Friday, March 8, 2013

संपादकीय कुटिलता का नायाब नमूना


          
जब मित्र कृष्ण सिंह नेसमयांतरके लिए लेख लिखने की बात की तो सबसे पहले मैंने यह आशंका जाहिर की कि यह पत्रिका लंबे समय से हमारे संगठन के विरोध का मंच बनी हुई है इसलिए ऐसा करना संभव और उचित नहीं होगा लेकिन ऐसा होने का आश्वासन मिलने पर लिखा दुर्भाग्य सेहैबिट इज नेक्स्ट टु नेचरसो इस अंक में भी अतिथि संपादक को विश्वास में लिए बिना संपादक महोदय ने अपनी परंपरा कायम रखी उन्होंने महमूद अंसारी लिखितजसम फिर अज्ञेय-भक्तों के हवालेशीर्षक से जसम सम्मेलन की रपट छापी लेखक कोई पुराने दोस्त हैं या नित्यानंद स्वामी की तरह ही संपादक महोदय की ओर से हिंदी को प्रदत्त लेखक या दरबारीलाल की तरह संपादक का प्रतिरूप? यह बात साफ नहीं की गई है इसलिए उन्हें स्वतंत्र लेखक ही मानना ठीक होगा
वैसे हिंदी में कुछ ऐसा कीचड़ प्रेम फैला है कि उसका जवाब देने के लिए भी कीचड़ में ही उतरना लाजिमी लगता है औरप्रशासन, संपादन और अध्यापनशीर्षक से एक ललित निबंध लिखकर उत्तर देने की इच्छा हो रही है लेकिन लोभ संवरण करते हुए रपट की चर्चा करना ही ठीक होगा । रपट में लेखक को तीन चीजों से आपत्ति दिखाई पड़ती है ।
1 व्यक्तिगत बात महासचिव के खिलाफ़ है और इस प्रसंग में लेखक की राय पत्रकारीय दक्षता और कार्यालयी अनुशासन से प्रभावित है । सूचना संग्रह का काम उन्होंने खुफ़िया पुलिस के स्तर का तो किया ही है इस बात के भी कायल वे दिखते हैं कि अगर आजीविका के लिए आप इस व्यवस्था में किसी संस्थान में नौकरी करते हैं तो उसके अनुशासन के प्रति आपको बद्ध रहना चाहिए । यहां तक कि अध्यापकों से प्रशासन के लोगों की इस शिकायत की छौंक भी उसमें शामिल है कि इन्हें सभा, सेमिनार के लिए इतनी छुट्टी क्यों मिलती है । वे शायद अब तक अपनी उपयोगिता सरकार के गृह मंत्रालय या शिक्षण संस्थाओं के अनुशासकों के लिए पहचान नहीं सके हैं । शिक्षण संस्थाओं के प्रति उनका अनुराग उनकी दूसरी किंचित कुंठाग्रस्त आपत्ति तक ले गया है ।
2 उनकी दूसरी आपत्ति का विस्तार जवहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से लेकर अध्यापकों तक है । अध्यापक एक ऐसा जीव है जिसे कोई भी गैर अध्यापक जब मन करे अनधिकार चेष्टा का डंडा लेकर पीट देता है । आलोचना उन्हें नहीं करनी चाहिए, संगोष्टियों में बोलना उनके लिए मना है, लेख, कविता आदि लिखना महापाप । आखिर आप उन्हें कौन सी सामाजिक जिम्मेदारी देना चाहते हैं और जेएनयू के छात्र महज शासकों के लिए परेशानी थोड़े ही हैं । तभी तो महमूद साहब को रामविलास शर्मा वाली गोष्ठी में सिर्फ़ अध्यापक दिखे छात्र नहीं । वैसे भी वे भविष्य के अध्यापक होने की नियति से कैसे छूट सकते हैं । अध्यापकों के प्रति उनकी कुंठाग्रस्त विरक्ति भी उन्हें संस्कृति की किसी जनपक्षधर धारणा तक नहीं ले गई और उनकी तीसरी आपत्ति तो उन्हें ही अज्ञेय-भक्त (आभिजात्य प्रेमी के अर्थ में) साबित करती है ।
3 तीसरी आपत्ति उन्हें संस्कृति के सभी निम्नवर्गीय रूपों के प्रति है और इनके प्रयोग का दोषी वे जसम को पाते हैं । इस मामले में उनके शब्द इतनी नफ़रत से भरे हुए हैं कि उन्हें लेखक/संपादक की राय के बदले उनकी मनोवृत्ति का परिचायक मानना ठीक होगा । वे कहते हैं किजसम पिछले कुछ समय से सिर्फ़ तीन कामों को अंजाम दे रहा है : शव साधना, नाच-गाना-बाजा, और घुमंतू सिनेमा---खासकर नाच-गाना-बाजा- और घुमंतू सिनेमा का शोर इतना ज्यादा है कि वही जैसे जसम के पर्याय बन गए हैं ।शव साधना शायद उन्हें भी उतनी अनुचित नहीं लगी क्योंकि वाल्टर बेंजामिन का कथन उन्हें याद आ गया होगा कि अगर आप अतीत पर पिस्तौल से गोली दागेंगे तो वह आप पर तोप का गोला दागेगा । लेकिन नृत्य-गायन-वादन और सिनेमा के प्रति उनका रुख भयंकर पितृसत्ताक और सामंती तो है ही जनता के बीच प्रचलित लोक संस्कृति के प्रति जहरीली हिकारत से भी भरा हुआ है ।
माना कि रपट का लेखक, संपादक से भिन्न है लेकिन संपादक ने रपट छापी है तो कुछ गुण अवगुण की परीक्षा करके ही या ये दोनों इतने अभिन्न हैं कि संपादक उसे छापने के लिए मजबूर था । अपनी पत्रिका के लिए आई सामग्री तो संपादक पढ़ ही लेता है शेष पाठकों के प्रति जवाबदेही के चलते उसे कुछ छोड़ना भी पड़ता है । अगर पत्रिका की खपत बढ़ाने के लिए संपादक महोदय को सामंती पूर्वाग्रहों को ही संतुष्ट करने का रास्ता दिखाई दे रहा है तो निवेदन है कि हमारा और दुनिया भर के मार्क्सवादियों का रास्ता उनसे अलग है । हम सत्ता के विरोध में जनता की संस्कृति को बुलंद रखना जारी रखेंगे और इस काम में देश भर के सभी पेशों और सभी संस्थानों में कार्यरत विपक्षी ताकतों को गोलबंद करेंगे । आप भी इस कतार में ही शामिल होना ठीक मानें ऐसी हमारी व्यक्तिगत और एक हद तक सामूहिक भी इच्छा है ।             

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