हाथ सत्ता आई होती या सेना के उन अधिकारियों के हाथ जिन्होंने बोल्शेविक क्रांति के बाद समूचे देश को गृहयुद्ध में झोंक दिया । क्रांति के संपन्न न होने पर सुधार का नहीं, प्रतिक्रिया का दौर आता है ।
अक्टूबर क्रांति के चरित्र पर विचार करते हुए वे बताते हैं कि कुछ अन्य लोग अक्टूबर क्रांति को केवल तख्तापलट समझते हैं । सही है कि शहरों में केंद्रित मजदूर वर्ग अल्पसंख्या में था लेकिन अगर देहात में फैले हुए खेतिहरों का समर्थन क्रांति को न मिला होता तो गृहयुद्ध में बोल्शेविकों को हारना पड़ता । क्रांतिकारी दौर में जनता का राजनीतिक प्रशिक्षण बहुत तेजी से होता है । जो किसान पहले बोल्शेविकों के मुकाबले दूसरों का समर्थन करते थे वे तेजी से बोल्शेविकों की तरफ चले आए । कोई भी अगुआ क्रांतिकारी पार्टी अपने दम पर ही जीत नहीं सकती । जो लोग इसे तख्तापलट मानते हैं वे इसमें अंतर्निहित क्रांति को नहीं समझ सकते । बीच में जुलाई में परिस्थिति के अपरिपक्व रहते क्रांति की कोशिश में लगे धक्के के बाद बोल्शेविकों के छापेखाने पर प्रतिबंध लग गया था, अनेक नेता जेल में ठूंस दिए गए और खुद लेनिन को फ़िनलैंड भागना पड़ा था । उन्होंने लगातार कहा कि यह धक्का अस्थायी है, जनता फिर से क्रांति करेगी और उसके लिए पार्टी को तैयार करना चाहिए । केंद्रीय समिति के कुछ महत्वपूर्ण नेतागण यकीन नहीं कर रहे थे और उन्होंने विद्रोह की योजना का विरोध किया । फिर भी विद्रोह हुआ ।
पूंजीवादी राज्य या साम्राज्यवादी सेनाओं के विरुद्ध हथियारबंद विद्रोह की विस्तृत और सटीक तैयारी करनी पड़ती है । विजय हेतु मजदूर और सैनिक योद्धाओं को सुनियोजित नेतृत्व देना जरूरी होता है । प्रत्येक क्रांति की विशेषता होती है लेकिन क्रांतियों में कुछ समरूपता भी होती है । इतिहास की एकाधिक क्रांतियां दो चरणों में पूरी हुईं । इसके उदाहरण के बतौर तारिक अली इंग्लैंड की 1648 की क्रांति, फ़्रांस की 1789 की क्रांति और रूस की बोल्शेविक क्रांति का जिक्र करते हैं । इनमें अंतर यह था कि जहां क्रामवेल और राबेस्पीयर को आगे की ओर घटनाओं ने धकेला वहीं रूस में लेनिन ने घटनाओं का क्रांति को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया । लेनिन ने अपने इन पूर्ववर्तियों से सीखा कि प्राप्य को हासिल करने के लिए अप्राप्य को पाने का लक्ष्य सामने रखना पड़ता है । इन सभी क्रांतियों को गृहयुद्ध में क्रांतिकारी राज्य की रक्षा के लिए पूरी तरह से नई सैन्य शक्ति का गठन करना पड़ा । इन सेनाओं में उन्नति योग्यता की जगह वर्ग के आधार पर होती थी । लेनिन और अन्य नेताओं में अंतर यह था कि क्रामवेल और राबेस्पीयर ने तब क्रांति में भाग लिया जब उसका होना निश्चित हो गया जबकि लेनिन ने क्रांति के लिए पचीस साल परिश्रम किया था । इसके लिए वे भूमिगत रहे, जेल गए और विदेश भी भागे । तय नहीं था कि उनके जीवनकाल में यह घटित होगी । उन्होंने कहा भी कि उनकी पीढ़ी सफल नहीं भी हो सकती है । वे भविष्य के लिए लड़ रहे हैं । अपनी आकांक्षा को वे कभी यथार्थ नहीं मानते थे । उनका मानना था कि जीत, हार और संक्रमण के समय कठोर क्रांतिकारी यथार्थवाद बेहद जरूरी होता है । केंद्रीय समिति के बहुमत के विरुद्ध जाकर भी क्रांति की सफलता सुनिश्चित करने में लेनिन की भूमिका निर्णायक थी ही, नवोदित राज्य की रक्षा के लिए भी उन्हें बहुधा ऐसा करना पड़ा । ब्रेस्त-लितोव्स्क संधि के समय भी वे अल्पमत में थे । 1917 से 1922 तक पांच साल लेनिन ने सरकार का नेतृत्व किया । गृहयुद्ध में विजय हासिल करना कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं थी । इस विजय के बाद क्रांतिकारी उत्साह में उतार दिखाई पड़ा । नए हालात में अर्थतंत्र को पुनर्जीवित करने के लिए छोटे पैमाने पर पूंजीवाद की इजाजत देते हुए नई आर्थिक नीति को लागू किया । इसी बीच प्राकृतिक आपदाओं का पहाड़ टूट पड़ा । अकाल, सूखा और टिड्डियों का हमला हुआ । मजदूर वर्ग तबाह हो गया । सरकार और पार्टी में मुट्ठी भर बोल्शेविक बचे थे । इस हालत में नौकरशाही का पनपना लाजिमी था । आखिरी दिनों में उनके सामने सबसे कठिन दुबिधा प्रकट हुई । वे पार्टी को नौकरशाह बनने से बचाना चाहते थे । इस संघर्ष का सबूत जो लेखन था उसे सोवियत जनता की जानकारी से बहुत दिनों तक दूर रखा गया था ।
2017 में वर्सो से चाइना मेविल की किताब ‘अक्टूबर: द स्टोरी आफ़ द रशियन रेवोल्यूशन’ का प्रकाशन हुआ । मेविल ने किताब के शुरू में बताया है कि प्रथम विश्व युद्ध के ऐन बीच में जब एक रूसी विद्वान की रूस के आधुनिक इतिहास पर लिखी किताब का अंग्रेजी अनुवाद 1917 में अमेरिका में छपा तो उसके अनुवादक की भूमिका का अंतिम वाक्य हालात में क्रांतिकारी बदलाव की भविष्यवाणी कर रहा था । इस किताब के छपते ही एक क्या दो क्रांतिकारी बदलाव रूस में हुए । एक फ़रवरी में तो दूसरा अक्टूबर में । फ़रवरी से अक्टूबर तक क्रांति की यह प्रक्रिया जारी रही । इस क्रांति की निगाह से स्वतंत्रता की राजनीति को देखा जाता रहा है । लेखक ने साफ कर दिया है कि वे किसी भी तरह निष्पक्ष नहीं रह सकते । लेखक ने उस क्रांति की कहानी कहने की कोशिश की है । इस कहानी में रूसी विशेषताओं की मौजूदगी से लेखक ने इनकार नहीं किया है । इसके बावजूद उनका ध्यान क्रांति के वैश्विक परिप्रेक्ष्य पर भी बना रहा है । इस क्रांति पर रूस के साथ पूरी दुनिया का अधिकार है ।   

Saturday, June 24, 2017

सवाल उठाती निगाह

               
                                   
अरुंधति राय का नया उपन्यास चर्चा में है । उनके पहले ही उपन्यास को बुकर सम्मान मिला था । उसके बीस साल बाद यह उपन्यास छपा है । बीच में उनकी प्रतिष्ठा देश दुनिया के तमाम सवालों पर गंभीर हस्तक्षेपकारी लेखन के कारण बनी रही । इसका असर यह था कि विरोध करने के लिए भारत के गृहमंत्री को संसद में उनका मजाक उड़ाना पड़ा । उनकी आलोचना की तल्खी के कारण अदालत ने उन्हें एक दिन की कैद की सजा दी थी । दुनिया की तीस भाषाओं में इस उपन्यास को एक साथ जारी किया गया । इतना तो अंग्रेजी लेखकों के लिए भी काफी था । नए निजाम के आने के बाद बुद्धिजीवियों और अखलाक की हत्या के विरोध में उनकी ओर से पुरस्कार वापसी के क्रम में लेखकों और बौद्धिकों का साथ दिया गया । उपन्यास छपने के ठीक पहले एक झूठे समाचार के आधार पर शासक दल के एक सांसद ने उन्हें फौजी जीप के सामने बांधने की इच्छा जताई थी ।
उपन्यास के प्रकाशन के बाद ऊपर गिनाए गए सभी वजहों से उसे आलोचना अधिक झेलनी पड़ रही है । इस आलोचना की एक और वजह है जो प्रत्यक्ष रूप से उतनी राजनीतिक नहीं है हालांकि पूरी तरह से अराजनीतिक भी नहीं है । आलोचकों का एक तबका इसे उपन्यास नहीं मान रहा है । न मानने का कारण उपन्यास का हमारा बना बनाया आस्वाद है । अगर नया सब कुछ वैसा ही लिखा जाएगा जो हमारी मान्यताओं के लिए स्वीकार्य हो तो नएपन की संभावना ही समाप्त हो जाएगी । यह जिस तरह का उपन्यास है उस तरह के उपन्यास हाल के दिनों में लिखे गए हैं । एक मशहूर उदाहरण तस्लीमा नसरीन का उपन्यासलज्जाहै जिसे ढेर सारे लोगों ने घटनाओं की सारिणी मानकर उपन्यास के खित्ते से बाहर निकालने की पुरजोर कोशिश की । बहुत संभव है कि वर्तमान यथार्थ की शक्ल ही ऐसी हो चली है कि उसकी अभिव्यक्ति के लिए पुराना ढांचा नाकाफी पड़ रहा हो । वैसे भी यह सबसे नई विधा है इसलिए इसमें प्रयोग की गुंजाइश बहुत है । रचनाओं के आधार पर विधाओं के लक्षण तय किए जाते हैं । इसका उलटा करने की कोशिश साहित्य के भीतर ठीक नहीं समझी जाती ।
बहुत सारे लोगों का आरोप है कि इस उपन्यास में सब कुछ की पंचमेल खिचड़ी है । पहले भी हमने कहा कि पहले उपन्यास और इस उपन्यास के बीच के बीस सालों में अरुंधति ने मुख्य तौर पर वैचारिक और राजनीतिक लेखन किया है । इससे साफ है कि उनकी रुचि का क्षेत्र राजनीति है । लेकिन बीच के इस समय की सारी राजनीतिक घटनाओं की मौजूदगी इस उपन्यास में नहीं है । उदाहरण के लिए दिल्ली और बहुत हद तक देश को झकझोर देने वाली घटना निर्भया बलात्कार कांड था । उसका कोई उल्लेख उपन्यास में नहीं है । जंतर मंतर पर धरने पर बैठे लोगों और आंदोलनों की सूची में भी उसके दर्शन नहीं होते । इसी तरह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के सिलसिले में अन्ना और केजरीवाल तो नजर आते हैं लेकिन बाबा रामदेव वाले धरने की हवा भी नहीं है । सिद्ध है कि उपन्यासकार ने अपनी कथा के विकास के लिए सचेतन रूप से कुछ चीजों को जगह दी है तो कुछ चीजों को कहानी के बाहर छोड़ दिया है ।
कहानी के तीन सिरे हैं । एक कहानी दिल्ली में है । दूसरी काश्मीर में और तीसरी बस्तर में । उपन्यास के शुरू में गिद्धों के गायब होने के बारे में एक छोटा सा टुकड़ा है । बाद में बताया गया है कि इस कहानी में अनुपस्थित का प्रतीक गिद्ध हैं । तीसरी कहानी जो बस्तर की है वही शायद गायब गिद्ध है । शेष दोनों कहानियों की भरपूर उपस्थिति पूरे उपन्यास में है । एक उपन्यास में दो कहानियों की सतही तौर पर असमद्ध मौजूदगी के औपन्यासिक शिल्प के बारे में हिंदी पाठकों को चौंकने का कोई कारण नहीं है । उनके एक पुरोधा भी इस शिल्प का नुकसान बहुत दिनों तक झेलते रहे थे । याद दिलाने की जरूरत नहीं कि उन पर समकालीन राजनीति को कथा में व्यक्त करने का भी आरोप लगा था । दोनों ही कहानियों को इस नजरिए से चुना गया है कि दोनों की उपस्थिति सामान्य के बाहर है । दिल्ली वाली कथा में हिंजड़े हैं जो समाज के चरम बहिष्कृत होते हैं । काश्मीर को तो हमारे मानसिक भूगोल में पर्यटन स्थल के रूप में ही जगह मिलती है या अगर समाज के रूप में महसूस भी होता है तो आतंकवाद से अलग कुछ भी नहीं । मानव समाज के रूप में उसकी जीवंत मौजूदगी हमारे जीवन में नहीं होती । इस तरह इन दोनों बहिष्कृतों की निगाह से जब मुख्य धारा के समाज पर पैनी निगाह डाली जाती है तो हमारा मन इसे पहचानने से इनकार कर देता है । ये दोनों कहानियां जिस पात्र के जरिए एक दूसरे से जुड़ी हैं उसका नाम तिलोत्तमा है । उपन्यास में ढेर सारे ऐसे संकेत हैं जो साबित करते हैं कि यह तिलोत्तमा लेखिका का ही प्रतिरूप है । ध्यातव्य है कि उनके पहले उपन्यास में भी ऐसा एक पात्र था । इस पात्र के स्त्री होने से दुनिया के रहस्यों तक उसकी और उसके सहारे उपन्यास की पहुंच सुलभ हो जाती है ।              
बात को काश्मीर से शुरू करने में सुविधा है । वह नित नवीन और पिछले कुछेक सालों से लगातार देश के दिमाग में समस्या के बतौर मौजूद रहा है । समझ में नहीं आता कि उसका कोई समाधान क्यों नहीं निकलता । गुत्थी को सुलझाते हुए अरुंधति बताती हैं कि काश्मीर के लोग आम तौर पर व्यापारी हैं और इसीलिए बार बार उस आंदोलन के अलगाव के जोश पर पानी फिर जाता है । आबादी की इस संरचना के अतिरिक्त अलगाववादी नेताओं को वित्तीय मदद भी इसी तबके से मिलती है इसलिए उनकी भावनाओं की अनदेखी मुश्किल हो जाती है । इसके अतिरिक्त आंदोलन के भीतर अधिकाधिक कट्टर नेतृत्व के दबदबे के चलते मुस्लिम समुदाय के भीतर के विभाजन उभर आते हैं जिनके चलते एकता कमजोर पड़ती है । इस आंदोलन में भी स्थानीय संस्कृति के बहाने स्त्री के प्रति दूरी का सवाल उपन्यास में मजबूती से उठाया गया है । शहीदों के जनाजे में वे नहीं शरीक हो सकतीं और उनकी मजार पर भी दिन में नहीं जा सकतीं । स्त्री की निगाह से आंदोलन की कमजोरियों पर उंगली रखने का यह मतलब नहीं कि वे इसके दमन का समर्थन करती हैं । भारतीय सेना द्वारा काश्मीर के दमन और काश्मीर तथा भारतीय सेना पर उसके प्रभाव के ऐसे भयावह चित्र इससे पहले शायद ही कहीं दर्ज किए गए होंगे ।
दमन का चित्र खींचने के लिए अरुंधति ने सेना के एक अधिकारी का चरित्र खड़ा किया है जिसकी तुलना के लिए मिज़ोरम पर लिखे उपन्यास जहां बांस फूलते हैंका हवा सिंह नामक एक सैनिक अधिकारी याद आता है जिसने मिज़ोरम के एक स्थानीय पादरी का लिंग चीरकर उसमें मिर्च डाल दिया था । अरुंधति के उपन्यास में वह सैनिक अधिकारी अपने अत्याचार की यादों से पीछा छुड़ाने के लिए परिवार सहित अमेरिका बस जाता है लेकिन आखिरकार परेशान होकर सपरिवार आत्मघात कर लेता है । उसकी एक सहायिका पिंकी स्त्री को यातना देने के लिए उसका मुंडन करा देती है । स्थानीय जनता पर चतुर्दिक व्याप्त हिंसा का यह प्रभाव पड़ता है कि लोग राइफ़ल के साथ फ़ैशन में अपनी तस्वीर खिंचवाने के लिए आतंकवादियों से सम्पर्क करते हैं । बंद पड़े सिनेमाघर में टार्चर चैम्बर बना दिया गया है । इतनी चुस्त व्यवस्था में भी छेद पैदा हो जाते हैं । मुंडन करने वाला हज़ाम आतंकवादियों का जासूस है । जीपों के चालक सेना की आवाजाही की खबर पहुंचाते हैं । शिकारों और हाउसबोटों की भीड़भाड़ में आतंकवादी मजे से सेना के साथ लुकाछिपी खेलते रहते हैं ।
दिल्ली की कहानी में हिंजड़ा पात्र अपनी अवस्थिति के कारण ही हमें ऐसी जगहों पर झांकने का मौका देता है जहां पहुंचना सामान्य तौर पर असम्भव है । उसके वर्णन में हिंदी भाषा की असमर्थता प्रत्यक्ष है क्योंकि अंग्रेजी व्याकरण में लिंग उतना प्रभावित नहीं करता जितना हिन्दी में । पैदा वह आफ़ताब के रूप में हुआ लेकिन वह पुरुष के शरीर में फंसी हुई स्त्री था । माता को दो बेटियों के पैदा होने के बाद बेटे की आशा थी इसलिए आफ़ताब के जन्म से प्रसन्न हुईं । जन्म के बाद बच्चे के शरीर में जो खोट नजर आया उसकी कोई मिसाल उनके जीवन में नहीं थी इसलिए वे इसे समझ ही नहीं सकीं । उनकी खामोश मानसिक प्रतिक्रिया का अरुंधति का वर्णन लेखकीय भाषिक रचनात्मकता का चरम है । पहले उपन्यास में इसी तरह का एक वर्णन वेलुथा की पुलिस पिटाई के बाद का है जिसमें पोस्टमार्टम रिपोर्ट के भाषिक ठंडेपन से अत्याचार की क्रूरता और भी उभर आती है । इस उपन्यास में मनोविश्लेषण की दूरी बरतते हुए माता को लगे मानसिक धक्के की परत दर परत खोली गई है । शुरुआती धक्के से उबरते हुए माता ने यह बात किसी को न बताने का फैसला किया । धीरे धीरे आफ़ताब के भीतर की स्त्री ने अपने आपको प्रकट करना शुरू किया । उसकी यह कशमकश उसके शरीर पर अंकित होने के कारण बेहद गहन थी । आखिरकार वह हिंजड़ों के सामूहिक आवास में रहने चला जाता है । एक ही मुहल्ले में रहते हुए भी उसके अपने परिवार से उसकी दूरी बनना शुरू होती है । माता कुछ दिनों तक निभाती है लेकिन पिता ने कभी नहीं पहचाना । उसका बहिष्करण इतना घनघोर है कि संयोग से गुजरात में दंगाइयों के बीच फंस जाने पर वे भी उसकी हत्या करने में हिचक जाते हैं और उस कत्लेआम का साक्षी बनकर उसे जीवित रहना पड़ता है ।
उस सामूहिक आवास में भी बहिष्कृतों की यह दुनिया आम दुनिया की तरह ही सत्ता संघर्ष का सामना करती है जब उसके भीतर की स्त्री एक बच्ची को लाकर उसका पालन पोषण करना शुरू करती है । उस जगह को त्यागकर वह एक कब्रगाह में चली जाती है ।मोनेर मानुषमें जिस तरह लालन एक द्वीप में उजड़े लोगों की बस्ती आबाद करते हैं उसी तरह उस कब्रगाह में तरह तरह के लोग समाज से बाहर होकर आने लगते हैं । इनमें एक अंधे मौलवी हैं । आफ़ताब से हिंजड़ा अंजुम बन चुका है । अंजुम और मौलवी के बीच की एक बार की बातचीत में उनके पहले उपन्यास की एक खूबी फिर से उभर आई है । उस उपन्यास में हमें बच्चों की दुनिया की क्रूरता दिखाई पड़ी थी । उसी तरह इस बातचीत में दोनों एक दूसरे को चोट पहुंचाने के लिए एक दूसरे के नाजुक जगहों पर प्रहार करते हैं । मौलवी अंजुम से पूछते हैं कि क्या हिंदू हिंजड़ों को भी दफ़नाया जाता है तो पलटकर अंजुम उनसे पूछती है कि लोग जब रंगों की बात करते हैं तो आप कैसे समझते हैं ।
इस तरह की उठापटक के बावजूद उस कब्रगाह में विचित्र लोगों की जो दुनिया बसने लगती है उनमें जमाने के तमाम शिकार हैं । इन शिकारों की कहानी के सहारे पाठक के सामने समाज की क्रूरताएं उजागर होती हैं । इनमें एक चमार है जो लाशों की चीरफाड़ के रोजगार के लिए मुसलमान बन जाता है । एक बार वह और उसके पिता जब गाय की खाल उतारने के लिए उसे ले जा रहे थे तो भीड़ ने पिता को सड़क पर सरेआम मार डाला था । तभी उसे पता चला था कि आदमी के शरीर में कितना खून होता है । वह हमेशा धूपी चश्मा पहने रहता है क्योंकि एक बार स्टील की एक कलाकृति की सुरक्षा के लिए उस पर निगाह गड़ाने के कारण परावर्तित धूप से उसकी आंखें बरबाद हो गई थीं । इस कब्रगाह में तिलोत्तमा भी रहने चली आती है । पहले ही हमने जिक्र किया कि लेखिका का प्रतिरूप यही तिलोत्तमा दिल्ली और काश्मीर तथा अनुपस्थित बस्तर की कथा को आपस में जोड़ती है । ऐसा किस तरह होता है इसके लिए उपन्यास को पढ़ना होगा क्योंकि किसी भी रचना को दुबारा प्रस्तुत नहीं किया जा सकता ।             

           

Friday, June 16, 2017

सदी के मोड़ पर एक रूसी अंतर्दृष्टि

        
                                     
रूस के प्रसिद्ध विद्वान बोरिस कागरलित्सकी ने एक पुस्तक श्रृंखला की शुरुआत की- ‘रीकास्टिंग मार्क्सिज्मजिसके तहत तीन किताबों का प्रकाशन हुआ । तीनों किताबें चूंकि एक ही कड़ी में लिखी गईं इसलिए इनमें आपसी संगति अंतर्निहित है । तीनों किताबों का रूसी से अंग्रेजी में अनुवाद रेनफ़्री क्लार्क ने किया है । तीनों का प्रकाशन प्लूटो प्रेस से हुआ है । पहली किताब न्यू रियलिज्म, न्यू बार्बरिज्मका प्रकाशन 1999 में हुआ । किताब का उपशीर्षक सोशलिस्ट थियरी इन द एरा आफ़ ग्लोबलाइजेशनहै । भूमिका में लेखक ने पूंजीवादी व्यवस्था और वाम के संकट से बात शुरू की है । पूंजीवाद का संकट 1998 में एशियाई शेरों और रूस के पतन से प्रकट हुआ तो वाम का संकट इसके एक दशक पहले सोवियत संघ में पेरेस्त्रोइका के रूप में सामने आया था । इसे समाजवाद के नवीकरण के लिए शुरू किया गया था लेकिन इससे पूंजीवाद की पुनर्स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ । वादा तो लोकतांत्रिक रूपांतरण का था लेकिन सामाजिक जीवन की समाप्ति हुई और अर्थतंत्र माफ़िया के कब्जे में चला गया । निजी संपत्ति की विजय हुई लेकिन कानून की ऐसी तैसी हो गई । सोवियत संघ के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय कम्यूनिस्ट आंदोलन भी बिखर गया । इससे खाली हुई राजनीतिक जगह में सामाजिक जनवाद के आ जाने की उम्मीद थी लेकिन वह दक्षिणपंथ के करीब चला गया । वाम का संकट सामाजिक कम, नैतिक और वैचारिक अधिक था । वोटों में गिरावट तो आई थी लेकिन नेताओं और बौद्धिकों की पस्ती के मुकाबले यह गिरावट कम थी । इसीलिए वोट बढ़ने के बावजूद परिस्थिति में कुछ खास बदलाव नहीं आया ।
लेखक का कहना है कि 1968 के क्रांतिकारी आंदोलनों के विचारों और अनुभवों से प्रेरित कार्यकर्ताओं की पीढ़ी 1989 तक समाप्त हो गई । उस आंदोलन के कुछ मूल्यों मसलन नियंत्रण से आजादी को नवउदारवाद ने पचा लिया । साठ के आंदोलन इसी स्वच्छंदतावादी संस्कृति के साथ मार्क्सवाद को जोड़ने की कोशिश से पैदा हुए थे । इस संस्कृति और शैली को तो पूंजीवाद ने अपना लिया और मार्क्सवाद को मृत घोषित कर दिया । आंदोलन के बौद्धिकों ने समर्पण कर दिया और वास्तविक राजनीतिक संघर्षों से अलग होकर सांस्कृतिक विद्रोही मात्र रह गए । उन्होंने अपने सांस्कृतिक संघर्ष को वर्ग संघर्ष से काट लिया और इसके चलते सांस्कृतिक राजनीति अप्रासंगिक या प्रतिक्रांतिकारी हो गई ।
इसी क्रम में लेखक कहते हैं कि कम्यूनिस्ट घोषणापत्र को इस समय पढ़ने से लगता है जैसे वह कुछ हफ़्ते पहले ही लिखा गया हो लेकिन वैचारिक प्ररणा के लिए वाम बुद्धिजीवी उन विचारों के पीछे भाग रहे हैं जिनकी उम्र साल दो साल से अधिक नहीं होती । मार्क्सवाद की प्रासंगिकता पूंजीवाद के संकट से सिद्ध हो रही है । इसे विडंबना ही कहेंगे कि नवउदारवादी पूंजीवाद की सफलता ही मार्क्स-एंगेल्स की पारंपरिक समाजवादी परिकल्पना को आवश्यक और कारगर बना रही है । मुक्त बाजार पूंजीवाद और वैश्वीकरण के दौर में मार्क्सवाद नहीं बल्कि उसके संशोधित संस्करण गायब हो रहे हैं । लेखक ने कुछ बातों को याद दिलाया है । पूंजीवादी व्यवस्था गरीबी और संकट पैदा करती है । विषमता पैदा करने वाली यही व्यवस्था वर्ग संघर्ष और क्रांतिकारी समाजवादी आंदोलनों को भी जन्म देती है । अगर पुराना आंदोलन चुक गया है तो नया जन्म लेगा ।    
इसी पुस्तक श्रृंखला की दूसरी किताब 2000 में द ट्विलाइट आफ़ ग्लोबलाइजेशनशीर्षक से छपी । इसका उपशीर्षक प्रापर्टी, स्टेट ऐंड कैपिटलिज्मथा । इसमें लेखक ने बताया है कि युद्धोत्तर यूरोप में सोवियत संघ को ऐसी शासन प्रणाली के बतौर प्रचारित किया गया जिसमें निजी पसंद और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की कोई गुंजाइश नहीं थी । एक निर्वैयक्तिक नौकरशाही के जरिए शासन चलाया जाता था जिसके समक्ष आम लोग खुद को कुंठित और शक्तिहीन महसूस करते थे । यह हालत केवल रूस में नहीं थी, बल्कि सक्षम शासन उस दौर में सबकी इच्छा थी । उसके बाद से स्थिति में बदलाव आया है । नवउदारवाद के साथ राज्य कमजोर पड़ा है और नौकरशाही से उसकी शक्तियां छीनी जा रही हैं लेकिन आम लोग अब भी खुद को आजाद और सुरक्षित नहीं समझते तथा कुंठा और भय की भावना मौजूद है । राज्य के कमजोर होने से बहुराष्ट्रीय कंपनियों और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की ताकत बढ़ी है । ये कंपनियां विकास के कामों की देखरेख का दावा करती हैं लेकिन उनकी जवाबदेही किसी के प्रति नहीं है । चूंकि राज्य ने व्यापार और व्यवसाय को नियंत्रित करना छोड़ दिया है इसलिए जनता के जीवन और सरकारों पर इन कंपनियों का अबाध नियंत्रण हो गया है ।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित वैश्विक संस्थाओं की जिम्मेदारी अंतर्राष्ट्रीय बाजार को नियंत्रित करने की थी लेकिन नवउदारवाद ने इन्हें विनियमितीकरण के हथियार में बदल दिया है । अब तो ये संस्थाएं अपना एजेन्डा खुद तय करती हैं तथा उसे जनता और सरकारों पर थोप देती हैं । सार्वजनिक योजना निर्माण के काम का निजीकरण हो गया है । ये संस्थान इस तरह काम करते हैं जैसे समूची दुनिया पर इनका कब्जा हो । इनके विशेषज्ञ तय करते हैं कि रूस के कोयला उद्योग का क्या किया जाए, कोरिया में कंपनियों को कैसे संगठित करें या मेक्सिको की वित्त व्यवस्था कैसे दुरुस्त होगी । समस्या जितनी विकट होगी उतना ही आसान और आदिम उसका समाधान प्रस्तुत किया जाएगा । ये संस्थाएं अफ़्रीका से लेकर रूस तक प्रत्येक समस्या के हल का एक ही नुस्खा सुझाती हैं । अपनी ही विचारधारा का शिकार ये संथाएं अपनी विराट नौकरशाहाना मशीन से संचालित होती हैं । मुक्त बाजार के नाम पर समूची दुनिया में अभूतपूर्व केंद्रीकरण थोप दिया गया है । पश्चिमी देशों की सरकारें भी इस समानांतर प्राधिकार से परेशान हैं । यह पूरा ढांचा मूल रूप से अलोकतांत्रिक है । पुराने जमाने की निरंकुश बादशाहतों की तरह वैश्विक प्रशासन का यह नया निजाम भी शासितों की सहमति पर आधारित नहीं है । इसीलिए साधारण जनता को लाभ पहुंचाने का आधुनिक सरकारों का काम करना इनके स्वभाव में नहीं है ।
संपदा और संसाधनों का अभूतपूर्व संकेंद्रण हो गया है । अतीत के किसी भी तानाशाह के हाथों में उतनी नहीं रही होगी जितनी ताकत इस समय अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के निदेशक या माइक्रोसाफ़्ट जैसी किसी बड़ी कंपनी के मालिक के हाथ में है । इस अति-केंद्रित व्यवस्था के कारण ढेर सारी समस्याएं भी पैदा हो रही हैं । यह नहीं कि नवउदारवादी पूंजीवाद अधिकांश मानवता को दरिद्रता में धकेले हुए है या परिधि पर स्थित देशों में बर्बरता का बोलबाला है । ऐसे नैतिक सवालों से गंभीर लोग परेशान नहीं होते । संकट यह है कि इस व्यवस्था में गलतियों के नुकसान बहुत अधिक हैं । असल में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के पास इतने ज्यादा संसाधन हैं कि अपने गलत साबित हो चुके फैसलों के नतीजों के नुकसानदेह अंजाम देखते हुए भी वे उन्हीं नीतियों को लम्बे समय तक जारी रख सकते हैं । 
मुक्त बाजार के समाजवादी आलोचक कहते थे कि इस व्यवस्था में बरबादी बहुत होती है । योजनाबद्ध अर्थतंत्र के नवउदारवादी आलोचक भी कहते थे कि केंद्रीकृत प्रणालियों में बहुत बरबादी होती है । 1990 दशक के बाद विकसित पूंजीवाद मुक्त बाजार आधारित होने के साथ ही अति केंद्रीकृत भी है इसलिए इसमें पैदा होने वाले संकटों में अभूतपूर्व बरबादी हो रही है । बरबादी के उदाहरण के बतौर लेखक ने उस विश्व संकट का जिक्र किया है जिसकी शुरुआत 1997 में एशियाई मुल्कों से हुई थी । वैश्विक पूंजीवाद अतिसंचय और अतिक्षमता से रोगग्रस्त है । अति उत्पादन के साथ ही मजदूरों के वेतन में कमी आ रही है, गरीब देशों में भुखमरी है तो अमीर देशों में जीवन स्तर में गिरावट आ रही है । मानव और भौतिक संसाधनों के साथ ही वित्तीय संसाधनों की भी बरबादी हो रही है ।
वैश्वीकरण के साथ ही सूचना युग का भी प्रसार हुआ था । सभी बीमारियों के लिए अचूक नुस्खे के रूप में तकनीकी बदलाव पर जोर दिया गया । इस बदलाव ने व्यवस्था के अंतर्विरोधों को और मजबूत बना दिया । बहुत सारे विद्वान इस नई स्थिति को विकेंद्रित उत्पादन के साथ नियंत्रण का केंद्रीकरण कह रहे हैं । तकनीक आधारित संजाल बन तो रहे हैं लेकिन प्रभुतासंपन्न संरचनाएं और स्वार्थ इनका इस्तेमाल अपने मकसद के लिए करना चाहते हैं । इससे नए तरह के अंतर्विरोध पैदा हो रहे हैं । संजाल के लिए ऊंच-नीच की व्यवस्था का समाप्त होना जरूरी नहीं होता, उसके लिए दूसरे तरह के पदानुक्रम की जरूरत होती है और इससे नए स्वार्थों का जन्म होता है । संजाल की मौजूदगी पर बहुत अधिक जोर देने वाले लोगों का कहना है कि इस समय पूंजीपति मानव तो हैं लेकिन समकालीन पूंजीवाद का कोई ठोस चेहरा नहीं है । वित्त प्रवाह इलेक्ट्रानिक संजालों के जरिए हो रहा है । लेखक को चेहरा विहीन इस पूंजीवादी संजाल का वर्णन बहुत कुछ नौकरशाही के वर्णन जैसा महसूस हो रहा है । उनका कहना है कि आज की दुनिया में कोई लोग तो हैं जो फैसले करते हैं और ये फैसले खास हितों तथा विचारों से साफ साफ प्रभावित दिखाई पड़ते हैं । कुछ वास्तविक संस्थाएं और संरचनाएं हैं जहां ये हित सुदृढ़ होते हैं और तब फैसले लिए जाते हैं ।
लेखक का कहना है कि विश्व पूंजीपति वर्ग आज जितना सुदृढ़ है उतना कभी पहले नहीं था लेकिन चूंकि यह सुदृढ़ीकरण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर है इसीलिए जिस समाज में वह वैश्विक कुलीन वर्ग रहता है उसमें हर कहीं वह हाशिए पर गया है । इसके कारण उसे लगातार एक तरह के तनाव में रहना पड़ता है । निचले वर्ग का दमन करने के लिए शासक वर्ग को उस समाज और देश का होना उचित होता है । जब कुलीन वैश्विक हो जाते हैं और समाज स्थानीय या राष्ट्रीय ही रहता है तो देश के बाशिन्दों पर अपना एजेन्डा थोपना इस कुलीन वर्ग के लिए  अधिकाधिक कठिन होता जाता है । वैश्वीकरण का प्रतिरोध प्रत्येक देश में बढ़ रहा है । ऐसी स्थिति में नवउदारवादी शासक वर्ग के लिए राज्य फिर से जरूरी महसूस होता है लेकिन केवल उत्पीड़न के औजार के रूप में । राज्य का जबसे जन्म हुआ है तबसे ही वह दमन उत्पीड़न का औजार रहा है लेकिन इसे वह राष्ट्रीय हित के नाम पर वैध ठहराता रहा है । अब इसमें कठिनाई आ रही है । अब राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध राज्य को दमन करना पड़ रहा है । दमन के साथ ही प्रतिरोध भी नए स्तर पर जा पहुंचा है ।
ऐसी स्थिति में नवउदारवादी एजेन्डा का विरोध करने वाले वाम को देशभक्त होना पड़ेगा । उसे वैश्विक कुलीन वर्ग का विरोध करने के लिए उसकी सेवा में लगे हुए राज्य का विरोध करना होगा । इससे नए अवसर तो पैदा हो रहे हैं लेकिन नई वैचारिक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है । किन्हीं देशों में राष्ट्रवाद की प्रगतिशील धारा रही है लेकिन ढेर सारी जगहों पर इस पर दक्षिणपंथी वैचारिकी का कब्जा रहा है । वामपंथ को नागरिकता, मानवाधिकार तथा लोकतांत्रिक और विकेंद्रित राज्य के स्वप्न पर आधारित राष्ट्रवाद को अपनाना होगा । वैश्विक पूंजीवाद का संकट नई समाजवादी परियोजना की शुरुआत भी हो सकता है । हमें विश्व पूंजीवाद के सर्वसत्तावाद के विरोध में अपने को लोकतांत्रिक विकल्प के रूप में पेश करना होगा । 
श्रृंखला की तीसरी और आखिरी किताब द रिटर्न आफ़ रैडिकलिज्मका प्रकाशन भी 2000 में ही हुआ । इसका उपशीर्षक रीशेपिंग द लेफ़्ट इंस्टीच्यूशंसहै । लेखक ने बताया है कि तीन किताबों की पुस्तक श्रृंखला की इस आखिरी किताब में सैद्धांतिक बातें सबसे कम हैं । सबसे पहले वे दावा करते हैं कि बीसवीं सदी बिना शक पूंजीवाद और साम्यवादी व्यवस्था के बीच संघर्ष की सदी थी । पूंजीवाद इस संघर्ष में विजयी तो हुआ लेकिन अंतिम सालों के आते आते यह विजय संदिग्ध हो चली है । उलटे सोवियत संघ की हार और उसके हाशिया स्थित अर्ध-औपनिवेशिक देश में बदलने तथा मजदूरों के साथ पूंजी द्वारा बदले की कार्यवाही ने पूंजीवादी व्यवस्था के सारे अंतर्विरोधों को उजागर कर दिया । नई सदी में पूंजीवाद का प्रवेश अच्छी हालत में नहीं हो रहा है । पूंजीवाद के इस गहरे संकट से भी अधिक गहरा संकट वाम आंदोलन का है । इस संकट के लक्षण पस्तहिम्मती, गद्दारी, राजनीतिक नेताओं और मजदूर वर्ग के बीच दूरी, नए विचारों का अभाव और पुराने संगठनों की नौकरशाही हैं । सोवियत संघ के पतन से सामाजिक जनवादी पार्टियों के उत्थान की आशा थी लेकिन 1990 के दशक में वे भी लम्बे दिनों तक संकट में रहीं । दशक का अंत आते आते कुछ चुनावी लाभ तो हुए लेकिन राजनीतिक स्वास्थ्य दुरुस्त नहीं हुआ । जिन देशों में चुनावी लाभ हुए वहां भी समाजार्थिक नीतियों के मामले में कोई अंतर नहीं आया । फलत: जनता ने जल्दी ही इन पार्टियों से सत्ता छीन ली ।
पूंजीवादी व्यवस्था के गहराते संकट की पृष्ठभूमि में वामपंथ की नपुंसकता और गैर जिम्मेदारी और भी प्रत्यक्ष हो जाती है । नब्बे दशक के अंत में यूरोप के लगभग सभी प्रमुख देशों में वाम या मध्यवाम की पार्टियों का शासन था । ब्रिटेन और इटली में इन सरकारों ने तत्काल दक्षिणपंथी नीतियों को खुलेआम लागू करना शुरू किया । फ़्रांस और रूस में दक्षिणपंथ के साथ समझौते का रास्ता अपनाया गया । असल समस्या इन मध्यवाम ताकतों की नहीं थी । समस्या क्रांतिकारी ताकतों की थी जो इन मध्यवामियों पर  दबाव बनाने में अक्षम रहे । प्रत्येक वाम शासन को देशी पूंजीपति वर्ग, अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं और भ्रष्ट नौकरशाहों के दक्षिणपंथी संश्रय का भारी दबाव झेलना पड़ रहा है । इन पर वाम दबाव कभी नहीं पड़ता । अगर जन आंदोलन का थोड़ा दबाव बनता भी है तो वाम पार्टियां इन आंदोलनों को रणनीतिक परिप्रेक्ष्य नहीं दे पातीं या उन आंदोलनों की राजनीतिक अभिव्यक्ति नहीं बन पाती हैं ।
नब्बे दशक के पूर्वार्ध में ढेर सारे लोगों को पुराने वाम के मुकाबले ग्रीन पार्टियों के उभार में आशा की किरण नजर आई थी । कई जगहों पर वाम पार्टियों ने इसमें लाल रंगत पैदा करने के लिए पर्यावरण से जुड़े सवाल उठाए । कुछ को इनमें वाम आंदोलन के लिए जरूरी रूपांतरण भी नजर आया । इन पार्टियों के कार्यक्रम में पूंजीवाद का सुसंगत विरोध न होने के बावजूद वैकल्पिक राह नजर आई । व्यावहारिक स्तर पर बदलाव बहुत सीमित रहा और इनके नेता राजनीतिक भ्रष्टाचार से नहीं बच सके । फलत: धीरे धीरे इन पार्टियों की क्रांतिकारी पहचान समाप्त हो गई । इसके साथ ही बुद्धिजीवी लोग भी हालात की आलोचना करने की जगह उसके साथ सामंजस्य बिठाने लगे । इन्होंने फिर नवउदारवादी प्रचारतंत्र द्वारा प्रसारित तथाकथित नए जमाने के बुनियादी तकनीकी और सामाजिक रूपांतरणों का नगाड़ा पीटना शुरू किया । लेखक का कहना है कि वाम आंदोलन के संकट के आम तौर पर तीन कारण गिनाए जाते हैं- साम्यवादी खेमे का बिखरना, वैश्वीकरण और तकनीकी क्रांति । सही है कि इन बदलावों ने वाम का पुरानी शक्ल में बने रहना मुश्किल कर दिया है लेकिन नए हालात ने पूंजीवाद विरोधी विकल्प की जरूरत कम नहीं की, बढ़ा दी है ।
तकनीकी क्रांति ने पुरानी समाजार्थिक व्यवस्था को नष्ट नहीं किया है । पुरानी समाजार्थिक व्यवस्था के ऊपर से नए समाजार्थिक ढांचों को थोप दिया गया है । किसानों के लोप की तमाम अटकलों के बावजूद किसान मौजूद हैं । जनसंख्या विस्फोट के साथ उनकी तादाद भी बढ़ रही है । वर्ग के बतौर औद्योगिक मजदूरों के भी लुप्त होने की बात थी लेकिन वैश्विक स्तर पर कुल मिलाकर उनकी संख्या में इजाफा हो रहा है । गैर जरूरी लोग हाशियों पर तमाम आदिम और अकुशल कामों के सहारे जिन्दा रहने की कोशिश कर रहे हैं । करोड़ो की संख्या में ये लोग कंप्यूटर और कारखानों की दुनिया से पूरी तरह असंबद्ध माहौल में रह रहे हैं और अब अपनी पुरानी दुनिया में लौटने के काबिल नहीं रह गए हैं । ये अनौपचारिक कामगारों की फौज के सदस्य हैं और इनका श्रम लगभग मुफ़्त है । तमाम मोटर चालित वाहन सड़क पर से रिक्शे को बेदखल नहीं कर सके हैं । कंप्यूटर की दुनिया वाले लोगों को लगता है कि थोड़े ही समय में तकनीक सभी सामाजिक समस्याओं को समाप्त कर देगी । संसदों में बैठे हुए और सभाओं में भाषण देने वाले वामपंथी नेतागण इन दोनों किस्म के लोगों से दूर हो गए हैं । आम नेता इस दुनिया को उसी तरह देख और समझ नहीं पाते जिस तरह पहले शहरी लोग बर्बर आबादी को देख समझ नहीं पाते थे ।
वर्तमान दौर की तुलना औद्योगिक क्रांति से करते हुए लेखक ने बताया है कि उस समय का विकास पिरामिड की शक्ल में हुआ था । उसकी शुरुआत चौड़े आधार से हुई थी जिसमें लगभग समूची आबादी शरीक थी । इसमें शामिल होने के लिए किसी को अपनी जीवन शैली में आमूचूल बदलाव नहीं करना पड़ा था । प्रत्येक ऊपरी सतह निचली के मुकाबले संकीर्ण थी लेकिन उसी पर आधारित थी । ऊपरी सतह पर चलने वाली प्रक्रिया का प्रभाव निचली सतह पर पड़ता था । कभी कभी इस प्रभाव के चलते उन्हें अनचाहे भी अपने आपको ऊपर उठाना पड़ता था । तकनीकी आधुनिकीकरण को पचाने में एकाधिक पीढ़ी का समय लगता था । किसान को मजदूर बनना पड़ा । उसके वंशजों ने शिक्षा हासिल की और मध्य वर्ग में शामिल हो गए । सामाजिक प्रगति की पूर्वशर्त आर्थिक प्रगति थी और अनुभव से इसकी पुष्टि भी होती थी । इसी ऐतिहासिक अनुभव पर सामाजिक जनवाद का विकासपरक आशावाद टिका हुआ था । बीसवीं सदी के उत्तरार्ध तक औद्योगिक क्रांति का असर खत्म हो गया ।
इसके बाद के तकनीकी क्रांति के वर्तमान दौर की खूबी यह है कि विकास की गति में त्वरण आ गया है । मनुष्यों को कंप्यूटरों की तरह लगातार नवीकृत होना पड़ रहा है । लेकिन इसका प्रभाव बहुत कम लोगों तक सीमित है । इसमें प्रसार के मुकाबले उठान अधिक है । तकनीक के विकास की रफ़्तार से प्रभावित होकर दावा किया जा रहा है कि थोड़े ही दिनों बाद जन्नत जैसी जिंदगी सबको मिल जाएगी । असल में किसी भी नई तकनीक के आरम्भिक दिनों में उसके विकास की रफ़्तार तेज होती है । बाद में उस रफ़्तार को बरकरार रखने में मुश्किल पेश आती है । समाज पर थोपी गई बदलाव की रफ़्तार से उसे थकान होने लगती है । विकास सहायता नहीं प्रतीत होता बल्कि आक्रामक दबाव महसूस होने लगता है । लगातार कुछ तोड़ फोड़ चलते रहने का नयापन सुखद ही नहीं होता । इतनी तेज रफ़्तार के कारण भारी बेरोजगारी फैल रही है । सफलता, गतिशीलता और क्षमता केवल ऊंचे तबके के लोगों को सुलभ रह गए हैं । ये तबके निचले तबकों के बारे में आपराधिक रूप से उदासीन हैं लेकिन यह रुख आत्मघाती है क्योंकि आधार की चौड़ाई के बिना ऊंचाई को बनाए रखना असम्भव है । राजनीतिक क्रांति की तरह ही तकनीकी क्रांति को भी सांस लेने के लिए रुकना पड़ता है । सरपट दौड़ते हुए आसमान की ओर निगाह लगाए रखने में खतरा है ।
वैश्वीकरण और तकनीकि क्रांति के दौर में पूंजीवाद विध्वंसक ताकत हो चला है । उन स्वाभाविक सामाजिक बंधनों और रिश्तों को तोड़ा जा रहा है जो पूंजीवाद की भी स्थिरता के लिए परमावश्यक रहे हैं । इसके विपरीत वाम को एकताकारी ताकत बनना होगा, बिखराव के तर्क के विरोध में सामूहिकता और एकजुटता का तर्क पेश करना होगा । जहां तक तकनीकी उपलब्धियों की बात है तो जिन पूंजीवादी संरचनाओं के भीतर तकनीक का विकास हो रहा है उन संरचनाओं के समक्ष नई चुनौती वामपंथ को पेश करनी होगी । पुनर्वितरण का सवाल इस समय समाज के लिए जीवन मरण का सवाल बन गया है । तकनीक, संसाधन, संपत्ति और ज्ञान- सब कुछ का पुनर्वितरण आवश्यक है । विकास के प्रसार और व्याप्ति लानी होगी । कुशल कामगारों की फौज तैयार करने के लिए बड़े पैमाने पर शिक्षकों की जरूरत है । साठ के दशक मे शिक्षा सामाजिक गतिशीलता का सबसे बेहतर साधन था । राजनीति की वरीयता सूची में अर्थतंत्र के ऊपर शिक्षा को होना चाहिए । शिक्षा में निवेश के लिए संपदा के भारी पुनर्वितरण की जरूरत पड़ेगी ।
मौजूदा कायदे कानून को चुनौती देने की वामपंथ की तैयारी में ही उसके पुनरुत्थान की गुंजाइश निहित है । ये नियम इसीलिए अभेद्य प्रतीत हो रहे हैं क्योंकि उन पर कोई सवाल नहीं उठा रहा है । पूंजीवाद के तर्क पर सवाल न उठाने से ही वह स्वाभाविक महसूस होता है । पूंजीवाद का संकट तीखा होता जा रहा है । वित्त का प्रवाह अराजक स्थिति में पहुंच गया है । सट्टा बाजार के खिलाड़ी खुद ही भ्रमित हैं और खेल के जटिल नियमों को समझ नहीं पा रहे हैं । आभासी अर्थतंत्र वास्तविक अर्थतंत्र को खा गया है लेकिन उसके बिना जिन्दा भी नहीं रह पा रहा है । अर्थतंत्र और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में आपात उपाय करने की अपेक्षा राज्य से है लेकिन उसकी संपदा, प्राधिकार और प्रभुसत्ता को खोखला भी किया जा रहा है । लोग अगर अपनी पसंद जाहिर करना छोड़ दें तो उन्हें लोकतंत्र प्रदान किया जा सकता है । ऐसी स्थिति में अगर वामपंथ व्यवस्था के तर्क को मंजूर कर लेता है तो उसके होने का कोई औचित्य नहीं बचेगा ।
सारी समस्याओं की जड़ पूंजीवाद की ऐतिहासिक सीमाओं में है । समाज के मूलगामी रूपांतरण के बिना इन समस्याओं को हल नहीं किया जा सकता । उन्नीसवीं सदी में लोग अबाध सामाजिक प्रगति में यकीन करते थे । बीसवीं सदी की आफतों ने इस यकीन को हिला दिया । लेकिन तकनीकी प्रगति तो आर्थिक संकटों, युद्धों या क्रांतियों के बावजूद बेरोकटोक जारी है । संचित ज्ञान ने संभव बना दिया है कि लुप्त चीजों को पनर्स्थापित करके जीवन चलता रहे । शायद हम भूल गए हैं कि सामाजिक प्रगति ने सामाजिक-राजनीतिक अंतर्विरोधों की राशि जुटा दी है ।
वामपंथी नेता अपना कर्तव्य भूल चुके हैं । लेकिन इस व्यवस्था के नरक को रात दिन भोगने वाले लाखों लोग उसकी ओर खिंचे चले आ रहे हैं । उन्हें विकल्प की जरूरत है । वे लड़ने और जीतने के लिए तैयार हैं । मौजूदा वाम से कोई उम्मीद नहीं है । लेकिन कुछ नई चीजें घटित हो रही हैं । जो पार्टियां दक्षिण की ओर झुक गई थीं उनके भीतर मजबूत वाम विपक्ष निर्मित हो रहा है । इस वाम विपक्ष की सफलता निश्चित नहीं है लेकिन जनता के दबाव के समक्ष नेतागण नंगे हो रहे हैं । इससे वाम के क्रांतिकारीकरण का राजनीतिक माहौल पैदा हो रहा है । ढेर सारी समाजवादी पार्टियों ने समाजवाद को त्याग दिया है लेकिन कुछ में वैचारिक ऊष्मा बची हुई है । अब वाम की सफलता सिद्धांतों के अनुरूप काम करने और व्यवस्था जनित लोभों को खारिज करने पर निर्भर है ।

आज पूंजीवाद मजबूत है लेकिन इतिहास में कई बार कमजोर ने मजबूत को शिकस्त दी है । माना कि हमारी हार हुई है और हमसे गलती हुई है । हो सकता है आगे भी हार और गलती हो । राजनीति में कोई भी निर्भूल नहीं होता लेकिन आंदोलन का क्रांतिकारीकरण ऐसी गति को जन्म देता है कि हम अपनी सीमाओं को पार कर जाते हैं । कभी कभी बौद्धिक और राजनीतिक साहस जरूरी हो जाता है । वामपंथी लोग इतने दिनों से हार रहे हैं कि उनको इसकी आदत पड़ गई है लेकिन लेखक का आग्रह है कि बुरी आदतों को जितनी जल्दी हो सके छोड़ देना ठीक होता है ।

Wednesday, June 7, 2017

एंगेल्स की शाहकार किताब

            
                                
2010 में त्रिस्तम हन्ट की नई भूमिका के साथ एंगेल्स की महान किताब द ओरिजिन आफ़ द फ़ेमिली, प्राइवेट प्रापर्टी एंड द स्टेटका प्रकाशन फिर से पेंग्विन बुक्स से हुआ । भूमिका इतनी महत्व की है कि उसका स्वतंत्र परिचय भी मूल पुस्तक के परिचय से कम जरूरी नहीं है । किताब के लिखे जाने की कहानी यह है कि 1883 में मार्क्स के देहांत के बाद उनके कागजों को एंगेल्स ने जब उलटना शुरू किया तो उनमें एक ऐसा दस्तावेज मिला जिसने एंगेल्स का ध्यान तुरंत खींचा । 1877 में प्रकाशित अमेरिकी मानवशास्त्री हेनरी मार्गन की किताबएनशिएन्ट सोसाइटी: रिसर्चेज इन द लाइन्स आफ़ ह्यूमन प्रोग्रेस फ़्राम सेवेजरी थ्रू बार्बरिज्म टु सिविलाइजेशनसे ढेर सारे उद्धरण और उन पर टिप्पणियां दर्ज थीं । इन्हें पढ़कर एंगेल्स ने उत्तेजना में काउत्सकी को पत्र लिखा कि जैसे डार्विन का क्रांतिकारी महत्व जीव विज्ञान के लिए है उसी तरह मार्गन की इस किताब का महत्व आदिम समाज के सिलसिले में होगा । मार्क्स की इन्हीं टिप्पणियों से प्रेरित होकर एंगेल्स ने अपनी किताब लिखी ।
इस किताब में एंगेल्स की खूबियों के दर्शन होते हैं । बीसवीं सदी में जिन देशों में मार्क्सवादियों के शासन स्थापित हुए उनमें स्त्रियों के संबंध में बने कानूनों पर इस किताब का प्रत्यक्ष प्रभाव सर्वविदित है । यहां तक कि पश्चिमी देशों के समाजवादी नारीवाद के पीछे भी इस किताब का स्पष्ट प्रभाव है । इसमें लैंगिक विषमता पर जोरदार हमला किया गया है, परिवार संस्था की ऐतिहासिक आलोचना की गई है और उत्तर-समाजवादी देशों में इस किताब की मान्यताओं की विरासत बनी हुई है । इन सबके चलते यह किताब आधुनिक सामाजिक संबंधों को समझने के लिए बुनियादी दृष्टि प्रदान करती है ।
मार्गन अमेरिकावासी विकासवादी मानवशास्त्री थे और वे मानव समाज के प्रगतिशील विकास की धारणा में यकीन करते थे । मार्गन के अनुसार बर्बरता से सभ्यता की ओर सामाजिक विकास का प्रत्येक चरण भरण पोषण के बढ़ते हुए स्रोतों का परिणाम था जो परिवार के बदलते हुए रूपों में प्रतिबिम्बित होता है । मार्गन भी डार्विन की जैव विकासवादी सैद्धांतिकी से प्रभावित हैं और मानते हैं कि बर्बरता से पहले के मनुष्य वानराभ प्राणी जैसे ही थे और आग, तीर-धनुष तथा पत्थर की कुल्हाड़ी के सहारे लम्बे समय में विकसित होते रहे । सभ्यता में प्रवेश से पहले मनुष्य खेती-बारी, पशुचारण और लौह अयस्क गलाने का काम सीख चुका था ।
मार्गन का कहना था कि इनमें से प्रत्येक युग की अलग पारिवारिक संरचना थी । परिवार का ढांचा स्थिर नहीं समाज के विकास के साथ ही विकासमान रहा है । उनका मानना था कि शुरू में अर्थात बर्बर अवस्था में सामूहिक विवाह व्यवस्था का चलन था और यौन स्वतंत्रता अबाध थी । इसी अवस्था में युग्म विवाह की शुरुआत हुई और उसी के साथ गोत्र आधारित समाज का विकास हुआ । विवाहित युग्म सामुदायिक वंशगत आवासों में रहते थे । इसी के बाद पितृसत्तात्मक परिवार का विकास हुआ जिसमें मुखिया पुरुष होता था और उस परिवार में एकाधिक पीढ़ियों का एक साथ रहना होता था । मुखिया का पत्नियों, बच्चों, गुलामों और नौकरों पर अधिकार होता था । बर्बरता के अंतिम चरण में एक-पत्नी-व्रती परिवार का उदय हुआ । इसमें पुरुष का परिवार पर पूरा स्वामित्व स्थापित हुआ । विभिन्न समाज इसी रास्ते पर भिन्न भिन्न गति से आगे बढ़े ।
इस समूचे शोध के दौरान मार्गन को अचम्भा इस बात पर हुआ कि कई बार भाषा परिवार के मौजूदा रूप के मेल में नहीं होती थी । उनके अपने समय में एक-पत्नी-व्रती परिवार की बहुलता के बावजूद भाषा में विचित्र यौन संबंधों के अवशेष मौजूद थे । लगता था जैसे भाषा में अतीत के पारिवारिक रूपों के कंकाल बचे रह गए । मार्गन को जो चीज भाषा में मिली उसी के सहारे एंगेल्स ने पुराने पारिवारिक स्वरूपों को तलाशने की कोशिश शुरू की । परिवार के इस पुराने रूप को बदली समार्थिक ताकतों के चलते बदलना पड़ा था । मार्गन की खोज ने उत्पादन के साधनों के स्वामित्व में बदलाव के साथ परिवार के रूप में बदलाव की बात साबित कर दी । मनुष्य के प्राकृतिक अस्तित्व की प्रथम अवस्था में कबीला, जमीन पर उसका सामुदायिक स्वामित्व और इसी तरह की पारिवारिक संरचना थी । मार्गन की किताब मार्क्स और एंगेल्स के लिए कच्चा माल बन गई क्योंकि आदिम इतिहास में उनकी घनघोर रुचि थी ।
एंगेल्स की विशेष रुचि का एक कारण स्त्री समस्या के बारे में प्रकाशित अगस्त बेबेल की किताब थी जिसमें बेबेल ने कहा था कि इतिहास के आरम्भ से ही स्त्रियों और मजदूरों का दमन उत्पीड़न आम बात रहा है । बेबेल के अनुसार परिवार के विकास से पहले से ही स्त्री कबीले की संपत्ति मानी जाती थी और उसे इनकार करने का अधिकार नहीं होता था । यही बात कार्ल काउत्सकी ने भी आदिम यौन संबंधों पर लिखी एक लेखमाला में दोहराई । इससे एंगेल्स को भू-स्वामित्व के आरम्भिक तरीकों और विवाह पद्धतियों के बीच संबंध महसूस हुआ । अगस्त बेबेल और काउत्सकी के विपरीत एंगेल्स का कहना था कि आदिम मानव समाज में पितृसत्ता नहीं थी बल्कि सामुदायिक यौन संबंधों की व्यवस्था रही होगी । आदिम समाज में स्त्री का उत्पीड़न उन्हें आधुनिक विकार का प्रक्षेपण महसूस हुआ । आधुनिक समाज में आकर यौन स्वच्छंदता पुरुष का विशेषाधिकार बना, अतीत में यह सुविधा पुरुष के साथ स्त्री को भी प्राप्त थी । मार्गन की किताब के बारे में मार्क्स की टिप्पणियों से एंगेल्स को अपनी मान्यता की पुष्टि मिलती लगी और इसके आधार पर उन्होंने अगस्त बेबेल और काउत्सकी की अनैतिहासिक मान्यता के विरोध में लिखने का निश्चय किया क्योंकि मार्गन की किताब पढ़ने का मौका सबको नहीं भी मिल सकता था ।
एंगेल्स ने काउत्सकी को पत्र लिखकर सूचित किया था कि मार्गन की खोज से इतिहास के भौतिकवादी नजरिए की पुष्टि होती है । अतीत को समझने का यह नजरिया मार्क्स और एंगेल्स ने शुरू में ही विकसित कर लिया था जिसमें धर्म, वर्ग, राजनीतिक प्रणाली आदि सामाजिक संरचनाओं को आर्थिक और तकनीकी ताकतों का उत्पाद माना गया था । इसमें सबसे महत्वपूर्ण तत्व संपत्ति संबंध थे । इसके आधार पर सबसे अधिक रूपायित होने वाला तत्व राज्य था । संपत्ति संबंधों के अनुरूप राजनीतिक व्यवस्था का रूपांतरण होता चलता है । इस रूपांतरण का संचालक वर्ग संघर्ष होता है । यह तो मार्क्स एंगेल्स की सामान्य ऐतिहासिक भौतिकवादी दृष्टि थी । मार्गन की खोज से परिवार भी अधिरचना के विभिन्न पहलुओं में शामिल हो गया जो उत्पादन में होने वाले बदलावों के अनुरूप बदलता दिखाई पड़ने लगा । एंगेल्स ने अपनी किताब के पहले संस्करण की भूमिका में इस बात पर खासा जोर दिया ।
मार्गन की यही बात एंगेल्स ने ग्रहण की कि परिवार भी धर्म, राजनीति और संस्कृति की तरह उत्पादन पद्धतियों से उपजा है । अत्यंत आदिम अवस्था के बाद जैसे जैसे श्रम की उत्पादकता बढ़ती गई उसी तरह विनिमय, निजी संपत्ति, तकनीक और विषमता में भी बढ़ोत्तरी हुई । इसके साथ ही पहले से मौजूद सामाजिक संरचनाओं पर दबाव तेज होने लगा । उत्पादन पद्धतियों में बदलाव के साथ ही बदलते परिवार का स्वरूप आज निजी संपत्ति की प्रभुता के अनुरूप एक-पत्नी-व्रती आधुनिक परिवार में प्रकट हुआ है । इसका विकास आदिम, प्राकृतिक सामुदायिक संपत्ति पर निजी संपत्ति की विजय के समानांतर हुआ है । एंगेल्स ने मार्गन की खोज के साथ मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद को जोड़ने के अतिरिक्त एक बुनियादी बात कही । उनके अनुसार किसी भी समय और देश के सामाजिक संगठन के निर्धारण में एक ओर मजदूर के विकास की अवस्था तो दूसरी ओर परिवार के विकास की अवस्था निर्णायक होते हैं । इस मान्यता के साथ ही मार्क्सवादी सैद्धांतिकी में स्त्री का सवाल बहुत ऊपर उठ गया । उत्पादन संबंधों के साथ ही मनुष्य के पुनरुत्पादन और परिवार के संचालन में स्त्रियों की भूमिका को भी महत्व दिया गया ।
इसी आधार पर एंगेल्स ने मानव इतिहास में स्त्री की संप्रभुता में कमी की बात उठाई । पहले ही एंगेल्स इस बात को मानते थे कि आदिम समाज में संतान की माता ही निश्चित की जा सकती थी । इसके चलते स्त्री का सम्मान तो होता ही था उसका सामाजिक प्राधिकार भी मजबूत था । मार्गन ने जिस कबीले का अध्ययन किया था वहां स्त्रियों को बुर्जुआ समाज के मुकाबले अधिक स्वतंत्रता हासिल थी । लेकिन एकल परिवार में संक्रमण के साथ स्त्री की स्वतंत्रता का क्षरण क्यों हुआ ? इसके जवाब में एंगेल्स कहते हैं कि श्रम विभाजन और निजी संपत्ति पर आधारित पूंजीवादी उत्पादन संबंधों के आगमन के साथ ही आए एकल परिवार में विरासत का हस्तांतरण पिता से पुत्र को होना शुरू हुआ । इसके लिए पुत्र के जैविक पिता का निश्चय और स्त्री स्वच्छंदता पर बंधन जरूरी था । स्त्री की ऐतिहासिक हार हुई । घर में भी पुरुष का स्वामित्व कायम हुआ और स्त्री गुलाम बनी । उसे पुरुष की वासना को संतुष्ट करना था और संतान पैदा करनी थी । संतान के पितृत्व को निश्चित करने के लिए स्त्री पर पुरुष का स्वामित्व थोपा गया । अगर वह अपनी पत्नी की हत्या भी कर दे तो अपने अधिकार का इस्तेमाल कर रहा होगा । स्त्री को पातिव्रत्य निभाना था, पुरुष ने अपने लिए स्वच्छंदता का अधिकार सुरक्षित रखा ।
एंगेल्स के इस विश्लेषण के चलते लैंगिकता ऐतिहासिक और सामाजिक निर्मिति की तरह नजर आने लगी । जहां अगस्त बेबेल ने पुरुष प्रभुत्व को अनादि काल से मौजूद माना था वहीं एंगेल्स ने उसे हाल की परिघटना साबित किया जिसका उभार निजी संपत्ति के विकास के साथ हुआ । उन्होंने देखा कि पुराने समाजों में स्त्री न केवल स्वाधीन बल्कि सम्मानित भी रही थी । आदिम साम्यवाद के खात्मे के साथ स्त्री की बदहाली शुरू होती है । इससे तय हुआ कि पुरुष प्रभुत्व अस्थायी है और लैंगिक विषमता का संबंध शरीर से नहीं, बल्कि खास आर्थिक व्यवस्था से है । इतिहास की गति में जैसे पूंजीवाद को खत्म होना है उसी तरह पुरुष प्रभुत्व भी समाप्त होगा । अपनी इस घोषणा के कारण एंगेल्स की यह किताब स्त्री समुदाय के लिए आशा का संदेश लेकर आई थी ।
मार्क्स और एंगेल्स ने जर्मन विचारधारा में ही आधुनिक श्रम विभाजन को घर के भीतर तक विस्तारित होते हुए देखा था । उनके मुताबिक निजी संपत्ति और विषमता का नाभिक परिवार के भीतर होता है जहां पत्नी और बच्चों की स्थिति दासों के समान होती है । एंगेल्स इससे आगे बढ़कर कहते हैं कि सामाजिक वर्गों के बीच शत्रुता के बीज आधुनिक एकल परिवार में पुरुष द्वारा स्त्री के उत्पीड़न में हैं । सामाजिक उत्पादन से विरहित और घरेलू कामकाज की निजी दुनिया में धकेल दी गई स्त्री अपने पति की नौकरानी बनकर रह जाती है । परिवार के भीतर संपत्ति का मालिक होने के चलते पुरुष बुर्जुआ होता है और पत्नी सर्वहारा होती है । एंगेल्स के क्रोध का विषय आधुनिक बुर्जुआ परिवार है जिसके भीतर व्यापक विषमता संस्थाबद्ध होती है । इसको वे पूंजीवादी वर्गीय संबंधों का लघु विश्व समझते थे । परिवार के भीतर की नैतिकता का ही पूरक बाहर का पाखंड भरा आचरण होता है । एकल परिवार का द्वंद्वात्मक विपरीत वेश्यावृत्ति है । मजदूर से पत्नी का अंतर यह होता है कि मजदूर अपने शरीर को टुकड़ा टुकड़ा रोज बेचते हैं जबकि पत्नी उसे एक ही बार जिंदगी भर के लिए सौंप देती है । 
एंगेल्स के अनुसार वेश्यावृत्ति और विवाहेतर संबंध एकल विवाह संस्था की अप्राकृतिक मांगों और परिवार के भीतर असमान शक्ति संबंधों का परिणाम होते हैं । परिवार की आधुनिक संस्था का निर्माण ही स्त्री की गुलामी के आधार पर हुआ है इसलिए इसमें पूंजीवादी व्यवस्था की तरह ही तनाव और अंतर्विरोध हमेशा बने रहेंगे । वंश परंपरा को बनाए रखने के लिए विवाहेतर संबंधों को क्रूरता के साथ दंडित किया जाएगा लेकिन उनकी मौजूदगी बनी रहेगी । पाखंड यह है कि पुरुष ने अपने लिए इन संबंधों का अधिकार सुरक्षित रखा और स्त्री से इसे छीन लिया । परिवार के इस रूप नें मजदूर वर्ग पर भी प्रभाव डाला । एंगेल्स को आशा है कि पूंजीवाद ने जिस तरह स्त्री को भी कारखाने के कामगार बना डाला है उससे मजदूरों के परिवार के भीतर उसके उत्पीड़न का कोई भौतिक आधार नहीं रह गया । एकल परिवार के आगमन के साथ जुड़े स्त्री के साथ क्रूर व्यवहार के अवशेष मात्र इन परिवारों में दिखाई देते हैं । फिर भी स्त्री की पराधीनता पूंजीवाद के जरिए नहीं खत्म होगी बल्कि साम्यवाद में ही इसकी समाप्ति संभव है । विरासत में मिलने वाली संपत्ति को साझा सामाजिक संपदा में बदलकर ही परिवार के वर्तमान रूप को बदला जा सकता है । काउत्सकी को लिखी एक चिट्ठी में एंगेल्स ने लिखा कि पुरुष और स्त्री के बीच सच्ची समानता तभी स्थापित हो सकती है जब पूंजी का शोषण खत्म हो और घरेलू काम को सार्वजनिक उद्योग में बदल दिया जाए । शायद चार्ल्स फ़ूरिए के चलते एंगेल्स को साम्यवाद के दौरान यौन और पारिवारिक संबंधों में मार्क्स से अधिक रुचि थी । एंगेल्स को लगता था कि विवाह का आधार आपसी पसंद के अतिरिक्त कुछ और नहीं होना चाहिए और ऐसा प्रेमवश ही हो सकता है । साम्यवाद में परिवार का एक नया रूप स्थापित होगा जो आदिम स्वतंत्रता के माहौल में मौजूद रिश्तों का उन्नत स्वरूप होगा ।
हन्ट का कहना है कि परिवार के इतिहास के सिलसिले में जितनी मौलिक बातें एंगेल्स ने कहीं उतनी मौलिक बातें राज्य की उत्पत्ति के सिलसिले में नहीं कहीं लेकिन उसमें भी मार्क्स-एंगेल्स की विकसित सोच दिखाई देती है । घोषणापत्र में उन्होंने लिखा था कि आधुनिक राज्य समूचे पूंजीपति वर्ग के मामलों की देखरेख करने वाला प्रबंधक निकाय भर होता है । इस किताब में उनका कहना है कि आदिम सामुदायिकता की समाप्ति और विरोधी कबीलों तथा वर्गों की उत्पत्ति के साथ राज्य एक अनिवार्य बुराई की तरह सामने आया । इन विरोधी वर्गों के टकरावों से ऊपर उठकर वह समाज को निर्देशित करने लगा । इसके साथ ही इन विरोधी वर्ग हितों के बीच राज्य के विभिन्न निकायों पर कब्जे की लड़ाई शुरू हो गई । आर्थिक रूप से दबंग वर्ग का मजबूत राज्य उत्पीड़ित वर्ग को दबाने और उसका शोषण करने लगा । बहरहाल पूंजीवादी उत्पादन संबंध और एकल परिवार की तरह ही एंगेल्स राज्य प्राधिकार के वर्तमान रूप को ऐतिहासिक माना । साम्यवादी क्रांति वर्तमान सामाजिक वर्गों को खत्म कर देगी और इसके साथ ही उन वर्गों को उनकी जगह पर बनाए रखने वाले राज्य का भी समापन होगा । वह पुरातात्विक वस्तुओं के संग्रहालय में मिला करेगा ।
आजकल इस किताब की अधिकांश मान्यताओं पर सवाल उठाया जाता है । खुद एंगेल्स के अनेक राजनीतिक फैसलों की आलोचना की जाती है । सही है कि मताधिकार संबंधी आंदोलन को एंगेल्स मध्यवर्गीय आंदोलन मानते थे लेकिन इसके कारण महिलाओं को वोट देने से उन्होंने कभी परहेज नहीं किया । इससे एंगेल्स के व्यक्तिगत और दार्शनिक जीवन के बीच तनाव देखने का भी मौका मिला है । बहुत कम चिंतक ऐसे रहे हैं जिनका जीवन उनके आदर्शों के अनुरूप बीता हो और एंगेल्स के साथ तो और बड़ी समस्या थी । कपड़ा मिल मालिक के बतौर उनके अस्तित्व और उनकी राजनीतिक सोच में बहुत विराट खाई थी । स्त्रियों के साथ उनके संबंधों की भी पर्याप्त चर्चा हुई है । बाद में उनके प्रगाढ़ रिश्ते आयरलैंड की मिल मजदूर मेरी बर्न्स से बने । बीस सालों तक यह रिश्ता चला । मेरी के जरिए ही उनका साबका मानचेस्टर में मौजूद लघु आयरलैंड से हुआ जो ज्यादातर मजदूरों की बस्ती था । इसके चलते ही उनकी समाजवादी सोच को ठोस आधार मिला । हालांकि इस रिश्ते में भी बहुतों को मालिक गुलाम का शक्ति संबंध महसूस होता है । सही है कि मेरी से एंगेल्स ने कभी विवाह नहीं किया लेकिन लगाव बहुत जबर्दस्त था । उनकी मृत्यु पर वे बेहद दुखी हुए ।  फिर जल्दी ही मेरी की बहन लिज़ी के साथ एंगेल्स के रिश्ते बन गए । लिज़ी पढ़ी लिखी नहीं थीं लेकिन एंगेल्स उनकी समाजवादी भावना का बहुत सम्मान करते थे । लिज़ी के साथ ही वे मानचेस्टर से लंदन रहने आए और उनके साथ ही लिज़ी के देहांत तक रहे । लिज़ी के देहांत से कुछ क्षण ही पहले एंगेल्स ने खोजकर एक पादरी बुलाया और लिज़ी की इच्छा का सम्मान करते हुए चर्च के नियमों के अनुसार विवाह किया ।
हन्ट ने उस जमाने की अधिकांश मध्यवर्गीय स्त्रियों के विचारों की एंगेल्स की आलोचना को उनका स्त्रीद्वेष माना है । फिर भी उन्होंने माना है कि इस घेरे के बाहर की जुझारू स्त्रियों की वे हमेशा इज्जत करते रहे थे । लेखक की निजी संकीर्ण्ताओं से अलग यह किताब तत्कालीन समाज की बुनियादी नारीवादी आलोचना है तथा समतापरक साम्यवादी समाज का स्वप्न है । इसी वैचारिक ऊर्जा के चलते बीसवीं सदी में एंगेल्स की यह किताब महत्वपूर्ण साबित हुई । यूरोपीय महाद्वीप में नवजात मार्क्सवादी और समाजवादी आंदोलन के घेरे से बाहर निकलकर स्त्री मुक्ति की राजनीति का व्यापक महत्व प्रतिष्ठित हुआ । स्त्री मताधिकार के आंदोलन में समाजवादी आगे रहे और द्वितीय इंटरनेशनल ने अपने सभी घटक दलों से स्त्री-पुरुष के बीच कानूनी और राजनीतिक समानता के लिए आंदोलन चलाने की अपील की ।